शफीकुर रहमान: प्रतिबंध से प्रधानमंत्री पद की रेस तक, बांग्लादेश का इस्लामिक चेहरा, विवाद भी साथ

बांग्लादेश में PM कौन बनेगा यह जल्द ही स्पष्ट हो जाएगा. इस रेस में सियासी उतार-चढ़ाव के साक्षी रहे शफीकुर रहमान का चेहरा आज ढाका की सड़कों पर पोस्टरों और बिलबोर्ड्स पर छाया हुआ है. आखिर जेल की सलाखों से PM की रेस तक पहुंचे शफीकुर रहमान कौन हैं?

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  • बांग्लादेश में डॉक्टर से नेता बने शफीकुर रहमान ने 2040 तक 2 ट्रिलियन डॉलर जीडीपी का सपना दिखाया है.
  • प्रतिबंध, जेल और आंदोलन के बाद सत्ता की दौड़ में वो आगे चल रहे हैं.
  • चुनाव से पहले उनकी पार्टी, सर्वे में जमात-ए-इस्लामी बीएनपी को कड़ी टक्कर देती दिख रही है.
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बांग्लादेश की राजनीति में कभी हाशिए पर रहे शफीकुर रहमान आज सत्ता की सीढ़ियों के सबसे ऊंचे पायदान की ओर बढ़ते दिख रहे हैं. 67 वर्षीय डॉक्टर, जमात-ए-इस्लामी के अमीर और सियासी उतार-चढ़ाव के साक्षी रहे रहमान का चेहरा आज ढाका की सड़कों पर पोस्टरों और बिलबोर्ड्स पर छाया हुआ है. उनका दावा है अगर जमात सत्ता में आई तो बांग्लादेश 2040 तक अपनी जीडीपी चार गुना कर 2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचा सकता है.

हाशिए से मुख्यधारा तक का सफर

31 अक्टूबर 1958 को मौलवीबाजार (कुलाउरा) में जन्मे शफीकुर रहमान ने 1983 में सिलहट एमएजी उस्मानी मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की. वे पेशे से डॉक्टर रहे और सिलहट में एक पारिवारिक अस्पताल के संस्थापक चेयरमैन हैं. उनकी पत्नी अमीना बेगम और उनके तीनों बच्चे भी डॉक्टर हैं- यह परिवार बांग्लादेश में फैमिली ऑफ डॉक्टर्स के रूप में जाना जाता है. रहमान ने 1973 में छात्र राजनीति में कदम रखा. शुरुआती दौर में वे वामपंथी छात्र संगठनों से जुड़े रहे, लेकिन 1977 में इस्लामी छात्र संगठन इस्लामी छात्र शिबिर से जुड़ गए. 1984 में उन्होंने आधिकारिक तौर पर जमात-ए-इस्लामी की सदस्यता ली.

प्रतिबंध, जेल और वापसी

पार्टी के कई शीर्ष नेताओं को 1971 के युद्ध अपराधों के मामलों में सजा हुई, कुछ को फांसी भी दी गई. शेख हसीना के शासनकाल में जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. साल 2022 में शफीकुर रहमान को एक प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन की मदद के आरोप में गिरफ्तार कर 15 महीने जेल में रखा गया. पर जुलाई 2024 में जब देश में जनांदोलन हुआ और शेख हसीना की सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया गया और मोहम्मद यूनुस अंतरिम सरकार के प्रमुख बने तब जमात पर लगी पाबंदियों में ढील दी गई.

2005 में कोर्ट ने इस प्रतिबंध को पूरी तरह हटा लिया. यहीं से  शफीकुर रहमान की राजनीतिक तकदीर ने पलटा खाया. इस आंदोलन से बांग्लादेश की राजनीति में एक शून्य पैदा हुआ क्योंकि शेख हसीना की अवामी लीग मैदान से पूरी तरह बाहर थी और खालिदा जिया की बीएनपी मुकाबले से बाहर. खुद खालिदा जिया की तबीयत तब खराब चल रही थी और उनके बेटे तारिक रहमान लंदन में निर्वासन में थे. 

