खंडहरों में रोजा, सड़क पर इफ्तारी... जंग रुकने के बाद गाजा में आया पहला रमजान- PHOTOS

Ramadan in Gaza: जंग की तबाही में अपना बचपन खो चुके गाजा के बच्चों के चेहरों पर खुशी है और थोड़ी राहत भी. हो भी क्यों नहीं, बीते साल अक्टूबर में हुए युद्धविराम के बाद का यह पहला रमजान जो है.

विज्ञापन
Read Time: 5 mins
Ramadan in Gaza: जंग रुकने के बाद गाजा में आया पहला रमजान
फटाफट पढ़ें
Summary is AI-generated, newsroom-reviewed
  • गाजा के लोग रमजान के पाक महीने में युद्ध के बाद पहली बार उम्मीद और राहत की भावना महसूस कर रहे हैं
  • अक्टूबर में हुए युद्धविराम के बाद भी गाजा के कई हिस्सों में तोपों से हमले और तबाही जारी है
  • गाजा के हजारों लोग अभी भी अस्थायी टेंटों में रह रहे हैं और पुनर्निर्माण का इंतजार कर रहे हैं
क्या हमारी AI समरी आपके लिए उपयोगी रही?
हमें बताएं।

रमजान का पाक महीना गाजा के लोगों के लिए एक उम्मीद लेकर आया है, उम्मीद इस बात की कि वक्त बदलेगा, उम्मीद इस बात की कि उपर वाले का करम होगा और गाजा तबाही का पर्याय भर नहीं रह जाएगा. पाक महीना के शुरू होने के साथ गाजा सिटी में ढही हुई इमारतों और मलबे के ढेरों से सजी सड़कों पर छोटे-छोटे लालटेन और स्ट्रिंग लाइट्स दिखाई देने लगी हैं. जंग की तबाही में अपना बचपन खो चुके गाजा के बच्चों के चेहरों पर खुशी है और थोड़ी राहत भी. हो भी क्यों नहीं, बीते साल अक्टूबर में हुए युद्धविराम के बाद का यह पहला रमजान जो है.

एएफफी की रिपोर्ट के अनुसार ओमारी मस्जिद में दर्जनों नमाजियों ने रमजान की पहली सुबह फज्र की नमाज अदा की. कालीन पर उनके पैर नंगे थे, लेकिन सर्दी से बचने के लिए उन्होंने भारी जैकेट पहन रखी थीं. गाजा सिटी के रहने वाले अबू आदम भी नमाज पढ़ने आए थे. उन्होंने एएफपी से कहा, “कब्जे, मस्जिदों और स्कूलों के विनाश और हमारे घरों को गिराए जाने के बावजूद… हम इन कठिन हालात में आए हैं.”

उन्होंने कहा, “बीती रात भी, जब इस इलाके को निशाना बनाया गया, तब भी हम अल्लाह की इबादत के लिए मस्जिद जाने के अपने इरादे पर कायम रहे.”

गाजा के एक सुरक्षा सूत्र ने बुधवार को एएफपी को बताया कि उस सुबह गाजा सिटी के पूर्वी इलाकों में तोपों से हमले किए गए थे. सूत्र ने यह भी कहा कि मध्य गाजा के एक शरणार्थी शिविर को भी तोपों से निशाना बनाया गया. बता दें कि इजरायल अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों को गाजा पट्टी में प्रवेश की अनुमति नहीं देता. इसकी वजह से मरने वालों के आंकड़ों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो पाती है.

खुशी लेकिन दर्द में घुली

अक्टूबर 2025 में अमेरिका की मध्यस्थता से हुए युद्धविराम (सीजफायर) के बाद भी गाजा के दक्षिण में हजारों लोग अभी तक टेंट और अस्थायी सेल्टर में रह रहे हैं. उन्हें इंतजार है कि उनके इलाके में पुनर्निर्माण किया जाएगा. अल-मवासी इलाके में एक टेंट में रहने वाली निविन अहमद ने एएफपी से कहा कि युद्ध के बिना यह पहला रमजान है और यह हमारे लिए “मिले-जुले और अलग-अलग एहसास” लेकर आया है.

