'घर से कॉलेज जाते हैं, लेकिन लौटकर नहीं आ पाते', बलूचिस्तान में पाकिस्तान के अत्याचार की पोल खुल गई

एक ओर पाकिस्तान खुद को अच्छा दिखाने की कोशिश कर रहा है तो दूसरी बलूचिस्तान में उसके अत्याचार की पोल खुलती एक रिपोर्ट आ गई है. इसमें कहा गया है कि बलूचिस्तान में पाकिस्तान 'जबरदस्ती' का सिस्टम चला रहा है.

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बलूचिस्तान में पाकिस्तान लोगों पर जबरदस्ती करता है.
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  • बलूचिस्तान में पाकिस्तान द्वारा जबरन गुमशुदगी और हत्याएं नियमित और सरकारी नीति का हिस्सा बन गई हैं
  • बलूचिस्तान में युवा कॉलेज जाने के बाद या सुरक्षा चौकियों से उठाए जाने के बाद लापता हो जाते हैं
  • गुमशुदगी और कस्टोडियल मौतों के मामले बढ़ रहे हैं, लेकिन सरकार द्वारा कोई जिम्मेदारी नहीं ली जाती है
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यूं तो बलूचिस्तान पर पाकिस्तान का कब्जा है, लेकिन वह यहां जिस तरह से अत्याचार और जुल्म करता है वह दिखाता है कि यहां मानवाधिकार अब बचा ही नहीं है. लोगों का लापता होना और हत्या होना... ये सब यहां आम हो गया है. इस बीच एक रिपोर्ट आई है, जिसमें कहा गया है कि पाकिस्तान जिस तरह की सख्ती और उपाय यहां आजमा रही है, वह उसकी कमजोरी और डर को दिखाते हैं.

श्रीलंका गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार, बलूचिस्तान में 'गायब कर देना' अब सिर्फ आरोप नहीं, बल्कि सरकार का एक 'तरीका' बन गया है. यह डर की भाषा बन चुकी है और कई परिवारों के लिए सरकार का सबसे 'क्रूरतम चेहरा' है. यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है, जब पाकिस्तान दुनिया के सामने अच्छा बनने की कोशिश कर रहा है. अमेरिका और ईरान में सुलह कराने की कोशिश में जुटा है. ये रिपोर्ट पाकिस्तान के इस चेहरे को बेनकाब करती है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि कई मामलों में युवक कॉलेज के लिए घर से निकलते हैं और वापस नहीं लौटते, या सुरक्षा चौकियों से उठाए जाने के बाद लापता हो जाते हैं. कई बार कुछ दिनों बाद शव मिलते हैं, जिन पर हिरासत में रहने के संकेत होते हैं, लेकिन आधिकारिक तौर पर कोई जिम्मेदारी नहीं ली जाती. रिपोर्ट के अनुसार, अब यह संकट एक मानवाधिकार मुद्दा नहीं रहा, बल्कि बलूचिस्तान की राजनीति के केंद्र में आ गया है, जिससे सरकार की छवि, विरोध के तरीके और पूरे संघर्ष की प्रकृति प्रभावित हो रही है.

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'जबरदस्ती' से शासन कर रहा पाकिस्तान

रिपोर्ट में बताया गया है कि 1948 में पाकिस्तान में शामिल किए जाने के बाद से ही बलूचिस्तान को एक 'संसाधन क्षेत्र' की तरह देखा गया है, जहां बार-बार सैन्य अभियान, राजनीतिक दमन और प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद व्यापक गरीबी देखने को मिलती है.

रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तानी सेना, खुफिया एजेंसी ISI और प्रशासन मिलकर ऐसा सिस्टम चला रहे हैं, जो सहमति के बजाय 'जबरदस्ती' पर टिका हुआ है.

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इस सिस्टम का सबसे कड़ा हथियार 'जबरन गुमशुदगी' है. वर्षों से बलूच परिवार आरोप लगाते रहे हैं कि लोगों को घरों, हॉस्टलों या सुरक्षा चौकियों से उठाया जाता है और वे एक ऐसे तंत्र में गायब हो जाते हैं, जहां से उनकी कोई जानकारी नहीं मिलती.

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न कोई कार्रवाई, न कोई इंसाफ

रिपोर्ट कहती है कि पीड़ित लोग कितना ही धरना प्रदर्शन कर लें, विरोध कर लें लेकिन न तो कोई कार्रवाई होती है और न ही उन्हें इंसाफ मिलता है.

रिपोर्ट के मुताबिक, लोगों की गुमशुदगी के बाद विरोध प्रदर्शन, धरना, हाइवे जाम और अदालतों में याचिकाएं दायर करने का सिलसिला शुरू होता है लेकिन अक्सर इन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती. कई मां अपने लापता परिजनों की तस्वीरें लेकर इंसाफ की मांग करती रहती हैं.

पाकिस्तानी सरकार के आंकड़ों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में बताया गया कि 2025 में जबरन गुमशुदगी के 1,355 और कस्टोडियल डेथ के 225 मामले सामने आए थे. 2026 में यह सिलसिला जारी है. जनवरी में 82 और फरवरी में 109 लोगों के लापता हुए हैं. रिपोर्ट कहती है कि यह दिखाता है कि बलूचिस्तान में एक सिस्टम किस तरह से काम कर रहा है, जहां चुपचाप हिरासत में लेकर कथित 'किल एंड डंप' जैसी घटनाएं सामने आ रही हैं.

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