सद्दाम, गद्दाफी से खामेनेई तक... दुनियाभर के ऑयल रिजर्व पर कंट्रोल चाहता है अमेरिका?

Global Oil Reserves Control: अमेरिका जिन देशों पर हमला करता है, उन सबमें एक चीज़ कॉमन होती है? "तेल!" तो क्या ये सारा मामला ऑयल रिज़र्व का है?

विज्ञापन
Read Time: 4 mins
प्रतीकात्मक तस्वीर

US Oil Diplomacy: दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति, अमेरिका, बार-बार हज़ारों मील दूर दूसरे देशों में अपनी सेना क्यों भेजता है? क्या ये वाकई लोकतंत्र को बचाने की जंग है, या फिर सारा मसला उस ऑयल रिजर्व पर कंट्रोल का है? 1798 से लेकर 2026 तक, अमेरिका ने करीब 500 बार दूसरे देशों में सैन्य दखल दिया है. और हाल ही में 1 मार्च 2026 को ईरान में जो हुआ, उसने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है. 

दरअसल अमेरिका सिर्फ आर्थिक रूप से अमीर नहीं है, बल्कि सैन्य रूप से भी बहुत ताकतवर है. पहले और दूसरे विश्व युद्ध से लेकर आज तक, अमेरिका ने अपनी इसी ताकत का लोहा मनवाया है. लेकिन अगर आप इतिहास के पन्नों को पलटें, तो एक पैटर्न नज़र आता है. जिन देशों के पास तेल के बड़े भंडार थे, वहां अमेरिका की मौजूदगी अक्सर देखी गई!

इराक और कुवैत - ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म

कहानी शुरू करते हैं 1990 से. इराक ने अपने छोटे से पड़ोसी देश कुवैत पर कब्जा कर लिया. अब कुवैत छोटा तो था, लेकिन तेल का खजाना था. 1991 में अमेरिका ने शुरू किया 'ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म'. दुनिया को बताया गया कि यह कुवैत की आज़ादी और अंतरराष्ट्रीय कानून की रक्षा के लिए है. लेकिन जानकारों का मानना है कि असल मकसद सऊदी अरब और कुवैत के तेल भंडार को सुरक्षित करना था, ताकि दुनिया की तेल सप्लाई लाइन अमेरिका के कंट्रोल में रहे.

सद्दाम हुसैन का अंत और इराक युद्ध 2003

इसके बाद बारी आई 2003 की. अमेरिका ने दोबारा इराक पर हमला किया 'ऑपरेशन इराकी फ्रीडम'. वजह बताई गई 'Mass Destruction' वाले हथियार. तानाशाह सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाया गया. सद्दाम ने वाकई अपने विरोधियों पर जुल्म किए थे, जैसे 1982 का दुजैल नरसंहार. अमेरिका की अदालत ने सद्दाम को सजा सुनाई और 30 दिसंबर 2006 को उन्हें फांसी दे दी गई. लेकिन इस पूरी जंग के पीछे इराक का विशाल तेल भंडार हमेशा से चर्चा का केंद्र रहा.

लीबिया - गद्दाफी का पतन

अब जरा अफ्रीका की तरफ चलिए. साल 2011 में अमेरिका और नाटो (NATO) ने मिलकर लीबिया के तानाशाह मुअम्मर गद्दाफी को निशाना बनाया. लीबिया के पास अफ्रीका का सबसे बड़ा तेल भंडार है. गद्दाफी तो मारे गए, लेकिन उसके बाद लीबिया का क्या हुआ? देश गृहयुद्ध और अराजकता की आग में झुलस गया. आज भी वहां स्थिरता नहीं है, पर तेल के कंट्रोल की रेस जारी है.

वेनेजुएला 2026 - ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व

अब बात करते हैं हालिया घटनाओं की. साल 2026 में अमेरिका ने दक्षिण अमेरिका के देश वेनेजुएला में 'ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व' चलाया. राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार कर अमेरिका ले जाया गया. अमेरिका ने इसे 'नार्को टेररिज्म' के खिलाफ कार्रवाई कहा. बता दें कि वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है, 300 बिलियन बैरल से भी ज़्यादा! क्या ये सिर्फ ड्रग्स के खिलाफ जंग थी या फिर इस विशाल भंडार पर अपनी धाक जमाने की कोशिश?

Advertisement

ईरान - सबसे बड़ा धमाका

अब आते हैं सबसे ताज़ा और चौंकाने वाली खबर पर. 1 मार्च 2026. ईरान के 86 वर्षीय सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की एक समन्वित सैन्य अभियान में मृत्यु की पुष्टि हुई. अमेरिका और इजरायल के इस ऑपरेशन को 21वीं सदी की सबसे बड़ी सैन्य कार्रवाई माना जा रहा है.

ईरान के पास करीब 209 अरब बैरल तेल है. इसकी क्वालिटी बेहतरीन है, लेकिन सालों से अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से ईरान अपना तेल पूरी क्षमता से बेच नहीं पा रहा था. परमाणु मुद्दों और राजनीति ने ईरान को हमेशा अमेरिका के निशाने पर रखा, और अब ये बड़ी कार्रवाई दुनिया के सामने है.

Advertisement

इन सारी घटनाओं को अगर एक धागे में पिरोया जाए, तो क्या आपको भी लगता है कि ये सिर्फ 'आतंकवाद' या 'तानाशाही' के खिलाफ लड़ाई है? या फिर इन सबके पीछे वो 'ऑयल रिज़र्व' है जो दुनिया की अर्थव्यवस्था का पहिया घुमाता है? ईरान, इराक, लीबिया और वेनेजुएला—इन सबमें एक चीज़ कॉमन है, और वो है 'तेल'. अमेरिका की ये 'ऑयल डिप्लोमेसी' आने वाले वक्त में दुनिया का नक्शा कैसे बदलेगी, ये देखना बहुत अहम होगा.

निशान्त मिश्रा NDTV में पत्रकार हैं.

डिस्क्लेमर: इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.