बांग्लादेश में सरकार बनी तो भारत से कैसे होंगे रिश्ते, कट्टरपंथी पार्टी जमात ए इस्लामी ने NDTV को बताया प्लान

Bangladesh Election 2026: BNP चुनाव रेस में आगे है लेकिन जमात चौंका सकती है. NDTV ने ढाका-14 निर्वाचन क्षेत्र से जमात-ए-इस्लामी के उम्मीदवार बैरिस्टर मीर अहमद बिन कासिम अरमान से विशेष बातचीत की है.

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Bangladesh Election 2026: जमात-ए-इस्लामी के चीफ शफीकुर रहमान की फाइल फोटो
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  • बांग्लादेश में 12 फरवरी को चुनाव और जुलाई चार्टर पर जनमत संग्रह एक साथ होंगे जो भविष्य दिशा निर्धारित करेंगे
  • जमात-ए-इस्लामी के उम्मीदवार मीर अहमद बिन कासिम अरमान ने इंटरव्यू में भारत के साथ सहयोग की इच्छा जताई
  • जमात पार्टी अपने कट्टरपंथी अतीत से अलग होकर हिंदू अल्पसंख्यकों और महिलाओं को समर्थन में लाने की कोशिश कर रही
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दक्षिण एशिया में सबसे महत्वपूर्ण चुनावों में से एक 12 फरवरी को होने जा रहा है. पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश की जनता एक नई सरकार का चुनाव करने के लिए वोट डालेगी. शेख हसीना के नेतृत्व वाली पिछली सरकार को जुलाई 2024 में हिंसक विरोध प्रदर्शन में हटा दिया गया था. इसके बाद अगस्त 2024 से, बांग्लादेश में मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली एक अंतरिम सरकार द्वारा शासन किया गया है, लेकिन अब बारी है एक निर्वाचित सरकार को चुनने की. भारत की नजर भी इस बात पर है कि चुनाव होने के बाद बांग्लादेश पर शासन कौन करेगा. चुनाव में दो दावेदार सबसे आगे हैं- बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी, जो एक ऐसी कट्टरपंथी इस्लामी पार्टी है जो समाज के सभी वर्गों के मतदाताओं को लुभाने की कोशिश कर रही है.

NDVT बांग्लादेश ग्राउंड पर पहुंचा हुआ है और हमने इस बार के चुनाव (Bangladesh Election 2026) में खड़े जमात के एक प्रमुख उम्मीदवार से बात की. ढाका-14 निर्वाचन क्षेत्र में जमात-ए-इस्लामी के उम्मीदवार बैरिस्टर मीर अहमद बिन कासिम अरमान एक हाई-प्रोफाइल चुनाव लड़ रहे हैं अरमान खुद को बांग्लादेश में जबरन गायब होने का शिकार बताते हैं. उनका मुकाबला BNP की संजीदा इस्लाम से है, जिन्हें तुली के नाम से जाना जाता है. तुली उस मदर्स कॉल की कॉर्डिनेटर हैं, जो जबरन गायब होने वाले पीड़ितों के परिवारों द्वारा गठित एक समूह है. अरमान कहते हैं, "हम फिर से फासीवाद नहीं चाहते. मैं जबरन गायब किया गया था. अब मुझे उम्मीद है कि जनमत संग्रह में 'हां' की जीत होगी."

नोट- बांग्लादेश में चुनाव के साथ ही जुलाई चार्टर पर जनमत संग्रह भी होगा. यह दस्तावेज बांग्लादेश की भविष्य की दिशा तय करेगा. जुलाई राष्ट्रीय चार्टर पर 17 अक्टूबर 2025 को हस्ताक्षर हुए थे, शेख हसीना सरकार गिरने के एक साल बाद. अगर जनमत संग्रह में हां पर बहुमत वोट मिलता है, तो राजनीतिक दलों को इसके बिंदुओं का पालन करना होगा, भले ही कुछ मुद्दों पर सहमति न हो. दरअसल 13 नवंबर 2025 को मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने जुलाई राष्ट्रीय चार्टर (संवैधानिक सुधार) लागू करने का आदेश जारी किया था. जनमत संग्रह में संविधान सुधार के चार प्रस्ताव होंगे और मतदाताओं को इन सभी पर मिलाकर एक ही “हां" या “न” वोट देना होगा.