उन्होंने कहा, “खुशी दब गई है. हमें उन लोगों की याद आती है जो शहीद हो गए, अब भी लापता हैं, हिरासत में हैं या कहीं चले गए हैं.” 50 साल के निविन अहमद ने कहा, “पहले रमजान के वक्त टेबल हर तरह के स्वादिष्ट पकवानों से भरा रहता था. हमारे सभी अपने लोग साथ होते थे. लेकिन आज मैं मुश्किल से एक मेन डिश और एक साइड डिश बना पाती हूं. सब कुछ महंगा है. मैं न तो इफ्तार पर और न ही सहरी पर किसी को बुला सकती हूं.”

Advertisement

गौरतलब है कि युद्धविराम के बावजूद गाजा में अब भी कमी बनी हुई है. कमजोर अर्थव्यवस्था और भारी तबाही के कारण ज्यादातर लोग अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए किसी न किसी हद तक दूसरे देशों से मिलने वाले मानवीय सहायता पर निर्भर हैं. लेकिन संयुक्त राष्ट्र और सहायता संगठनों के मुताबिक, पूरे गाजा में अंदर जाने वाले एंट्री प्वाइंट पर इजरायल का नियंत्रण है. इस कारण पर्याप्त सामान गाजा के अंदर नहीं आ पाता, जिससे कीमतें कम नहीं हो पा रही हैं.

सबके बावजूद रमजान खास है

37 साल की महा फाठी गाजा सिटी से विस्थापित हैं और शहर के पश्चिम में एक तंबू में रहती हैं. उन्होंने एएफपी से कहा, “गाजा में इतनी तबाही और दुख के बावजूद रमजान अब भी खास है. युद्ध के दौरान जब हर कोई अपने-अपने हाल में उलझा था, उसके बाद अब लोग फिर से एक-दूसरे के दुख को समझने लगे हैं.”

Advertisement

उन्होंने बताया कि उनका परिवार और पड़ोसी सहरी के लिए खाना तैयार करते समय और रमजान की सजावट लगाते हुए खुशी के पल साझा कर पा रहे हैं. "हर कोई रमजान के माहौल को तरस रहा है. सजावट और बाजारों की चहल-पहल देखकर हमें स्थिरता की वापसी की उम्मीद मिलती है.”

वहीं मध्य गाजा के देर अल-बलाह के समुद्र तट पर, फिलिस्तीनी कलाकार यजीद अबू जराद ने अपनी कला से रमजान का माहौल बनाया. भूमध्य सागर के पास रेत में उन्होंने अरबी में सुंदर से “वेलकम रमजान” उकेरा, जिसे पास के तंबू शिविर के बच्चे उत्सुकता से देख रहे थे.

Advertisement

बता दें कि इजरायल और हमास के बीच दो साल से अधिक समय तक चले युद्ध के दौरान, गाजा के करीब 22 लाख निवासियों में से लगभग सभी लोग कम से कम एक बार विस्थापित हुए. यह युद्ध 7 अक्टूबर को हमास के हमले के बाद शुरू हुआ था.

43 साल के मोहम्मद अल-मधून भी गाजा सिटी के पश्चिम में एक तंबू में रहते हैं और बेहतर दिनों की उम्मीद करते हैं. उन्होंने कहा, “मुझे उम्मीद है कि यह आखिरी रमजान होगा जो हम तंबुओं में बिताएं. जब मेरे बच्चे मुझसे लालटेन खरीदने को कहते हैं और अपनी पसंदीदा चीजों से भरी इफ्तार की मेज का सपना देखते हैं, तो मैं खुद को उनके सामने बेबस महसूस करता हूं.”

Advertisement

यह भी पढ़ें: गाजा के स्कूलों में 2 साल बाद लौटे बच्चे, लेकिन डिप्रेशन और जली किताबों के बीच कैसे होगी पढ़ाई?

Featured Video Of The Day
Delhi में द्वारका के कई स्कूलों में बम की धमकी | BREAKING NEWS | Delhi News
Topics mentioned in this article