नोबेल विजेता वैज्ञानिक दोबारा चौंकाने के लिए तैयार, ये रिसर्च भी दुनिया बदल देगी

तकनीक के जरिए दुनिया की जिंदगी आसान बनाने वाले शुजी नाकामुरा की जिंदगी भी बहुत सीख देने वाली है. उनका हर कोई मजाक उड़ाता था. मगर जब सफलता मिली तो हर कोई चकित रह गया, लेकिन उसमें भी एक ट्विस्ट आ गया.

विज्ञापन
Read Time: 6 mins
शुजी नाकामुरा की नई रिसर्च को थॉमस एडिसन के आविष्कार की तरह क्रांतिकारी बताया जा रहा है. (फोटो क्रेडिट-ब्रिटानिका)
फटाफट पढ़ें
Summary is AI-generated, newsroom-reviewed
  • शुजी नाकामुरा ने नीली LED का आविष्कार किया, जिसने इलेक्ट्रॉनिक्स और रोशनी की दुनिया में क्रांति ला दी
  • नाकामुरा को 2014 में LED के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए फिजिक्स का नोबेल पुरस्कार मिला था
  • वे अब एक नए पावर प्लांट पर काम कर रहे हैं जो न्यूक्लियर फ्यूजन के लिए हाई-पल्स लेजर का उपयोग करेगा

शुजी नाकामुरा एक बार फिर दुनिया को चौंकाने वाले हैं. उनके बनाए ब्लू लाइट-एमिटिंग डायोड (LED) ने हमारी रोजमर्रा की जिंदगी को पूरी तरह बदल दिया. कंप्यूटर, फोन, बड़ी स्क्रीन, ट्रैफिक लाइट और इलेक्ट्रॉनिक बिलबोर्ड उन्हीं के आविष्कार की वजह से रोशन होते हैं. नाकामुरा को 2014 में दो अन्य जापानी वैज्ञानिकों इसामु अकासाकी और हिरोशी अमानो के साथ मिलकर LED के क्षेत्र में बड़ी कामयाबी हासिल करने के लिए फिजिक्स का नोबेल पुरस्कार मिला. अब वो एक उससे भी बड़ी रिसर्च कर रहे हैं.

कुछ जानकारों ने उनके इस आविष्कार को थॉमस एडिसन के इनकैंडेसेंट लाइट बल्ब जितना ही अहम बताया है. इसलिए, यह एक बड़ी खबर है जब दुनिया के सबसे महान आविष्कारकों में से एक यह कहे कि उनका अगला आविष्कार उनके पिछले आविष्कार से कहीं ज्यादा अहम होगा तो दुनिया को गंभीरता से ध्यान देना ही होगा. उनका नया लक्ष्य है एक ऐसा पावर प्लांट बनाना, जो न्यूक्लियर फ्यूजन के लिए एक नए तरह के हाई-पल्स लेजर का इस्तेमाल करे और उससे कुशल व साफ ऊर्जा की कभी न खत्म होने वाली सप्लाई पैदा हो. न्यूक्लियर फ्यूजन में यूरेनियम का इस्तेमाल नहीं होता और न ही इसमें मेल्टडाउन का कोई खतरा होता है.

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सांता बारबरा (UCSB) में मटीरियल्स और इलेक्ट्रिकल एंड कंप्यूटर इंजीनियरिंग के प्रोफेसर नाकामुरा ने कहा कि अगर वह इस कोड को क्रैक कर लेते हैं, तो इसकी क्षमता असीमित होगी. उस उम्र में जब ज्यादातर लोग रिटायरमेंट के बारे में सोचते हैं, 72 साल के नाकामुरा में भरपूर ऊर्जा है. उन्होंने CNN से कहा, "रिटायरमेंट बहुत उबाऊ होता है."