शफीकुर रहमान का राजनीतिक उभार

ऐसे में शफीकुर रहमान ने पूरे देश का दौरा किया. बाढ़ राहत और सामाजिक कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाई. इस तरह उन्होंने मीडिया में अपनी सक्रिय और मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई. बांग्लादेश की राजनीति के जानकारों के मुताबिक- उस आंदोलन के बाद देश में कोई स्पष्ट चेहरा नहीं था. शफीकुर रहमान ने उस खाली जगह को भरा और खुद को राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित किया.

नई छवि गढ़ने की कोशिश

जमात-ए-इस्लामी लंबे समय तक 1971 में पाकिस्तान का साथ देने के आरोपों से घिरी रही है. रहमान ने इस इतिहास को लेकर ‘पिछली गलतियों' की बात तो की है, लेकिन खुलकर स्वीकारोक्ति से बचते रहे हैं. समर्थक इसे व्यावहारिक राजनीति बताते हैं, जबकि आलोचक इसे रणनीतिक अस्पष्टता कहते हैं. जबकि रहमान खुद को मध्यमार्गी बताते हैं. उन्होंने अल्पसंख्यकों को बराबरी का अधिकार देने और भ्रष्टाचार-मुक्त शासन का वादा किया है. 

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महिलाओं पर बयान से घिरे

जमात ने पहली बार एक हिंदू उम्मीदवार को टिकट भी दिया है. लेकिन महिलाओं को लेकर उनके बयान विवादों में रहे हैं. उन्होंने कहा था कि महिलाएं पांच घंटे से ज्यादा काम न करें ताकि परिवार को प्राथमिकता दे सकें. एक सोशल मीडिया पोस्ट में आधुनिकता के नाम पर महिलाओं को घर से बाहर निकालने को वेश्यावृत्ति का रूप बताया गया- जिस पर विश्वविद्यालयों में विरोध प्रदर्शन हुए. बाद में पार्टी ने कहा कि उनका अकाउंट हैक हो गया था.

चुनावी घोषणापत्र और आर्थिक वादे

फरवरी 12 को होने वाले आम चुनाव के लिए रहमान ने एक महत्वाकांक्षी घोषणापत्र जारी किया है. इसमें तकनीक-आधारित कृषि, विनिर्माण, आईटी, शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश बढ़ाने का वादा है. विदेशी निवेश को आकर्षित करने और सार्वजनिक खर्च बढ़ाने की भी बात कही गई है. हालांकि बांग्लादेश के कई अर्थशास्त्री इन वादों को नारेबाजी और पैसे कहां से आएंगे इसे लेकर अस्पष्टता बताते हैं. 

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सामने तीन बड़ी चुनौती

रहमान की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ चुनाव जीतना नहीं, बल्कि जमात की छवि बदलना है. उन्हें एक साथ तीन मोर्चों पर संतुलन साधना होगा.

1. परंपरागत इस्लामी समर्थकों का भरोसा बनाए रखना.
2. युवा और उदार वर्ग को आकर्षित करना.
3. अंतरराष्ट्रीय समुदाय को आश्वस्त करना.

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हाल के महीनों में यूरोपीय, पश्चिमी और भारतीय राजनयिकों ने उनसे खुलकर मुलाकात की है- जो पहले तक अकल्पनीय था.

क्या बन सकते हैं प्रधानमंत्री?

एक साल पहले तक यह सवाल पूछना भी असंभव लगता था. लेकिन आज चुनाव से पहले हुए सर्वे में जमात-ए-इस्लामी बीएनपी को कड़ी टक्कर देती दिख रही है. यदि राजनीतिक समीकरण उनके पक्ष में गए, तो शफीकुर रहमान बांग्लादेश के पहले इस्लामिस्ट-नेतृत्व वाली सरकार के प्रधानमंत्री बन सकते हैं. उन्हीं के शब्दों में, “अगर जमात चुनी गई, तो हम मालिक नहीं, सेवक होंगे. कोई मंत्री प्लॉट या टैक्स-फ्री कार नहीं लेगा. भ्रष्टाचार नहीं होगा. मैं युवाओं से कहता हूं- हम आपके साथ हैं.”

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