कमाल है पाकिस्तान! LLB की फर्जी डिग्री लेकिन 5 साल तक इस्लामाबाद हाईकोर्ट में बने रहे जज

Pakistan: जज जहांगीरी ने LLB पार्ट-1 की परीक्षा एक फर्जी एनरोलमेंट नंबर से दी थी. बाद में उन्हें नकल करते पकड़ा गया और तीन साल के लिए बैन कर दिया गया. तो फिर उन्होंने किसी और के एनरोलमेंट नंबर से पेपर दे दिया.

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इस्लामाबाद हाई कोर्ट के जज, जस्टिस तारिक महमूद जहांगीरी को पद से हटाया गया
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  • इस्लामाबाद हाईकोर्ट ने जस्टिस तारिक महमूद जहांगीरी की नियुक्ति गैरकानूनी मानते हुए उन्हें पद से हटा दिया
  • जहांगीरी के पास वैध कानून की डिग्री नहीं थी और उनकी डिग्री फर्जीवाड़े के आधार पर अमान्य घोषित हुई
  • जहांगीरी 1988 में फर्जी एनरोलमेंट नंबर से LLB पार्ट-1 परीक्षा दी और नकल करते हुए तीन साल के लिए बैन हुए थे
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जिस LLB की डिग्री के बिना लोग वकालत नहीं कर पाते, पाकिस्तान में एक साहब 5 साल तक इस्लामाबाद हाईकोर्ट में जज लगे रहे, फैसले सुनाते रहे. है न कमाल. डॉन की रिपोर्ट के अनुसार इस्लामाबाद हाई कोर्ट ने सोमवार, 23 फरवरी को अपने एक जज, जस्टिस तारिक महमूद जहांगीरी को पद से हटाने पर 116 पन्नों का एक विस्तृत फैसला जारी किया. इस घोषणा की गई कि हाई कोर्ट के जज के रूप में उनकी नियुक्ति गैरकानूनी थी क्योंकि उनके पास वैध कानून की डिग्री नहीं थी. तारिक महमूद जहांगीरी दिसंबर 2020 में इस्लामाबाद हाईकोर्ट में जज नियुक्त हुए थे लेकिन पिछले साल सिंतबर में उन्हें जज के रूप में न्यायिक कार्य करने से बैन कर दिया गया था. अब उस मामले में अंतिम फैसला आ चुका है.

फर्जी डिग्री पर ही 30 साल तक कानूनी करियर चलाया

डॉन की रिपोर्ट के अनुसार इस्लामाबाद हाईकोर्ट की जिस बेंच ने इस मामले में फैसला सुनाया है, उसमें चीफ जस्टिस सरदार मुहम्मद सरफराज डोगर और जस्टिस मुहम्मद आजम खान शामिल थे. बेंच ने कहा कि पूर्व जज जहांगीरी की कानून की डिग्री शुरू से ही अमान्य थी. इसलिए उनका हाईकोर्ट जज बनना भी कानूनी रूप से गलत माना गया है. हाई कोर्ट ने जो फैसला सुनाया है वो कराची यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार द्वारा दिए गए असली रिकॉर्ड पर आधारित था. कोर्ट ने कहा कि जहांगरी की पढ़ाई से जुड़े दस्तावेज फर्जीवाड़ा, किसी और की जगह परीक्षा देने और सजा से बचने की कोशिश से जुड़े थे.

फैसले के अनुसार जहांगीरी ने 1988 में LLB पार्ट-1 की परीक्षा एक फर्जी एनरोलमेंट नंबर से दी थी. बाद में उन्हें नकल करते पकड़ा गया और 1989 में यूनिवर्सिटी ने उन्हें तीन साल के लिए बैन कर दिया. कोर्ट ने कहा कि सजा मानने के बजाय उन्होंने गलत तरीका अपनाया. 1990 में उन्होंने “तारिक जहांगीरी” नाम से दोबारा परीक्षा दी और एक ऐसा एनरोलमेंट नंबर इस्तेमाल किया जो किसी और स्टूडेंट, इम्तियाज अहमद, को दिया गया था.

बाद में उन्होंने LLB पार्ट-2 की परीक्षा अपने असली नाम से दी, लेकिन फिर एक अलग एनरोलमेंट नंबर का इस्तेमाल किया. कोर्ट ने यूनिवर्सिटी के परीक्षा नियंत्रक के बयान का हवाला देते हुए कहा कि एक कोर्स के लिए एक ही एनरोलमेंट नंबर दिया जाता है, दो एनरोलमेंट नंबर मिलना असंभव है. इसलिए उनकी मार्कशीट और डिग्री दोनों को अमान्य घोषित कर दिया गया.

गवर्नमेंट इस्लामिया लॉ कॉलेज के प्रिंसिपल ने भी अदालत को बताया कि जहांगीरी को कभी कॉलेज में दाखिला ही नहीं मिला था. अदालत ने साफ कहा कि जो चीज शुरू से ही गलत हो, उसे बाद में किसी प्रशासनिक फैसले से सही नहीं बनाया जा सकता. इसलिए उनकी LLB डिग्री को कानून की नजर में पूरी तरह रद्द कर दिया गया.

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जहांगीरी की फर्जी डिग्री का मामला सबसे पहले साल 2024 में आया था. पिछले साल सिंतबर में हाईकोर्ट ने जहांगीरी को जज के रूप में काम करने से रोक दिया था. कोर्ट के इस नोटिस में बताया गया था कि जस्टिस जहांगीरी का कानूनी करियर 30 वर्षों से अधिक का है. बता दें कि उन्हें 30 दिसंबर, 2020 को इस्लामाबाद हाई कोर्ट के जज के रूप में नियुक्त किया गया था. 

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