क्या किसी युद्ध से देश का खानपान बदल सकता है? ये देश है इस बात का सटीक उदाहरण

फ्रांस की सफेद ब्रेड की कमी ने काले अनाज और आलू की रोटी का चलन बढ़ाया, जो युद्ध के बाद भी बना रहा. जंग में खाद्य संकट के कारण फ्रांसीसियों ने जानवरों के चारे जैसी सब्जियां और नकली सामग्री खाना शुरू की.

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चेलो कबाब, कबाब कूबीदेह, आश रेश्तेह, मोरसा पोलो... ये ईरान का पारंपरिक खानपान के व्यंजन हैं. फर्ज कीजिए ईरान और अमेरिका के बीच जंग लंबी खींच जाए और इस खानपान में ही अंतर आ जाए. यानी जंग की वजह से खानपान बदल जाए. लोग इन पारंपरिक व्यंजन को भूल जाएं, क्या ऐसा संभव भी है? जब दो देश युद्ध के मैदान में आमने-सामने होते हैं, तो सिर्फ सरहदें नहीं बदलतीं, बल्कि आम आदमी की थाली का स्वाद तक भी बदल सकता है.

आज ईरान और अमेरिका के बीच तनाव को देखकर यह सवाल लाजिमी है कि क्या लंबी खींचने वाली जंग किसी देश के खानपान की पहचान मिटा सकती है? 

इसका जवाब इतिहास के पन्नों में छिपा है. युद्ध का प्रभाव इतना गहरा होता है कि यह सदियों पुरानी परंपराओं को उखाड़ फेंकता है. जब रसद की कमी होती है, तो इंसान वह खाने को मजबूर हो जाता है जिसे उसने कभी जानवरों के लिए छोड़ दिया था. इतिहास गवाह है कि जंग के बाद कई देशों ने अपने पसंदीदा पकवानों को भूलकर उन चीजों को अपना लिया जो केवल जिंदा रहने के लिए जरूरी थीं.

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फ्रांस के उदाहरण से समझते हैं कि कैसे एक भीषण युद्ध ने दुनिया के सबसे बेहतरीन खानपान वाले देश की आदतों को हमेशा के लिए बदल दिया.

जब फ्रांस की 'शान' पर भारी पड़ी जंग की 'भूख'

दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जून 1940 में जब जर्मन सेना ने फ्रांस पर कब्जा किया, तो वहां की खानपान संस्कृति पूरी तरह चरमरा गई. पनीर, मांस और बेहतरीन ब्रेड के लिए मशहूर फ्रांस में अचानक इन चीजों की किल्लत हो गई. बीबीसी फ्रांस के मुताबिक, 1942 आते-आते हालात इतने बदतर हो गए कि एक औसत फ्रांसीसी को दिन भर में केवल 1,110 कैलोरी ही मिल पा रही थी. यह वह दौर था जब खाने की कमी ने लोगों को अपनी पसंदीदा चीजें छोड़ने पर मजबूर कर दिया.

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जब जानवरों का चारा बना इंसानी भोजन

जंग में किल्लत ने फ्रांस में कई नई चीजों को जन्म दिया. वहां लोग इसे 'इरशात्ज़' (Ersatz) या विकल्प कहने लगे. जैसे चीनी की जगह सैकरिन ने ले ली, मक्खन की जगह चर्बी का इस्तेमाल होने लगा और असली कॉफी तो एक सपना ही बन गई थी. कॉफी की कमी को पूरा करने के लिए लोगों ने चने, जौ और चिकोरी की जड़ों को भूनकर पीना शुरू किया. आज भी फ्रांस के सुपरमार्केट में मिलने वाली 'चिकोरी कॉफी' इसी युद्ध की ही देन है.

जानकार बताते हैं कि रूटाबागा (एक तरह का शलजम) और यरूसलम आर्टिचोक (Topinambours) जैसी सब्जियां युद्ध से पहले केवल जानवरों को खिलाई जाती थीं. लेकिन जब आलू की कमी हुई, तो फ्रांसीसियों को इन्हीं 'जानवरों के चारे' पर निर्भर रहना पड़ा. युद्ध के बाद कई दशकों तक लोगों ने इन सब्जियों को छूना तक पसंद नहीं किया क्योंकि ये उन्हें गरीबी और बदहाली की याद दिलाती थीं.

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मैदा खाने का चलन भी लगभग खत्म ही हो गया था

फ्रांस की मशहूर सफेद ब्रेड (बागेट) भी युद्ध की भेंट चढ़ गई थी. 1940 के दशक में सफेद मैदा मिलना बंद हो गया और उसकी जगह काले अनाज, चेस्टनट और आलू के मिश्रण वाली रोटियां बनने लगीं. लोग अपने दोस्तों के घर जाते समय अपनी हिस्से की रोटी साथ ले जाते थे.

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युद्ध खत्म होने के बाद सफेद ब्रेड की चाहत इतनी बढ़ गई कि पारंपरिक 'खमीर वाली ब्रेड' (Sourdough) बनाने वालों को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा, क्योंकि लोग अब सिर्फ सफेद और आधुनिक ब्रेड खाना चाहते थे.

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