ऊर्जा संकट से लेकर NATO के बिखराव तक... ईरान-इजरायल युद्ध ने दुनिया में क्या-क्या बदला, 5 प्वाइंट्स में समझें

ईरान से युद्ध में अमेरिका ने जितना ईरान का नुकसान नहीं किया उससे कहीं ज्यादा उसे हुआ है. चाहे बात हथियारों की हो या फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अमेरिका और इजरायल को घेरने की. ईरान ने तारीख और समय बता-बता कर अमेरिकी ठिकानों और इजरायल पर बम बरसाए.

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ईरान-इजरायल युद्ध में कैसे फंसा सा महसूस कर रहा है अमेरिका
NDTV

मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध ने न केवल क्षेत्रीय सीमाओं बदला है, बल्कि इसने दशकों से चली आ रही वैश्विक व्यवस्था की नींव को भी हिलाकर रख दिया है. कहा तो यहां तक जा रहा है कि इस युद्ध को इतिहास में एक ऐसे मोड़ के रूप में याद किया जाएगा. जिसने "पुराने नियमों" को खत्म कर नए और जटिल समीकरण पैदा किए हैं. इस युद्ध ने जहां एक तरफ वैश्विक ऊर्जा संकट जैसे हालात पैदा किया वहीं दूसरी तरफ इस युद्ध ने अमेरिका की शाख पर भी बड़ा असर डाला है. आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि आखिर इस युद्ध ने क्या-क्या बदलकर रख दिया है. आज हम आपको विस्तार से बताने जा रहे हैं कि आखिर ईरान-इजरायल युद्ध ने दुनिया में क्या-क्या बदलकर रख दिया है. 

वैश्विक ऊर्जा का संकट हुआ खड़ा 

इस युद्ध का सबसे ज्यादा असर वैश्विक ऊर्जा सिस्टम पर पड़ा है. इसकी एक सबसे बड़ी और अहम वजह है कच्चा तेल. और फिलहाल इस कच्चे तेल पर या यूं कहें कि जिस समुद्री रास्ते से विश्व के 20 फीसदी कच्चे तेल की सप्लाई होती है, उसपर ईरान का कब्जा है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज वो रास्ता है जहां से दुनियाभर के जहाज कच्चा तेल लेकर जाते हैं. अब जब ईरान ने होर्मुज को ही बंद कर दिया तो ऐसे में दुनिया भर में ऊर्जा का संकट पैदा होने लगा है. इस रास्ते के बंद होने से वैश्विक तेल आपूर्ति श्रृंखला पूरी तरह से चरमरा गई है. हालांकि ईरान ने कुछ देशों को तेल जाने की छूट जरूर दी है. जिसमें भारत भी शामिल है.

उधर, इस युद्ध के दौरान तेल और गैस संयंत्रों को भी निशाना बनाया गया है. इजरायल ने ईरान के साउथ पार्स गैस क्षेत्र, जो दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस का भंडार है, पर हमला किया. इसके बाद ईरान ने कतर के रास लफ्फान औद्योगिक शहर पर हमला किया. ये वो शहर है जहां एलएनजी निर्यात संयंत्र है. इन हमलों ने ना सिर्फ खाड़ी देशों की समस्या बढ़ाई है बल्कि इससे दूसरे देशों को होने वाला सप्लाई चेन भी बुरी तरह से प्रभावित होगा. 

NATO में बिखराव और बदलता वर्ल्ड ऑर्डर

इस जंग से दुनिया के कई देश प्रभावित हो रहे हैं. तेल के दाम आसमान छू रहे हैं. इसके साथ ही एक नया वर्ल्ड ऑर्डर भी देखने को मिल रहा है. भले ही इस युद्ध में अमेरिकी सैन्य ताकत ज्यादा है, लेकिन ईरान हथियारों, मिसाइलों और ड्रोन से हमलों में कोई कसर नहीं छोड़ रहा. सबसे खास बात यह है कि नैरेटिव वॉर में ईरान कहीं आगे दिख रहा है.वहीं वैश्विक मंच पर अमेरिका कहीं ना कहीं अलग-थलग पड़ता जा रहा है. ईरान लगातार कह रहा है कि वो होर्मुज से अपने दोस्तों को रास्ता देगा, जिनमें भारत, चीन और फ्रांस जैसे देश शामिल हैं. वहीं NATO के अन्य देशों के लिए कोई एंट्री नहीं मिलेगी.इस युद्ध के शुरुआत से पहले से ही ईरान का सबसे बड़ा दोस्त रूस है. रूस ने ईरान को हथियार भी सप्लाई किए. वहीं इजरायल और अमेरिका ने जिस तरह ईरान पर हमला किया, उसका कड़ा विरोध भी किया. रूस की एम्बेसी ने एक पोस्ट किया है. इस पोस्ट में एक तस्वीर शेयर करते हुए यह संदेश दिया है कि अब होर्मुज से भारत, फ्रांस और चीन के लिए वीआईपी एंट्री मिलेगी. वहीं NATO के अन्य देश और अमेरिका के साथियों को कोई जगह नहीं मिलेगी.

