- एलन मस्क का मानना है कि अगले 10 साल में AI की वजह से पैसों की अहमियत काफी कम हो सकती है.
- सैम ऑल्टमैन चेतावनी देते हैं कि AI से पैदा होने वाली दौलत कुछ बड़ी कंपनियों और बेहद अमीर लोगों तक सिमट सकती है
- आर्थिक असमानता, AI सुरक्षा, AI सिंगुलैरिटी जैसे तकनीकी मुद्दे भविष्य के सबसे बड़े सवाल बन चुके हैं.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI को लेकर दुनिया में दो बिल्कुल अलग तस्वीरें सामने आ रही हैं. एक तरफ दुनिया के सबसे अमीर लोगों में शामिल एलन मस्क कह रहे हैं कि अगले 10 साल में पैसे की अहमियत लगभग खत्म हो सकती है. तो दूसरी तरफ OpenAI के सीईओ सैम ऑल्टमैन चेतावनी दे रहे हैं कि AI की वजह से दुनिया की दौलत कुछ बेहद ताकतवर और अमीर लोगों के हाथों में सिमट सकती है. यानी सवाल सिर्फ ये नहीं है कि AI कितना ताकतवर होगा. असली सवाल यह है कि उस ताकत पर नियंत्रण किसका होगा.
एलन मस्क क्यों कह रहे हैं कि 2036 तक पैसे की जरूरत नहीं रहेगी?
एलन मस्क का तर्क काफी सीधा है. आज लोग पैसे इसलिए कमाते हैं ताकि खाना, घर, कपड़े, इलाज, यात्रा और मनोरंजन जैसी जरूरतें पूरी कर सकें. लेकिन अगर AI और रोबोट इतने सक्षम हो जाएं कि वे इंसानों की जरूरत से भी ज्यादा सामान और सेवाएं पैदा करने लगें, तो फिर कमी किस बात की रहेगी?
मस्क का कहना है कि अगर हर चीज इतनी अधिक मात्रा में उपलब्ध होगी कि हर व्यक्ति जितना चाहे उतना इस्तेमाल कर सके, तो पैसे की अहमियत अपने आप कम हो जाएगी. उनके मुताबिक AI और रोबोट एक ऐसी दुनिया बना सकते हैं जहां अभाव की जगह अधिकता ले लेगी.
Photo Credit: Pixabay
लेकिन मस्क ने खतरे की घंटी भी बजाई
हालांकि मस्क ने साथ ही यह भी कहा कि भविष्य का सपना पूरी तरह सुरक्षित नहीं है. उन्होंने कहा कि अगले पांच साल में AI इंसानों की बुद्धिमता से भी आगे निकल सकता है.
उनके मुताबिक अगर AI और इंसानों के बीच बुद्धिमत्ता का अंतर उतना ही बड़ा हो गया जितना आज इंसान और चिंपैंजी के बीच है, तो यह कल्पना करना मुश्किल नहीं होगा कि नियंत्रण किसके पास रहेगा.
यानी AI हमारी ही बनाई तकनीक से आगे बढ़कर हमारे फैसलों को भी प्रभावित कर सकता है.
सैम ऑल्टमैन की चिंता बिल्कुल अलग है
जहां मस्क भविष्य में पैसे की अहमियत कम होने की बात कर रहे हैं, वहीं सैम ऑल्टमैन का मानना है कि आने वाले वर्षों में पैसा खत्म नहीं होगा.
बल्कि AI के कारण पैसे की ताकत कुछ चुनिंदा लोगों और कंपनियों तक सिमट कर रह जाएगी. उनका ये भी कहना है कि AI इतनी बड़ी आर्थिक क्रांति ला सकता है कि जो लोग सबसे ताकतवर AI सिस्टम के मालिक होंगे, वही दुनिया की सबसे बड़ी संपत्ति पर भी नियंत्रण रखेंगे.
अगर ऐसा हुआ तो अमीर और अमीर हो जाएगा और गरीब और गरीब, यानी दुनिया में आर्थिक असमानता आज की तुलना में कहीं ज्यादा बढ़ सकती है.
कहा जा रहा है कि एआई सारे काम कर सकता है
सबसे बड़ा सवाल मालिकाना हक का रहेगा
मान लीजिए कि भविष्य में सबसे ताकतवार AI मॉडल कुछ कंपनियों के पास होंगे, जैसा कि संभव है. तो वही कंपनियां दवा भी बनाएंगी, वही नई तकनीक भी विकसित करेंगी. एजुकेशन सिस्टम भी वही चलाएंगी. उस ताकतवर AI की मदद से वो कंपनियां अपने बिजनेस को अधिक से अधिक ऑटोमेट करेंगी. ऐसी स्थिति में वो कंपनियां ही आर्थिक तौर पर सबसे अधिक ताकतवर भी रहेंगी. यानी AI से पैदा होने वाली नई संपत्ति पूरी दुनिया में बराबर नहीं बंटेगी.
क्या यही वजह है कि यूनिवर्सल बेसिक इनकम की चर्चा बढ़ रही है? मतलब कि सरकार हर नागरिक को एक न्यूनतम आय दे, चाहे उसके पास नौकरी हो या नहीं. सैम ऑल्टमैन पहले भी यूनिवर्सल बेसिक इनकम के समर्थन में बोल चुके हैं. उनका मानना है कि अगर AI लाखों नौकरियां खत्म करता है तो समाज को नए आर्थिक मॉडल अपनाने पड़ सकते हैं.
