डॉक्टर बनने-बनते तानाशाह कैसे बन गए बशर अल-असद, पढ़ें अर्श से फर्श तक की पूरी कहानी

सीरिया के पूर्व राष्ट्रपति बशर अल-असद कभी राजनीति में नहीं आना चाहते थे लेकिन भाई की असमय मौत ने उनकी किस्मत पलट दी. पर कभी लोकतंत्र, आधुनिकीकरण, विकास की बात करने वाले असद आखिर निरंकुश शासक कैसे बन गए?

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बशर अल-असद राष्ट्रपति नहीं, डॉक्टर बनना चाहते थे
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  • अपने बड़े भाई बासेल की तरह बशर अल-असद ने राजनीति नहीं, मेडिसिन को करियर चुना.
  • लेकिन बड़े भाई की मौत ने डॉक्टर बनने की उनकी राह बदल दी और पिता की मौत के बाद सीरिया के राष्ट्रपति बने.
  • उनसे लोकतंत्र की उम्मीद की गई लेकिन उनका राजनीतिक सफर सीरिया के सबसे लंबे खूनी संघर्षों में से एक बन गया.

सीरिया के पूर्व राष्ट्रपति बशर अल-असद और उनके छोटे भाई को मौत की सजा सुनाई गई है. सीरिया में 14 साल लंबे संघर्ष के दौरान मानवता के खिलाफ अपराध और युद्ध अपराधों के लिए दोषी ठहराते हुए अदालत ने उन्हें मौत की सजा सुनाई. इस दौरान उनके ममेरे भाई आतिफ नजीब को भी मौत की सजा सुनाई गई. आतिफ इस समय सीरियाई जेल में हैं. अदालत ने जब ये सजा सुनाई तब नजीब को कैदी की पोशाक में पिंजरे में रखा गया था. लंबे गृह युद्ध के दौरान जब राजधानी दमिश्क में विद्रोहियों ने प्रवेश किया तब असद और उनके भाई माहेर रूस भाग गए थे.

बशर अल-असद की कहानी किसी ऐसे नेता की कहानी नहीं है जिसे बचपन से ही देश की सत्ता संभालने के लिए तैयार किया गया था. वह सीरिया की राजनीति और सेना से दूर रहकर डॉक्टर बनना चाहते थे. वह लंदन में ऑप्थैल्मोलॉजी यानी नेत्र चिकित्सा की पढ़ाई कर रहे थे और पश्चिमी जीवनशैली में रम गए थे. लेकिन 1994 की शुरुआत में हुई एक कार दुर्घटना ने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी.

झंडे पर बशर अल-असद के भाई बासेल की तस्वीर
Photo Credit: AFP

सीरिया की राजधानी दमिश्क के पास उनके बड़े भाई बासेल अल-असद की कार दुर्घटना में मौत हो गई. बासेल को उनके पिता हाफिज अल-असद का राजनीतिक उत्तराधिकारी माना जाता था. भाई की मौत के बाद बशर को तुरंत लंदन से वापस बुलाया गया और उन्हें सीरिया की सत्ता संभालने के लिए तैयार किया जाने लगा.

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करीब छह साल बाद साल 2000 में 34 साल की उम्र में बशर अल-असद सीरिया के राष्ट्रपति बन गए. शुरुआत में उन्होंने लोकतंत्र, आधुनिकीकरण, विकास और सबसे सामने सच रखने जैसी बातें कीं. लोगों को लगा कि देश में बदलाव का नया दौर शुरू होगा. लेकिन कुछ ही समय बाद राजनीतिक दमन फिर लौट आया.

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इसके बाद 2011 में अरब जगत में शुरू हुआ जनआंदोलन सीरिया तक पहुंचा. देखते ही देखते यह एक बड़े गृह युद्ध में बदल गया. लाखों लोगों की जानें गईं और करोड़ों लोग विस्थापित हुए. असद सरकार पर हत्या, यातना और रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल समेत कई गंभीर आरोप लगे.

तो आखिर डॉक्टर बनने की तैयारी कर रहा एक युवा सत्ता में आने के बाद ऐसा नेता कैसे बना, जिसके शासन को निरंकुश कहा गया?

