ट्रंप की टैरिफ की मार से उबरने वाला दुनिया का पहला बाजार बना भारत

भारतीय बाजारों ने लंबे समय से चीनी निवेश को सीमित रखा है, जिसके कारण चीन पर किसी बड़े प्रभाव का भारत पर कम असर पड़ता है.

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मुंबई:

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के टैरिफ से ऐसी खलबली मची कि दुनियाभर के बाजारों औंधे-मुंह गिर गए. जब सारी दुनिया के बाजारों में ट्रंप के टैरिफ से कोहराम मचा हुआ था. तब पूरी दुनिया में भारत बाजार इकलौता बन गया जो टैरिफ की मार से उबर चुका है. भारतीय शेयर बाजार ने ट्रंप के रेसिप्रोकल टैरिफ घोषणा से हुए नुकसान को पूरी तरह उबरकर दुनिया में पहला स्थान हासिल कर लिया है. देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में सोमवार को अंबेडकर जयंती के अवकाश के बाद व्यापार शुरू होने पर बाजार में तेजी देखी गई. नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) का निफ्टी 50 सूचकांक के कारोबारी सत्र में मुंबई में 2.4 प्रतिशत तक उछला, जिससे यह सूचकांक 2 अप्रैल के स्तर पर पहुंच गया, जब राष्ट्रपति ट्रंप ने टैरिफ पर कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए थे.

ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक निवेशक ट्रंप के टैरिफ से उत्पन्न वैश्विक अस्थिरता के बीच भारतीय बाजारों को "तुलनात्मक रूप से सुरक्षित" मान रहे हैं.

भारत क्यों है अलग?

रिपोर्ट के अनुसार, 1.4 अरब से अधिक आबादी और बड़े घरेलू निवेशकों के साथ, भारतीय बाजार संभावित वैश्विक मंदी का सामना करने की बेहतर क्षमता रखते हैं. ग्लोबल सीआईओ ऑफिस के सीईओ गैरी डुगन ने ब्लूमबर्ग को बताया, "हम अपने पोर्टफोलियो में भारत को ज्यादा तवज्जों दे रहे हैं." उन्होंने कहा कि अच्छी घरेलू वृद्धि और चीन से आपूर्ति श्रृंखलाओं के विविधीकरण की संभावना से भारतीय इक्विटी मध्यम अवधि में सुरक्षित दांव मानी जा रही है.

चीन से दूरी

भारतीय बाजारों ने लंबे समय से चीनी निवेश को सीमित रखा है, जिसके कारण चीन पर किसी बड़े प्रभाव का भारत पर कम असर पड़ता है. अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते व्यापार युद्ध के बीच भारतीय बाजार और भारत एक निवेश वाली जगह के रूप में देखा जा रहा है. भारत का मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर भी तेजी से बढ़ रहा है, और देश को अब चीन के विकल्प के रूप में मैन्यूफैक्चरिंग हब के रूप में देखा जा रहा है. जहां बीजिंग ने जवाबी कार्रवाई करते हुए वाशिंगटन के साथ टैरिफ वॉर का रास्ता चुना, वहीं नई दिल्ली ने बातचीत को तवज्जों दी. 

भारतीय बाजार पर असर

भारतीय शेयर बाजार का यह उछाल पिछले दो तिमाहियों में इक्विटी बेंचमार्क में लगभग 10 प्रतिशत की गिरावट के बाद आया है. ट्रंप के टैरिफ के बाद बिकवाली चरम पर थी, लेकिन अन्य कारणों में विकास पूर्वानुमान में मामूली कमी और उच्च मूल्यांकन शामिल थे. ब्लूमबर्ग के अनुसार, विदेशी फंडों ने इस साल लोकल इक्विटी में 16 अरब डॉलर से अधिक की शुद्ध बिक्री की है, जबकि 2022 में अधिकतम 17 अरब डॉलर की निकासी हुई थी.

ट्रंप के टैरिफ कदम के बाद समर्थन देते हुए, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने ब्याज दरों में कटौती की है, और अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह नुकसान से राहत के उपायों को संतुलित करने के लिए ऐसा करना जारी रख सकता है. इससे देश में निवेशकों का विश्वास भी बढ़ा है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में गिरावट भी भारत में सकारात्मक निवेशक भावना का एक कारण है, जो एक प्रमुख कच्चा तेल आयातक देश है.

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डेटा क्या कहता है?

ब्लूमबर्ग डेटा के अनुसार, "निफ्टी 50 बेंचमार्क वर्तमान में अपनी 12 महीने की अग्रिम आय अनुमान के 18.5 गुना पर कारोबार कर रहा है, जो पांच साल के औसत 19.5 गुना और सितंबर के अंत में अपने चरम पर 21 गुना की तुलना में कम है." एक अन्य डेटा सेट से पता चलता है कि भारत टैरिफ से कहीं बेहतर ढंग से सुरक्षित है, क्योंकि यह अमेरिकी आयात में केवल 2.7 प्रतिशत हिस्सा रखता है, जबकि चीन 14 प्रतिशत और मैक्सिको 15 प्रतिशत है.

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