देस की बात रवीश कुमार के साथ: मजदूरों का पलायन या सरकारों का?

आपने देखा और सुना हमारे मजदूर भाइयों की व्यथा-कथा. फर्क पड़ा किसी को या नहीं, यह बात इतनी महत्वूपूर्ण नहीं है जितना कि यह दर्ज किया जाना कि इस वक्त में इन मजदूरों को किस हाल में छोड़ दिया गया है. माइग्रेंट कहते हैं. यह आपके लिए एक कैटेगरी होगा प्रवासी मजदूर, मगर इसके भीतर भी कई प्रकार के मजदूर रहते हैं. पलायन के भीतर भी कई प्रकार का पलायन. एक स्वस्थ मजदूर का लगातार पैदल चलते रहना और एक गर्भवती महिला का लगातार पैदल चलते रहना दोनों एक समान नहीं है. उसी तरह से एक राज्य से दूसरे राज्य के बीच मजदूरों का पलायन तो हो रहा है, पैदल, रेल से या बस से. लेकिन एक राज्य के भीतर भी एक जिले से दूसरे जिले की तरफ, पांच-पांच सौ किमी की यात्रा करने के लिए मजदूर मजबूर हैं और रास्ते भर में इनके पास खाने के लिए कुछ नहीं है.

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