अमेरिका की कमजोरियां उजागर हुईं

इस युद्ध के शुरू में किसी ने भी नहीं सोचा होगा कि 35 दिन के युद्ध के बाद अमेरिका अपने फैलाए जाल में ही फंसता नजर आएगा. आज स्थिति ये है कि इस युद्ध के दौरान अमेरिका ही नहीं इजरायल के डिफेंस सिस्टम की भी कई खामियां उजागर हुई हैं. ईरान से युद्ध में अमेरिका ने जितना ईरान का नुकसान नहीं किया उससे कहीं ज्यादा उसे नुकसान झेलना पड़ रहा है. चाहे बात हथियारों की हो या फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अमेरिका और इजरायल को घेरने की, ईरान ने कभी मौका नही छोड़ा. कई बार ईरान ने तारीख और समय बता-बता कर अमेरिकी ठिकानों और इजरायल पर बम बरसाए. ये हमले इतने घातक और इतनी बड़ी मात्रा में किए गए जिसका अनुमान शायद अमेरिका ने भी नहीं लगाया होगा. वहीं, दूसरी तरफ इस युद्ध के दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति की कथनी और करनी में भी काफी फर्क दिखा. साथ ही साथ युद्ध के दौरान ईरानी ड्रोन द्वारा  अमेरिकी रडार और संचार प्रणालियों पर सटीक हमलों ने भी इनकी संवेदनशीलता को उजाकर किया है. दूसरी, तरफ स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुला रखने या खुलवा पाने में अमेरिका अभी तक सफल नहीं हुआ है. जबकि उसके कई 'दोस्त' देश ईरान से बातचीत करके अपने लिए तेल और गैस की व्यवस्था कर रहे हैं. 

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आधुनिक हथियारों पर रणनीति का दबदबा

इस युद्ध में अगर बात आधुनिक हथियारों की करें तो इस में भी ईरान काफी आगे दिख रहा है. चाहे बात अमेरिकी जेट्स को मार गिराने की बात हो या फिर उनके रडार सिस्टम को तबाह करने की. ईरान ने अपने ड्रोन और हथियारों से अमेरिका को कड़ी टक्कर दी है. बात अगर रणनीति की करें तो ईरान इस क्षेत्र में भी इजरायल और अमेरिका से कई मौंकों पर आगे दिखा है. ईरान ने अपनी रणनीति के तहत बेहद सस्ते ड्रोनों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया ताकि युद्ध में उसका खर्च कम हो. लेकिन इन ड्रोन्स को गिराने के लिए इजरायल और अमेरिका को अपने लाखों डॉलर के पैट्रियर और आयरन डोम इंटरसेप्टर खर्च करने पड़े. यहां ईरान ने ये रणनीति अपनाई की दुश्मन के महंगे रक्षा भंडार को पहले खाली करा दिया जाए. उसकी ये रणनीति काफी हद तक सही भी साबित हुई. इस युद्ध के दौरान ईरान-इजरायल ने साइबर युद्ध का भी एक बेहद हैरान करने वाला उदाहरण पेश करके दिखाया है. ईरान औऱ इजरायल ने के हैकर्स ने इस युद्ध को मिसाइल हमलों से भी आगे तक पहुंचा दिया. ईरान ने तो कई बड़े अमेरिकी अधिकारियों के एकाउंट को भी हैक करने का दावा किया गया. साथ ही साथ साइबर हमलों की मदद से इन दोनों देशों ने बिजली ग्रिड, संचार प्रणालियों और रडार को भी निशाना  बनाया. 

अजेय समझे जाने वाले अमेरिकी जेट उड़ते ताबूत की तरह गिरे

इस युद्ध के शुरू होने से पहले दुनिया अमेरिका और इजरायल को अजेय समझ रही थी. लेकिन ईरान ने हर बीतते दिन के साथ दोनों देशों ना सिर्फ कड़ी टक्कर दी बल्कि ये भी बता दिया भले ही उसे भी इस युद्ध में नुकसान हुआ है लेकिन वो भी करारा जवाब देने के लिए तैयार बैठा है. इसका एक उदाहरण तीन अप्रैल को उस समय दिखा जब ईरान ने अमेरिका के F-15E फाइटर जेट को मार गिराने का दावा किया. जिसे बाद में अमेरिका ने भी माना कि ईरान के साथ युद्ध में उसका एक जेट मार गिराया गया है. ईरान ने पहले भी फाइटर जेट को मार गिराने का दावा किया था.

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