- नेपाल अपने आयात का लगभग 63 फीसद हिस्सा भारत से खरीदता है.
- पेट्रोलियम के लिए नेपाल की पूरी निर्भरता भारत पर ही है. पर बीते कुछ वर्षों में उसका झुकाव चीन की ओर बढ़ा है.
- 5 मार्च 2026 को होने जा रहे चुनाव के बाद जो सरकार बनेगी उसपर दोनों देशों के बीच व्यापार बहुत कुछ निर्भर करेगा.
नेपाल में गुरुवार (5 मार्च 2026) को होने वाले चुनावों को लेकर हलचल तेज है और काठमांडू से लेकर तराई तक सियासी सरगर्मियां चरम पर हैं. लेकिन सवाल सिर्फ सरकार बदलने का नहीं है, बड़ा सवाल ये है कि क्या इस चुनाव का असर भारत-नेपाल के बिजनेस रिश्तों पर पड़ेगा? आंकड़ों की बात करें तो भारत, नेपाल का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है. वर्ल्ड बैंक के मुताबिक नेपाल के कुल आयात का करीब 63 प्रतिशत हिस्सा भारत से आता है, जिसकी कीमत लगभग 8.6 अरब डॉलर है. इसके बाद नंबर आता है चीन का, जिसका हिस्सा करीब 13 प्रतिशत यानी 1.8 अरब डॉलर है.
पेट्रोल के लिए भारत पर निर्भर नेपाल और क्या खरीदता है?
नेपाल अपनी जरूरत की कई जरूरी चीजें, जैसे- पेट्रोलियम, आयरन-स्टील, ऑटोमोबाइल, मशीनरी, अनाज, रोजमर्रा के उपभोक्ता सामान आदि भारत से आयात करता है. बता दें कि नेपाल में इस्तेमाल होने वाला पेट्रोलियम करीब-करीब पूरी तरह से भारत से ही खरीदा जाता है. इसमें पेट्रोल, डीजल और एटीएफ शामिल हैं. खुली सीमा और दोनों देशों के बीच मजबूत सड़क और रेल संपर्क की वजह से दोनों देशों के बीच सामानों का आयात-निर्यात अन्य किसी भी देश की तुलना में अधिक आसान है. आज भारत से नेपाल में निर्यात वहां की जीडीपी का लगभग 16 फीसद है. खुली सीमा और मजबूत होती कनेक्टिविटी की वजह से नेपाल से भारत में आयात भी बीते कुछ वर्षों में बढ़ा है.
Photo Credit: PTI
भारत सरकार नेपाल में बुनियादी ढांचा विकसित करने में भी बड़े स्तर पर मदद दे रही है. इसके तहत भारत ने आयात-निर्यात की तस्करी रोकने और व्यापार को सुविधाजनक बनाने के उद्देश्य से लैंड कस्टम स्टेशन (एलसीएस) यानी बॉर्डर चेकपॉइंट्स को अपग्रेड किए हैं. इसके अलावा भारत की तरफ से बॉर्डर तक पहुंचने वाले हाइवे को भी अपग्रेड किया गया है. आज बीरगंज, नेपालगंज और विराटनगर में इंटीग्रेटेड चेक पोस्ट पूरी तरह काम कर रहे हैं. इससे दोनों देशों के बीच आर्थिक जुड़ाव और व्यापार लगातार बढ़ रहा है.
इतना ही नहीं, 1950 की भारत-नेपाल शांति और मैत्री संधि के तहत बड़ी संख्या में नेपाल के नागरिक भी भारत में काम करते हैं. वहीं बड़ी संख्या में भारतीय कंपनियां नेपाल में कारोबार कर रही हैं. ऐसे में राजनीतिक अस्थिरता या नीतियों में बदलाव का सीधा असर व्यापार पर पड़ सकता है.
चीन से क्या खरीदता है नेपाल, ये फैक्टर कितना बड़ा?
पिछले कुछ सालों में चीन ने नेपाल में इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश के जरिए अपनी मौजूदगी बढ़ाई है. दिसंबर 2025 के आंकड़ों के मुताबिक नेपाल ने चीन से कारें (15.7 मिलियन डॉलर), सेब और नाशपाती (12.4 मिलियन डॉलर) और टेलीफोन (11.9 मिलियन डॉलर) की खरीदारी की थी. इसके अलावा नेपाल, चीन से धातु के आभूषण, बेडशीट, बुने हुए कालीन और घंटियां भी खरीदता है.
चीन के साथ नेपाल बॉर्डर के पास कच्ची सड़क पर चलता एक ट्रक
Photo Credit: AFP
नेपाल के साथ चीन के व्यापारिक संबंध बीते कुछ वर्षों में (खास कर केपी शर्मा ओली के कार्यकाल के दौरान) तेजी से विकसित हुए हैं. चीन ने भी नेपाल में कई बुनियादी ढांचे संयुक्त भागीदारी में खड़े किए हैं, तो कई ऐसे प्रोजेक्ट्स में चीन एकल निवेशक है. हालांकि इस समय चीन की वजह से नेपाल को 2024-25 में कुछ सौ करोड़ रुपये के व्यापारिक घाटे का सामना करना पड़ा. हालांकि कुछ जलविद्युत परियोजनाएं (हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स), और बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव के तहत कुछ पर्यटन अवसरों की मौजूदगी की संभावनाएं जताई जा रही हैं.
लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि नेपाल की सप्लाई चेन अभी भी काफी हद तक भारत पर निर्भर है. समुद्री रास्ते की कमी और लॉजिस्टिक्स की चुनौती के कारण चीन के जरिए बड़े पैमाने पर आयात करना अभी भी जटिल और महंगा पड़ता है.
Photo Credit: NDTV
चुनाव के बाद क्या बदल सकता है?
अगर चुनाव के बाद ऐसी सरकार बनती है जो भारत के साथ रिश्तों को और मजबूत करने पर जोर देती है, तो व्यापार और निवेश बढ़ सकता है. नई इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं, बिजली व्यापार (हाइड्रोपावर), और सीमा पार कनेक्टिविटी को रफ्तार मिल सकती है. लेकिन अगर राजनीतिक माहौल में भारत को लेकर सख्त रुख अपनाया जाता है या चीन के साथ रिश्तों को ज्यादा अहमियत दी जाती है, तो भारत के साथ बिजनेस पर नकारात्मक असर देखने को मिल सकता है. हालांकि जानकार ये भी मानते हैं कि नेपाल की भौगोलिक स्थिति और आर्थिक जरूरतें ऐसी हैं कि भारत के साथ व्यापार को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा.
ऐसे में अगर चुनाव के बाद भारत-नेपाल रिश्तों में कोई खटास आती है तो इसका असर सबसे पहले आम लोगों पर दिख सकता है- ईंधन की कीमतें बढ़ सकती हैं, जरूरी सामान महंगा हो सकता है और छोटे कारोबारियों को दिक्कत हो सकती है. वहीं रिश्ते बेहतर रहने पर निवेश, रोजगार और बाजार में स्थिरता बनी रह सकती है. नेपाल के चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं हैं, बल्कि ये देश की आर्थिक दिशा भी तय करेंगे. फिलहाल आंकड़े साफ बताते हैं कि भारत नेपाल की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा सहारा है. इसलिए नई सरकार चाहे जो भी बने, भारत के साथ व्यापारिक रिश्तों को संतुलित और स्थिर रखना नेपाल के हित में ही माना जा रहा है.
ये भी पढ़ें: नेपाल में 5 मार्च को वोटिंग: राजशाही, प्रचंड-ओली या नया दौर?