कभी रोज मांगा जाता था इस्तीफा

मगर शुजी नाकामुरा को ये सब इतनी आसानी से नहीं मिला. और न ही अभी सब कुछ आसान है. नोबेल सम्मान पाने और 'नेशनल इन्वेंटर्स हॉल ऑफ फेम' में शामिल होने से बहुत पहले, नाकामुरा की बदनामी हुई थी और उनका मजाक उड़ाया जाता था. उन्हें एक ऐसे इंजीनियर के तौर पर जाना जाता था, जिनकी लैब में धमाके होते थे और जिनकी प्रोडक्टिविटी कम थी. 1979 में, नाकामुरा ने 'निचिया कॉर्पोरेशन' नाम की एक जापानी केमिकल कंपनी में काम करना शुरू किया, जो उस समय बहुत कम जानी-मानी थी. वहां वे रिसर्च और डेवलपमेंट टीम के हेड थे, जिसमें सिर्फ दो लोग थे. लेकिन लगभग 10 साल तक काम करने के बाद भी, वे सिर्फ तीन प्रोडक्ट ही बना पाए और उनमें से कोई भी ठीक से नहीं बिका. कंपनी के सॉकर और सॉफ्टबॉल मैचों के दौरान, उनके साथी उनसे कहते थे, "आपने अभी तक कुछ भी क्यों नहीं बनाया? आपको नौकरी छोड़ देनी चाहिए!"

इसके बाद, शुक्रवार की रात को नाकामुरा अक्सर ऑफिस लौट आते थे और रात भर सिक्योरिटी गार्ड का एक्स्ट्रा काम करते हुए हॉल में घूमते रहते थे. नाकामुरा ने हंसते हुए कहा, "हां, मुझे पूरी कंपनी में घूम-घूमकर सब कुछ चेक करना पड़ता था." अकेलापन महसूस करते हुए, नाकामुरा ने एक ऐसी सोच अपनाई जिसे वह "गुस्से में आविष्कार" कहते हैं. यानी दूसरों को गलत साबित करने की जबरदस्त इच्छा. उनके सभी मैनेजरों ने उनसे एक ही बात कही, 'तुम्हें नौकरी छोड़ देनी चाहिए.' उन्होंने कहा, "मैं बहुत हताश हो गया था."

Advertisement

तब की नौकरी बचाने की आखिरी कोशिश

अपनी लैब में चीजों के साथ प्रयोग करने, कड़ी मेहनत करने और चीजों को धमाके के साथ उड़ाने के अनुभव ने उन्हें ब्लू LED का कोड क्रैक करने के अपने सपने को पूरा करने का विचार दिया. IBM, जनरल इलेक्ट्रिक, बेल लैब्स, सोनी और तोशिबा जैसी बड़ी कंपनियों ने इस रहस्य को सुलझाने की कोशिश में दशकों तक लाखों का निवेश किया. लाल और हरे LED बनाना तो आसान था, लेकिन नीले LED बनाने का तरीका नहीं मिल पा रहा था, क्योंकि नीली रोशनी की वेवलेंथ कम होती है और उसे निकालने के लिए बहुत ज्यादा ऊर्जा की जरूरत होती है.

दांव पर एक मल्टी-बिलियन डॉलर की इंडस्ट्री की संभावना लगी थी. अपनी नौकरी बचाने की आखिरी कोशिश में, नाकामुरा ने निचिया के फाउंडर और चेयरमैन नोबुओ ओगावा से संपर्क किया. नाकामुरा ने पूछा, "क्या मैं नीले LED बना सकता हूं?" इसके बाद जो हुआ, उस पर उन्हें यकीन ही नहीं हुआ. ओगावा ने कहा, "कर लो."

Advertisement

नाकामुरा को 3 मिलियन डॉलर का बजट दिया गया. 1988 में यह रकम बहुत बड़ी थी, जो कंपनी की सालाना बिक्री का 2% थी. इस पैसे का दो-तिहाई हिस्सा इक्विपमेंट के लिए था; बाकी पैसा ऐसी तकनीकें सीखने और समझने पर खर्च किया जाना था, जिनसे कोई बड़ी कामयाबी मिल सके. इसके बाद नाकामुरा ने फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी की एक लैब में मेटल-ऑर्गेनिक केमिकल वेपर डिपोजिशन (MOCVD) सीखने में एक साल बिताया.

