बांग्लादेश में बिना खून- खराबे क्यों नहीं होते चुनाव? 2014 में वोटिंग के दिन ही हुई थीं 18 हत्याएं

Bangladesh Election 2026: बांग्लादेश में माना जाता है कि वहां की राजनीति जीत-हार नहीं बल्कि अस्तित्व की लड़ाई बन चुकी है. वहां जो भी पार्टी सत्ता हारती है, उसके नेताओं को जेल जाने, मुकदमा झेलने और राजनीतिक वजूद ही खत्म होने का डर रहता है.

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2014 के बांग्लादेश चुनाव में हिंसा की तस्वीर
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  • बांग्लादेश में 12 फरवरी को आम चुनाव होगा. पूर्व PM शेख हसीना के सत्ता हटने के बाद हो रहा यह पहला चुनाव है
  • 2014 के चुनाव में विपक्ष ने बहिष्कार किया था. वोटिंग के दिन कम से कम 18 लोगों की हत्या हुई थी
  • अवामी लीग ने 2011 में केयरटेकर सरकार की व्यवस्था खत्म कर दी थी, जिसके बाद विपक्ष चुनाव पर भरोसा खो बैठा था
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बांग्लादेश में 12 फरवरी को एक ऐतिहासिक आम चुनाव होने जा रहा है. यह चुनाव ऐतिहासिक है क्योंकि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को एक बड़े छात्र आंदोलन के बाद सत्ता से हटाए जाने के बाद यह पहला आम चुनाव होगा. यह चुनाव मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के देखरेख में हो रहा है, जो अगस्त 2024 से बांग्लादेश के शासन को चला रही है. एक बात बांग्लादेश में देखने को मिलती है कि यहां चुनावों में हिंसा का इतिहास रहा है. खासकर 2014 के चुनाव में, बांग्लादेश ने अपने राजनीतिक इतिहास का एक बहुत हिंसक दौर देखा था. उस समय आम चुनाव बहिष्कार, हिंसा और बड़े पैमाने पर हत्याओं से दागदार हो गया था, जिससे लोकतंत्र को गहरी चोट पहुंची.

2014 में बांग्लादेश का आम चुनाव

1971 में आजादी मिलने के बाद से, बांग्लादेश में बहुत कम ही ऐसे आम चुनाव हुए हैं, जिनको ही पूरी तरह स्वतंत्र और निष्पक्ष माना गया है. 2006- 2008 के राजनीतिक संकट के बाद, अवामी लीग ने 2011 में चुनाव के लिए केयरटेकर सरकार की व्यवस्था खत्म कर दी. खास बात है कि यह वही पार्टी थी जिसने 1996 में चुनाव में धोखाधड़ी रोकने के लिए केयरटेकर सरकार की मांग की थी, क्योंकि उसे डर था कि BNP की सरकार चुनाव में गड़बड़ी करेगी. लेकिन खुद 2008 का चुनाव जीतने के बाद, अवामी लीग ने 2011 में यह व्यवस्था खत्म कर दी. ऐसा इसलिए किया गया ताकि 2007 जैसी स्थिति दोबारा न बने, जब सेना द्वारा बनाई गई केयरटेकर सरकार दो साल तक सत्ता में बनी रही.

अक्टूबर 2013 से BNP और अन्य विपक्षी दलों ने बंद और प्रदर्शन शुरू किए. खालिदा जिया ने हड़ताल बुला लिया और केयरटेकर सरकार की देखरेख में चुनाव कराने की मांग की. जब अवामी लीग सरकार ने उनकी मांगें नहीं मानीं, तो विपक्ष ने चुनाव का बहिष्कार करने का फैसला किया. 2 दिसंबर 2013 को बहिष्कार की घोषणा के बाद पूरे देश में राजनीतिक हिंसा तेजी से बढ़ गई.

2014 का चुनाव उस समय हुआ जब 1971 के युद्ध अपराधों के आरोप में जमात-ए-इस्लामी के नेताओं पर मुकदमे और सजा चल रही थी, जिससे माहौल और तनावपूर्ण हो गया था. बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, 5 जनवरी 2014 को मतदान के दिन कम से कम 18 लोगों की मौत हुई, और चुनाव से पहले के दिनों में भी कई लोग मारे गए. इतना ही नहीं 150 से ज्यादा मतदान केंद्र जला दिए गए. चुनाव आयोग के अनुसार, केवल 147 सीटों पर ही मतदान हुआ, क्योंकि 153 सीटों पर उम्मीदवार बिना मुकाबले ही जीत गए. ऐसा विपक्ष के बहिष्कार के कारण हुआ.

उत्तरी रंगपुर जिले में जब प्रदर्शनकारियों ने एक मतदान केंद्र पर कब्जा करने की कोशिश की, तो पुलिस ने गोली चलाई, जिसमें दो लोग मारे गए. ऐसा ही एक मामला नीलफामारी जिले में भी हुआ, जहां पुलिस फायरिंग में दो प्रदर्शनकारियों की मौत हुई. मतदान से पहले, खालिदा जिया के आह्वान पर BNP ने पूरे देश में 48 घंटे की हड़ताल की और चुनाव को “शर्मनाक नाटक” बताया. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें घर में नजरबंद किया गया था. उस बार के चुनाव में वोटिंग सिर्फ 39.8% हुई थी. इस बॉयकॉट वाले चुनाव में अवामी लीग ने 300 में से 232 सीटें जीत लीं, जिनमें से लगभग आधे सांसद बिना मुकाबले चुने गए थे.

बांग्लादेश में बिना खून-खराबे चुनाव क्यों नहीं होते?

बांग्लादेश में माना जाता है कि वहां की राजनीति जीत-हार नहीं बल्कि अस्तित्व की लड़ाई बन चुकी है. वहां जो भी पार्टी सत्ता हारती है, उसके नेताओं को जेल जाने, मुकदमा झेलने और राजनीतिक वजूद ही खत्म होने का डर रहता है. इसलिए वहां की पार्टियां हर हाल में जीतना चाहती हैं. इतना ही नहीं चुनाव कराने वाली व्यवस्था पर विपक्ष को भरोसा नहीं होता, खासकर जब से केयरटेकर सरकार का सिस्टम खत्म हुआ है. भरोसे की कमी की वजह से विपक्ष के बहिष्कार और सड़क आंदोलन शुरू हो जाते हैं. 1971 के युद्ध की विरासत आज भी राजनीति को बांटती है और भावनाएं भड़काती है. विपक्ष पुलिस पर पक्षपात के आरोप लगाते हैं और कट्टरपंथी व राजनीतिक गुंडे माहौल और हिंसक बना देते हैं. 

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