भारत के साथ मिलकर काम करना चाहता है जमात

अरमान भी जमात के बड़े चेहरों में से एक हैं और भारत के साथ मिलकर काम करने की वकालत कर रहे हैं. NDTV को दिए इंटरव्यू में अरमान ने कहा, ''भारत और बांग्लादेश एक-दूसरे के लिए अपरिहार्य (एक-दूसरे के बिना काम नही न चले) हैं और हमें साथ मिलकर काम करना होगा.'' उनकी यह टिप्पणी संकेत देती है कि जमात अपने इतिहास और पाकिस्तान समर्थक रहे रुख के बावजूद भारत के साथ मिलकर काम करने की इच्छुक है. हाल के महीनों में भारत से अलग-थलग रहने से बांग्लादेश को कोई मदद नहीं मिली है और यह सरकार के लिए एक चुनौती बनी हुई है क्योंकि बांग्लादेश अपनी लगभग सभी भूमि सीमा (लैंड बॉर्डर) भारत के साथ साझा करता है.

NDTV से बात करते मीर अहमद बिन कासिम अरमान

अधिकांश सर्वे और एक्सपर्ट्स के अनुसार BNP इस चुनाव में सबसे आगे है. लेकिन दूसरी ओर सच्चाई यह भी है कि जमात ने उन क्षेत्रों में पैठ बनाई है जहां वह कमजोर थी, और ऐसा उसने अपने उपर से बैन हटने के बाद से किया है. अब उसका टारगेट चुनाव में बहुमत हासिल करना है. जमात के सुप्रीमो डॉ. शफीकुर रहमान कहते हैं, "सिर्फ एक साल पहले, मेरी पार्टी को हाशिये पर रखा गया था. केवल मुट्ठी भर सीटें जीतने की भविष्यवाणी की गई थी. आज, जमात बहुमत के कगार पर है. यह लोगों की इच्छा है. जब लोग एकजुट होते हैं, तो उन्हें कोई नहीं रोक सकता."

उन्होंने कहा है, "मैं एक आधुनिक बांग्लादेश चाहता हूं जो मैच्योर हो और शासन करने के लिए तैयार हो. यही कारण है कि मैंने अपना घोषणापत्र और स्पष्ट 100 दिनों का शासन रोडमैप पेश करने के लिए दुनियाभर के विशेषज्ञों के साथ देश का पहला नीति शिखर सम्मेलन शुरू किया है."

हिंदू विरोधी इमेज कैसे बदलेगी जमात?

अब जमात को एहसास है कि अपने कट्टरपंथी अतीत के कारण उसके लिए अधिक मतदाताओं को अपने पाले में करना मुश्किल होगा. यही कारण है कि यह उन वर्गों से अपील करने की कोशिश कर रहा है जो इस्लामी ताकतों के खिलाफ हैं, खासकर हिंदू समुदाय जैसे अल्पसंख्यकों और महिला मतदाताओं से भी. 

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अरमान से NDTV ने पूछा कि अपनी हिंदू विरोधी छवि को देखते हुए जमात हिंदुओं को वोट देने के लिए कैसे मनाएगा. इसपर उन्होंने कहा, "हम बदलाव का वादा कर रहे हैं और जो भी बदलाव चाहता है, वह नस्ल, धर्म और लिंग की परवाह किए बिना हमारे साथ आएगा. मेरा मानना ​​है कि हिंदुओं को ऐतिहासिक रूप से उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा है और मेरा मानना ​​है कि वे भी बदलाव चाहते हैं. बदलाव की इस मांग के कारण हमें उनका समर्थन मिलेगा." 

बता दें कि मीर अहमद बिन कासिम अरमान, फांसी पर चढ़ चुके जमात-ए-इस्लामी नेता मीर कासिम अली के छोटे बेटे हैं. कासिम अरमान को 2024 में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद 'गुप्त हिरासत' से रिहा कर दिया गया था. उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जाता है जो शीर्ष जमात नेतृत्व के करीब हैं और अगर जमात चुनाव को अपने पक्ष में करने में कामयाब होती है तो उन्हें एक प्रमुख पद मिलने की उम्मीद है. कासिम अरमान के पिता को 1971 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान किए गए अपराधों के लिए बांग्लादेश के अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण ने सितंबर 2016 में दोषी ठहराया था और उन्हें उसके बाद फांसी दे दी गई थी. उससे पहले अरमान ने अपने पिता की कानूनी टीम में काम किया था.

मीर अहमद बिन कासिम ने इन्स ऑफ कोर्ट स्कूल ऑफ लॉ से अपना बार वोकेशनल कोर्स पूरा किया और उन्हें बैरिस्टर बनने के लिए इंग्लैंड और वेल्स गए. उन्होंने लंदन यूनिवर्सिटी से एल.एल.बी. (ऑनर्स) की पढ़ाई पूरी की थी.

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