बशर अल-असद का पूरा परिवार
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अलावाइत परिवार में जन्म और पिता की सत्ता

बशर अल-असद का जन्म 1965 में हुआ. उनके पिता हाफिज अल-असद और मां अनीसा मखलूफ थीं. यह वह दौर था जब सीरिया समेत पूरे अरब क्षेत्र में अरब राष्ट्रवाद का प्रभाव था. मिस्र और सीरिया का 1958 से 1961 तक चला एकीकरण असफल हो चुका था और इसके बाद बाथ पार्टी सत्ता में आई. सीरिया में तब लोकतंत्र और बहुदलीय चुनाव की व्यवस्था नहीं थी. असद परिवार अलावाइत समुदाय से ताल्लुक रखता है. आर्थिक मुश्किलों के कारण इस समुदाय के बड़ी संख्या में लोग सीरियाई सेना में शामिल हुए.

बशर अल-असद के पिता और पूर्व राष्ट्रपति हाफिज अल-असद
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हाफिज अल-असद भी सेना और बाथ पार्टी में तेजी से आगे बढ़े. 1966 में वह रक्षा मंत्री बने और 1971 में राष्ट्रपति बन गए. साल 2000 तक उन्होंने देश पर शासन किया. उनका शासन बेहद कड़ा था. उस दौरान विपक्ष को दबाया गया. लोकतांत्रिक चुनाव नहीं कराए गए. हालांकि विदेश नीति में हाफिज अल-असद ने समझदारी भरा रवैया अपनाया. सोवियत संघ के साथ गठबंधन के बावजूद 1991 के खाड़ी युद्ध में उन्होंने अमेरिका के नेतृत्व वाले गठबंधन का साथ दिया.

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असद की पत्नी अपने बच्चों के साथ
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राजनीति बशर की पहली पसंद नहीं, मेडिसिन थी

अपने बड़े भाई बासेल की तरह बशर अल-असद ने राजनीति नहीं, मेडिसिन को करियर चुना. दमिश्क यूनिवर्सिटी से पढ़ाई पूरी करने के बाद 1992 में वह ऑप्थैल्मोलॉजी में एक्सपर्ट बनने के लिए लंदन चले गए. वेस्टर्न आई हॉस्पिटल में पढ़ाई की. एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्ट में बताया गया कि तब बशर अल-असद पश्चिमी संस्कृति से खासे प्रभावित थे और अंग्रेजी गायक फिल कोलिंग को काफी पसंद करते थे. लंदन में ही उनकी मुलाकात आसमा अल-अखरास से हुई. आसमा किंग्स कॉलेज में कंप्यूटर साइंस पढ़ रही थीं. बाद में उन्होंने हावर्ड से एमबीए में दाखिला लिया. आगे चल कर आसमा ही बशर की बेगम बनीं.

सीरियाई सेना के एक ट्रक की खिड़की पर बशर अल-असद के भाई बासेल का पोट्रेट
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भाई की मौत ने बदल दी पूरी जिंदगी

इसी बीच जनवरी 1994 में उनके बड़े भाई बासेल अल-असद की कार दुर्घटना में मौत हो गई. तब बशर को लंदन से वापस बुलाया गया. डॉक्टर बनने की उनकी राह यहां से बदल गई, और शुरू हो गई सीरियाई सत्ता के उत्तराधिकारी की तैयारी. उन्हें सेना में शामिल होना पड़ा. उनकी छवि एक भावी नेता के तौर पर तैयार की जाने लगी.

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कुछ ही सालों बाद जब पिता हाफिस अल-असल की मौत हो गई तो बशर केवल 34 साल की उम्र में सीरिया के राष्ट्रपति बने. तब सीरिया में राष्ट्रपति बनने की न्यूनतम उम्र 40 साल थी पर बशर इस पद पर विराजमान हो सकें, इसके लिए यह सीमा घटाई गई.

बशर अल-असद ने राजधानी दमिश्क स्थित सीरियाई संसद में 17 जुलाई 2000 को राष्ट्रपति के पद की शपथ ली
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राष्ट्रपति बनते ही बदलाव की उम्मीद जगी

साल 2000 में सत्ता संभालने के बाद बशर ने नया राजनीतिक सुर अपनाया. उन्होंने ईमानदारी, लोकतंत्र, विकास, आधुनिकीकरण, जवाबदेही और संस्थागत सोच की बात की. उनके बयानों से सीरियाई लोगों में उम्मीदें पैदा हुईं. उनकी पश्चिमी शिक्षा और पत्नी आसमा की पृष्ठभूमि ने भी इस उम्मीद को मजबूत किया.

