इस देश में पालतू जानवरों के लिए कब्रिस्तान, खूब सारा पैसा खर्च कर किया जाता है अंतिम संस्कार

1985 से संचालित यह कब्रिस्तान पूरी तरह भर चुका है, अब दाह संस्कार का चलन बढ़ रहा है. इस कब्रिस्तान में जानवरों को इंसानों की तरह नाम और फूलों से सजाया जाता है, और मालिक उनके लिए लाखों रुपये खर्च करते हैं.

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दुनिया में एक ऐसी जगह भी है जहां पालतू जानवरों की मौत पर लोग सिर्फ आंसू ही नहीं बहाते, बल्कि उनकी गरिमापूर्ण विदाई के लिए लाखों रुपये खर्च कर देते हैं.केन्या की राजधानी नैरोबी में एक ऐसा कब्रिस्तान और श्मशान घाट है, जो इन दिनों चर्चा का केंद्र बना हुआ है. यहां पालतू कुत्तों, बिल्लियों और यहां तक कि तोतों को भी बिल्कुल इंसानी अंदाज में दफनाया जाता है या उनका अंतिम संस्कार किया जाता है. अपनों को खोने का गम क्या होता है इसकी मिसाल नैरोबी के 'केन्या सोसाइटी फॉर द प्रोटेक्शन एंड केयर ऑफ एनिमल्स' (KSPCA) परिसर में साफ देखी जा सकती है.

नैरोबी के पॉश इलाके 'कैरन' में स्थित यह जगह पहली नजर में किसी शांत बगीचे जैसी लगती है, लेकिन यहां की खामोशी में एक अलग तरह का दर्द और लगाव छिपा है. यहां कतारों में बनी छोटी-छोटी कब्रें किसी इंसान की नहीं, बल्कि उन वफादार जानवरों की हैं जो कभी किसी परिवार का हिस्सा हुआ करते थे.

पत्थरों पर खुदे नाम और बिछी हुई फूल-मालाएं

बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, इस कब्रिस्तान में कदम रखते ही आपको चारों तरफ छोटी-छोटी कब्रें दिखाई देंगी. इन कब्रों पर पर संगमरमर की तख्तियां लगी हैं. इन पत्थरों पर 'स्नो', 'स्पूकी' और 'एमकोम्बोजी' जैसे नाम बड़े प्यार से उकेरे गए हैं. दिलचस्प बात यह है कि यहां इंसानों की तरह ही एक ही परिवार के कई पालतू जानवरों को साथ-साथ दफनाया गया है.

इन कब्रों को देखकर यह अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है कि अंदर कोई बिल्ली दफन है या कुत्ता, क्योंकि उनकी सजावट और उन पर चढ़े फूल बिल्कुल इंसानी कब्रों जैसे ही होते हैं.

KSPCA की प्रमुख वांगारी करियुकी कहती हैं कि जीवन चाहे इंसान का हो या जानवर का, उसका अर्थ हम इंसान ही तय करते हैं. पालतू जानवरों के मालिकों का मानना है कि इन वफादारों को भी मरने के बाद एक सम्मानजनक विदाई का पूरा हक है.

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लाखों के खर्चे के बाद कब्रिस्तान हुआ 'हाउसफुल'

शायद आपको जानकर हैरानी हो, लेकिन इस कब्रिस्तान में अपने जानवर को दफनाने के लिए लोग भारी-भरकम रकम चुकाते हैं. शुरुआती दौर में इस सुविधा के लिए शुल्क 5,000 डॉलर (करीब 4.15 लाख भारतीय रुपये) तक रखा गया था. यह कीमत एक आम आदमी की पहुंच से बाहर हो सकती है, लेकिन इसके बावजूद यहां जगह की कोई कमी नहीं रही.

साल 1985 में शुरू हुआ यह सेंटर अब पूरी तरह भर चुका है, यानी अब यहां नई कब्रों के लिए जगह नहीं बची है. जानवरों के प्रति लोगों का लगाव इस कदर बढ़ा है कि अब कब्रिस्तान के भर जाने के बाद अंतिम संस्कार के लिए दूसरे रास्तों को अपनाया जा रहा है.

अब यहां दाह संस्कार (क्रेमेशन) का चलन तेजी से बढ़ रहा है. प्रशासन के मुताबिक, साल 2025 के बाद से अपने पालतू जानवरों का अंतिम संस्कार कराने वाले लोगों की संख्या दोगुनी हो गई है.

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