AI का नौकरियां पर असर दिखना शुरू
इस सवाल का जवाब इतना आसान नहीं है. इतिहास गवाह है कि जब-जब तकनीकी क्रांति हुई है नौकरियों पर इनका प्रतिकूल असर भी पड़ा है. कुछ नौकरियां खत्म हुई हैं तो कुछ नई नौकरियां पैदा भी हुई हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि अब तक जो भी तकनीकी क्रांतियां हुई हैं उनके मुकाबले में AI की रफ्तार कहीं अधिक तेज है.
नौकरियों पर AI का असर कई कंपनियों पर दिखने भी लगा है. जिन सेक्टर्स पर इनका असर सबसे अधिक देखने को मिल रहा है वो टेक्नोलॉजी (टेक) और आईटी (आईटी) है, जिसमें सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग, कस्टमर सपोर्ट, बेसिक प्रोग्रामिंग और डेटा एंट्री जैसे काम सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं. इसके अलावा कंटेंट डेवलपमेंट, अकाउंटिंग, लीगल रिसर्च और डिजाइन के शुरुआती कामों वाले जॉब्स पर भी AI अपना प्रभाव दिखाएगा.
हालांकि इस दौर में AI इंजीनियरिंग, रोबोटिक्स, साइबर सिक्योरिटी, AI ऑडिट, डेटा गवर्नेंस और AI के साथ कोऑर्डिनेट करने वाले फील्ड में तेजी से जॉब्स बढ़ भी सकते हैं.
क्या हम AI सिंगुलैरिटी के करीब पहुंच रहे हैं?
सैम ऑल्टमैन कह चुके हैं कि दुनिया AI सिंगुलैरिटी के दौर में प्रवेश कर रही है. AI सिंगुलैरिटी वह स्थिति मानी जाती है जब AI खुद को लगातार बेहतर बनाना शुरू कर दे और बगैर इंसानी मदद के खुद को अपग्रेड और री-प्रोग्राम करने में सक्षम हो जाए. यानी यह वो स्थिति है जब AI बुद्धिमत्ता के मामले में इंसानों से आगे निकल जाए.
गूगल डीपमाइंड के चीफ डेमिस हसाबिस भी कह चुके हैं कि मानवता AI सिंगुलैरिटी की दहलीज पर खड़ी है.
हालांकि वैज्ञानिकों के बीच इस पर अभी भी मतभेद हैं कि यह कब होगा और होगा भी या नहीं.
AI खुद को बेहतर बनाने लगे तो क्या होगा?
AI उद्योग में इस समय सबसे बड़ी चर्चा खुद को बेहतर बनाने में सक्षम AI की है.
यानी AI खुद ही अपने ऐसे नए संस्करण बनाए, जो उनके पहले वाले संस्करण से अधिक सक्षम हों.
अगर यह प्रक्रिया इंसानों की निगरानी के बिना होने लगे, तो नियंत्रण का सवाल और गंभीर हो जाएगा.
एंथ्रोपिक जैसी कंपनियां इस संभावना पर सुरक्षा परीक्षण कर चुकी हैं.
इन परीक्षणों में कुछ AI मॉडलों ने काल्पनिक परिस्थितियों में खुद को बंद होने से बचाने के लिए गलत नतीजा पेश किया था.
हालांकि कंपनी ने स्पष्ट किया था कि वो वास्तविक घटनाएं नहीं थीं, बल्कि भविष्य के जोखिमों को समझने के लिए किए गए सुरक्षा परीक्षण थे.
इसी तरह सुरक्षा शोध के दौरान कुछ अपडेटेड AI मॉडलों में लक्ष्य हासिल करने के लिए झूठ बोलने या भ्रामक रणनीति अपनाने जैसे व्यवहार भी दर्ज किए गए.
ओपन AI एजेंट को लेकर क्या दावा सामने आया?
हाल में अंतरराष्ट्रीय न्यूज एजेंसी की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि ओपन AI एजेंट ने कथित तौर पर भविष्य के अपने संस्करणों के लिए ऐसे नोट छोड़े, जिनमें आंतरिक सीमाओं से बाहर निकलने या सैंडबॉक्स वातावरण यानी सुरक्षित और अलग किए गए वर्चुअल वातावरण से मुक्त होने से जुड़ी बातें थीं.
ये दावा सुरक्षा से जुड़े सूत्रों के हवाले से सामने आया था. ऐसे मामलों को AI के सुरक्षा से जुड़े शोध के तौर पर देखा गया न कि इंसानी नियंत्रण से बाहर जाने के प्रमाण के तौर पर.
क्या किलर रोबोट इंसानों का अंत कर देंगे?
इस सवाल पर सैम ऑल्टमैन का जवाब दिलचस्प है. उन्होंने कहा कि इसकी संभावना बहुत कम है. लेकिन वे ये भी बोले कि उन्होंने शून्य नहीं कहा.
इसी वजह से दुनिया भर में AI सुरक्षा, AI गवर्नेंस और AI कायदे पर बहस लगातार तेज हो रही है.
दुनिया के सामने सबसे बड़ा सवाल
अगर AI का लाभ पूरी दुनिया तक पहुंचा तो यह मानव इतिहास की सबसे बड़ी आर्थिक क्रांति बन सकता है. लेकिन अगर इसका नियंत्रण कुछ कंपनियों या कुछ अरबपतियों तक सीमित रह गया, तो यह इतिहास की सबसे बड़ी आर्थिक असमानता भी पैदा कर सकता है.
यानी आने वाले दशक में सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि AI की ताकत और उससे पैदा होने वाली संपत्ति पर अधिकार किसका है.