कुछ समय के लिए देश में नागरिक बहस और अपेक्षाकृत ज्यादा अभिव्यक्ति की आजादी देखने को मिली. इस दौर को 'दमिश्क स्प्रिंग' कहा गया.

लेकिन यह दौर ज्यादा लंबा नहीं चला. 2001 में सुरक्षा बलों ने सरकार के मुखर आलोचकों की गिरफ्तारियां शुरू कर दीं और राजनीतिक दमन फिर बढ़ गया.

बशर ने सीमित आर्थिक सुधार भी किए. निजी क्षेत्र के लिए कुछ रास्ते खुले. इसी दौर में उनके चचेरे भाई रामी मखलूफ का आर्थिक प्रभाव तेजी से बढ़ा. आलोचकों के लिए उनका उभार सत्ता और संपत्ति के गठजोड़ का उदाहरण बन गया.

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इराक युद्ध और पश्चिम से बढ़ती दूरी

2003 में अमेरिका के इराक युद्ध ने बशर और पश्चिमी देशों के रिश्तों को और खराब कर दिया. बशर ने अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का विरोध किया. अमेरिका ने सीरिया पर आरोप लगाया कि वह इराक में अमेरिकी सेना का विरोध करने वाले गुटों को हथियारों की तस्करी पर आंखें मूंद रहा है और चरमपंथियों को सीमा पार करने की अनुमति दे रहा है.

दिसंबर 2003 में अमेरिका ने सीरिया पर कई कारणों से प्रतिबंध लगाए. इनमें इराक के अलावा लेबनान में सीरिया की मौजूदगी भी शामिल थी.

2005 में लेबनान के पूर्व प्रधानमंत्री रफीक हरीरी की हत्या के बाद सीरिया पर अंतरराष्ट्रीय दबाव और बढ़ गया. हरीरी सीरिया के प्रमुख विरोधियों में थे. उनकी हत्या के बाद लेबनान में बड़े विरोध प्रदर्शन हुए और सीरिया को करीब 30 साल की सैन्य मौजूदगी के बाद वहां से हटना पड़ा.

हमजा अली अल-खतीब की मां समीरा हहामी. हमजा 2011 में 13 साल की उम्र में सीरियाई सरकार के जरिए टॉर्चर किए जाने के बाद मारे गए थे. बाद में हमजा सीरियाई विद्रोह का एक प्रतीक बन गए.
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2011 ने सब कुछ बदल दिया

दिसंबर 2010 में आसमा अल-असद ने वोग मैग्जीन को इंटरव्यू दिया. उसी समय ट्यूनीशिया में एक सब्जी बेचने वाले के खुद को आग लगाने की घटना के बाद वहां जनआंदोलन शुरू हो गया था. ट्यूनीशिया से शुरू हुआ ये आंदोलन मिस्र, लीबिया, यमन, बहरीन और आखिरकार सीरिया भी पहुंच गया.

मार्च 2011 में सीरिया के दमिश्क और फिर दक्षिणी-पश्चिम शहर दरआ में विरोध प्रदर्शन शुरू हुए. दरआ में बच्चों को असद विरोधी नारे लिखने के आरोप में गिरफ्तार किए जाने के बाद गुस्सा और बढ़ गया.

बशर ने शुरुआती प्रदर्शनों के करीब दो हफ्ते बाद देश को संबोधित किया. उन्होंने माना कि लोगों की कई जरूरतें पूरी नहीं हो रही हैं, लेकिन साथ ही सीरिया में 'साजिश' को नाकाम करने की बात कही.

इसके बाद सुरक्षा बलों की कार्रवाई और तेज हो गई. दरआ में प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी ने विरोध को और भड़का दिया. जल्द ही कई शहरों में असद के इस्तीफे की मांग होने लगी.

कुछ ही महीनों में प्रदर्शन सशस्त्र संघर्ष में बदल गया.

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सीरिया में गृह युद्ध, इस्लामिक स्टेट और विदेशी ताकतों की एंट्री

सीरिया का संघर्ष धीरे-धीरे सिर्फ सरकार और विपक्ष के बीच लड़ाई नहीं रहा. रूस, ईरान और ईरान समर्थित हथियारबंद गुट असद सरकार के साथ खड़े हुए. दूसरी तरफ तुर्की और खाड़ी देशों ने हथियारबंद विपक्षी गुटों का समर्थन किया.

सांप्रदायिक विभाजन भी गहरा होता गया. विपक्षी गुटों ने सरकार पर अलावाइत समुदाय को प्राथमिकता देने का आरोप लगाया. इस्लामी गुटों ने अलावाइतों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया.