34 साल की उम्र तक उन्होंने कभी हवाई जहाज में सफर नहीं किया था. उनका कोई साइंटिफिक पेपर भी पब्लिश नहीं हुआ था और इसी बात की वजह से फ्लोरिडा में उन्हें कम आंका गया. लैब में PhD करने वालों के लिए नाकामुरा एक मामूली इंसान थे, जिनकी कोई एकेडमिक काबिलियत नहीं थी. उन्होंने बताया कि वे उनके साथ एक निचले दर्जे के टेक्नीशियन जैसा बर्ताव करते थे और उनसे लगातार कुछ न कुछ ठीक करवाते रहते थे. उन्हें अंदर ही अंदर गुस्सा आता था. उन्होंने एक बार कहा था, "जब लोग मुझे कमतर समझते थे, तो मुझे बुरा लगता था. उस समय, मुझमें और ज्यादा लड़ने का जज्बा पैदा हुआ. मैंने तय किया कि मैं ऐसे लोगों से हार नहीं मानूंगा."

कामयाबी मिली पर फिर किस्मत का झटका

29 नवंबर, 1993 को निचिया ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जिसने इलेक्ट्रॉनिक्स की दुनिया को चौंका दिया. नीली LED बनाने में कामयाबी मिल गई थी. पता चला कि नाकामुरा सही थे: गैलियम नाइट्राइड ही असली कामयाबी की कुंजी साबित हुआ. फोर्ब्स मैगजीन ने एक बार लिखा था, "कुदरत पर काबू पाने वाले और एडिसन के उत्तराधिकारी असल में एक जापानी कंपनी के अनजान रिसर्चर निकले, जिसके बारे में बहुत कम लोगों ने सुना था." आखिरकार निशिया और नाकामुरा के बीच झगड़ा हो गया और दोनों ने एक-दूसरे पर मुकदमे किए. 2005 में दोनों पक्षों ने अपने बड़े विवाद को सुलझा लिया. निचिया ने उन्हें 8.1 मिलियन डॉलर देने पर सहमति जताई, जो उस लगभग 180 मिलियन डॉलर से बहुत कम था, जिसे जापानी अदालत ने नाकामुरा के आविष्कार के लिए सही ठहराया था. उन्होंने कहा कि लगभग सारा पैसा "वकील की फीस और टैक्स" में चला गया. वह अपने अतीत के उस हिस्से के बारे में ज्यादा बात नहीं करना चाहते. उन्हें अपने आविष्कार पर गर्व है. साथ ही, उन्होंने कहा, "नोबेल पुरस्कार जीतना ज्यादा बड़ी बात थी." उन्होंने कहा, "मैं बहुत खुश हूं."

"रिस्क लेना सबसे जरूरी है"

अब नाकामुरा भविष्य पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं और उन्हें लगता है कि बिना किसी उत्सर्जन (zero emissions) के असीमित ऊर्जा पैदा करने से पर्यावरण पर और भी बड़ा असर पड़ेगा. इस लक्ष्य को पाने के लिए, उन्होंने 'ब्लू लेजर फ्यूजन' नाम की एक कंपनी बनाई है. यह कंपनी उनकी ब्लू LED टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके ऐसी लेजर पावर बनाती है, जो दुनिया भर में ऊर्जा उत्पादन के तरीके को बदल सकती है. उनका अनुमान है कि पिछले कई दशकों में न्यूक्लियर फ्यूजन पर हुई लगभग 99.5% रिसर्च का फोकस शक्तिशाली मैग्नेटिक फील्ड का इस्तेमाल करके असीमित ऊर्जा पैदा करने पर रहा है. नाकामुरा का मानना ​​है कि इसका समाधान बाकी बचे 0.5% में छिपा है. नाकामुरा ने कहा, "यह कहानी ब्लू LED के विकास जैसी ही है." उन्होंने कहा कि हर जगह के युवा वैज्ञानिकों के लिए उनका संदेश यह है: "रिस्क लेना सबसे जरूरी है." शायद ऐसा करने से दुनिया बदल जाए.

Advertisement

यह भी पढ़ें-

दुनिया के गरीब देशों ने उठाया संसार को बचाने वाला कदम, बन रही 8000 किलोमीटर ग्रेट ग्रीन वॉल

Featured Video Of The Day
चढ़ावा चोरी मामला: पुलिस ने 3 आरोपियों की रिमांड मांगी
Topics mentioned in this article
Science & Technology
Science News
Technology News Hindi
Science Hindi News
Science Hindi News Latest