कौन हैं भारतीय मूल की महिला स्मिता घोष, जो नागरिकता के मामले में कर रही हैं ट्रंप से मुकाबला

स्मिता घोष का कहना है कि अमेरिकी संविधान का 14वां संशोधन जन्मसिद्ध नागरिकता की रक्षा करता है.

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अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही लिए गए बर्थ राइट सिटीजनशिप फैसले को भारतीय मूल की एक वकील ने सुप्रीम कोर्ट में कड़ी चुनौती दी है. ट्रंप बनाम बारबरा केस में स्मिता घोष नाम की यह वकील ट्रंप के उस एग्जीक्यूटिव ऑर्डर के खिलाफ ढाल बनकर खड़ी हो गई हैं, जिसके जरिए जन्मसिद्ध नागरिकता (बर्थराइट सिटिजनशिप) को खत्म करने की कोशिश की जा रही है.

स्मिता घोष एक प्रतिष्ठित वकील और संवैधानिक विशेषज्ञ हैं. वर्तमान में वह 'कांस्टीट्यूशनल अकाउंटेबिलिटी सेंटर' (CAC) में सीनियर अपीलेट काउंसिल के पद पर तैनात हैं. स्मिता की पहचान केवल एक वकील के तौर पर ही नहीं, बल्कि एक प्रखर कानूनी इतिहासकार के तौर पर भी है. उन्होंने पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री (JD) के साथ-साथ लीगल हिस्ट्री में पीएचडी भी की है. 

लीगल प्रैक्टिस करने से पहले स्मिता जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी लॉ सेंटर में रिसर्च फेलो थीं. उन्होंने यहां 'इमिग्रेशन लॉ' जैसे जटिल विषयों को पढ़ाया है. उनके पास जज के क्लर्क से लेकर नागरिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले प्रसिद्ध संगठन NAACP के साथ काम करने का लंबा अनुभव है. यही वजह है कि उन्होंने ट्रंप प्रशासन के नागरिकता संबंधी आदेश में मौजूद कानूनी खामियों को बारीकी से पकड़ा है.

बर्थ राइट सिटीजनशिप को लेकर ट्रंप के खिलाफ क्यों उतरीं स्मिता?

ट्रंप का तर्क है कि अमेरिका में रहने वाले प्रवासियों (विशेषकर अवैध या अस्थाई) के बच्चों को जन्म के आधार पर मिलने वाली नागरिकता खत्म होनी चाहिए. इसके जवाब में स्मिता घोष ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी दलीलें पेश की हैं. उनका कहना है कि अमेरिकी संविधान का 14वां संशोधन स्पष्ट रूप से कहता है कि अमेरिका की धरती पर जन्म लेने वाला हर बच्चा अमेरिकी नागरिक है.

स्मिता ने अपनी दलीलों में 1844 के एक पुराने कानूनी मामले (जूलिया लिंच केस) का हवाला दिया है. उन्होंने बताया कि उस समय भी न्यूयॉर्क की एक अदालत ने माना था कि आयरिश माता-पिता के बच्चे को नागरिकता मिलनी चाहिए, भले ही वे वहां अस्थाई रूप से रह रहे हों. स्मिता का कहना है कि 14वां संशोधन किसी नए कानून को नहीं लाया था, बल्कि यह पहले से चले आ रहे इसी अधिकार को संवैधानिक मजबूती देने के लिए बनाया गया था.

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ट्रंप प्रशासन क्या कह रहा है?

  • ट्रंप प्रशासन का दावा है कि जन्मसिद्ध नागरिकता का अधिकार कुछ खास परिस्थितियों में नहीं मिलना चाहिए.
  • जबकि स्मिता और उनके साथ जुड़े वकीलों का समूह इसे संविधान के मूल ढांचे पर हमला मान रहा है.
  • स्मिता ने कहा कि माता-पिता का इमिग्रेशन स्टेटस चाहे जो भी हो, अमेरिका में जन्म लेने वाला बच्चा नागरिक ही रहेगा और कोई भी कार्यकारी आदेश संविधान की इस मूल भावना को नहीं बदल सकता.

स्मिता घोष ने अपनी रिसर्च और ऐतिहासिक तथ्यों के जरिए ट्रंप के आदेश को 'असंविधानिक' करार दिया है. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि इस आदेश को लागू होने से रोका जाए क्योंकि यह उन लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है जिन पर अमेरिका की नींव टिकी है.

क्या है ट्रंप बनाम बारबरा केस?

2025 में अपना दूसरा कार्यकाल शुरू करते ही राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश जारी किया. इस आदेश का उद्देश्य उन बच्चों को अमेरिकी नागरिकता देने से रोकना है जिनके माता-पिता के पास अमेरिका में कानूनी स्थायी निवास (Green Card) या नागरिकता नहीं है, भले ही वे बच्चे अमेरिकी धरती पर पैदा हुए हों.

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'बारबरा' एक छद्म नाम है जिसका इस्तेमाल इस क्लास-एक्शन मुकदमे में मुख्य वादी के रूप में किया गया है. यह मामला उन परिवारों का प्रतिनिधित्व करता है जिनके बच्चे इस आदेश के कारण अपनी नागरिकता खोने के जोखिम में हैं. इसमें एक ऐसी मां शामिल है जो शरण के लिए आवेदन कर रही है और जिसका बच्चा अमेरिका में पैदा हुआ है.

इस केस में मुख्य बहस अमेरिकी संविधान के 14वें संशोधन की व्याख्या पर की जा रही है. अमेरिकी संविधान के अनुसार, अमेरिका में पैदा हुए सभी व्यक्ति अमेरिका के नागरिक हैं. इसे Jus Soli या मिट्टी का अधिकार कहा जाता है.

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