इसी बीच पड़ोसी इराक में इस्लामिक स्टेट यानी आईएस का उभार हुआ. गृह युद्ध का फायदा उठाकर आईएस ने सीरिया के कई इलाकों पर कब्जा कर लिया और रक्का को अपनी राजधानी घोषित कर दिया.

2013 में दमिश्क के पास पूर्वी गौटा में रासायनिक हमला हुआ जिसमें सैकड़ों लोगों की मौत हुई. पश्चिमी देशों और सीरियाई विपक्ष ने इसके लिए असद सरकार को जिम्मेदार ठहराया, जबकि दमिश्क ने आरोपों से इनकार किया.

अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद सीरिया ने अपने रासायनिक हथियारों के जखीरे को नष्ट करने पर सहमति जताई. हालांकि इसके बाद भी सीरिया में हिंसा और अत्याचार नहीं रुके.

संयुक्त राष्ट्र के आयोगों ने संघर्ष में शामिल सभी पक्षों पर हत्या, यातना और बलात्कार जैसे युद्ध अपराधों के आरोप लगाए.

बशर अल-असद अपनी पत्नी आसमा अल-अखरास के साथ
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रूस की मदद से असद ने वापसी की

2015 में असद सरकार के सामने सत्ता खोने का खतरा पैदा हो गया था. देश का बड़ा हिस्सा सरकार के नियंत्रण से बाहर जा चुका था.

लेकिन रूस के सैन्य हस्तक्षेप ने स्थिति बदल दी. असद सरकार ने धीरे-धीरे कई महत्वपूर्ण इलाकों पर दोबारा नियंत्रण हासिल कर लिया.

2018 और 2020 में हुए क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय समझौतों के बाद सरकार ने सीरिया के अधिकांश हिस्से पर अपना नियंत्रण मजबूत कर लिया. हालांकि उत्तर और उत्तर-पूर्व के कुछ हिस्से इस्लामी विपक्षी गुटों और कुर्द मिलिशिया (नागरिकों के एक अर्धसैनिक संगठन) के नियंत्रण में रहे.

असद की स्थिति मजबूत होने लगी और अरब देशों के साथ उनके रिश्ते भी धीरे-धीरे सुधरे. 2023 में सीरिया को अरब लीग में फिर शामिल किया गया और कई अरब देशों ने दमिश्क में अपने दूतावास दोबारा खोल दिए.

11 अगस्त 2026 को सीरिया के पूर्व शासक बशर अल-असद को मौत की सजा सुनाए जाने के बाद राजधानी दमिश्क में लोग 'पैलेस ऑफ जस्टिस' के सामने अपने उन रिश्तेदारों की तस्वीरों के साथ जश्न मनाते हुए, जो सीरियाई गृह युद्ध में मारे गए थे
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फिर आया आखिरी बड़ा मोड़

असद के शासन के तीसरे दशक में सीरिया गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा था. इसके बावजूद उनकी सत्ता कायम रही. अक्टूबर 2023 में हमास के इसराइल पर हमले के बाद शुरू हुए गजा युद्ध का असर लेबनान तक पहुंचा. वहां असद के सहयोगी हिज्बुल्लाह को भारी नुकसान हुआ.

इसके बाद जब लेबनान में संघर्ष विराम हुआ, उसी दिन हयात तहरीर अल-शाम की अगुवाई वाले सीरियाई विपक्षी गुटों ने अचानक बड़ा हमला शुरू कर दिया.

विपक्षी गुटों ने तेजी से आगे बढ़ते हुए सीरिया के दूसरे सबसे बड़े शहर अलेप्पो पर कब्जा कर लिया. इसके बाद हमा और दूसरे शहर भी उनके नियंत्रण में आते गए. देश का दक्षिणी हिस्सा भी सरकार के नियंत्रण से बाहर होने लगा.

यानी जिस बशर अल-असद ने अपने बड़े भाई की मौत के बाद अचानक उस राजनीति में कदम रखा जिसके लिए उन्होंने खुद को कभी तैयार ही नहीं किया था. राष्ट्रपति बनने के बाद जिनसे कभी सुधार और लोकतंत्र की उम्मीद की गई थी, उनका पूरा राजनीतिक सफर आखिरकार सीरिया के सबसे लंबे खूनी संघर्षों में से एक बन गया.

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