- इस साल उत्तराखंड के ऊंचाई वाले इलाकों में नवंबर से जनवरी तक बारिश बर्फबारी नहीं हुई है
- वैज्ञानिकों ने बताया कि बर्फबारी में कमी पिछले 15-20 सालों का जलवायु परिवर्तन और मौसमी चक्र का परिणाम है
- सर्दियों का मौसम सिकुड़ रहा है और गर्मियों का मौसम लंबा हो रहा है, जिससे बर्फ जमने और बरसात में कमी आ रही है
हिमालय में इस साल बर्फबारी और बारिश दोनों ही नहीं हुई हैं. इस बात की चर्चा हर तरफ जोरों पर है. साल 2025 का नवंबर-दिसंबर का महीना बिना बारिश के ही गुजर गया. 2026 का जनवरी आधे से ज्यादा गुजर चुका है, लेकिन बारिश और बर्फबारी का कुछअता पता नहीं है. पर्यावरणविद् वैज्ञानिक और विशेषज्ञ और आम लोग यही चर्चा कर रहे हैं कि आखिर कब बारिश और बर्फ गिरेगी.
उत्तराखंड की ऊंचाई वाले क्षेत्रों की अगर बात करें, जिनमें ओम पर्वत, आदि कैलाश, केदारनाथ, बद्रीनाथ ,गंगोत्री, यमुनोत्री, जोशीमठ, बंदर पुछ, नैनीताल अल्मोड़ा ,मुंसियारी आते हैं, यहां पर इस बार बर्फ पड़ी ही नहीं. पहाड़ बिना बर्फ के दिख रहे हैं और बारिश भी नहीं हुई. बर्फबारी और बारिश के न होने से असर बागवानी और खेती पर पड़ रहा है. पर्यटकों का बर्फ देखने का इंतजार सर्फ इंतजार ही रह गया. उत्तराखंड के पर्यटन वाले क्षेत्र बिना पर्यटकों के सूने पड़े हैं. हर साल जनवरी में इन क्षेत्रों में भारी बर्फबारी होती थी, जिससे यहां पर्यटकों की भीड़ लगी रहती थी. लेकिन इस साल सब सूना पड़ा है.
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जलवायु परिवर्तन की वजह क्या?
सवाल यह उठ रहा है कि क्या जलवायु परिवर्तन की वजह तापमान में बढ़ोतरी और मौसमी चक्र में बदलाव है. या फिर ये सब पिछले 5 साल के घटनाक्रम का सिलसिला है कि दिसंबर-जनवरी में बर्फबारी कम देखने को मिल रही है. जबकि साल 2025 के फरवरी, मार्च और अप्रैल में अच्छी खासी बर्फबारी हिमालयी क्षेत्रों में हुई थी.
पिछले लंबी रिसर्च को देखते हुए पता चला है कि उत्तराखंड के हिमालय वाले क्षेत्र में बर्फबारी एक दो या पांच साल में आए बदलाव का कारण नहीं है बल्कि यह पिछले 15 से 20 साल का एक ऐसा चक्र है. धीरे-धीरे जलवायु परिवर्तन की वजह से सर्दियों का मौसम सिकुड़ रहा है और गर्मियों का मौसम लंबा हो रहा है. वैज्ञानिक तौर पर जानें तो तापमान बढ़ रहा है. चाहे वह वायुमंडल का हो या फिर जमीन के ऊपर का.
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भारत के मौसम का पैटर्न जानें
इस सर्दी के मौसम की तरह, भारत में भी एक पैटर्न देखा गया है, जहां पश्चिमी विक्षोभ (डब्ल्यूडी) कमजोर हो रहे हैं. एनडीटीवी के एक सवाल के जवाब में आईएमडी के महानिदेशक डॉ. मृत्युंजय मोहपात्रा ने बताया कि इसका मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन है, जो उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट स्ट्रीम को बदल रहा है. इसकी वजह से पश्चिमी विक्षोभ उत्तर की ओर और अरब सागर से दूर जा रहे हैं, जिससे उन्हें नमी कम मिल पा रही है. इस वजह से सिस्टम कमजोर हो रहे हैं, उनके रास्ते बदल रहे हैं, जिसकी वजह से उत्तर-पश्चिमी भारत और हिमालय में सर्दियों में कम वर्षा हो रही है. वहीं सर्दियों में गर्मी, कम बर्फबारी, लंबे समय तक सूखा पड़ रहा है और धुंध भी बढ़ रही है.
भारत और दुनिया के ग्लेशियरों पर रिसर्च और स्टडी करने वाले वाडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ हिमालयन जियोलॉजी के पूर्व वैज्ञानिक ग्लेशियोलॉजिस्ट डॉ डीपी डोभाल ने भी हिमालय, खासकर उत्तराखंड और हिमाचल वाले क्षेत्र में कम बर्फबारी का कारण जलवायु परिवर्तन और मौसमी चक्र में बहुत तेजी से बदलाव बताया है. डॉ डीपी डोभाल ने कहा कि हिमालय को थर्ड पाल कहा जाता है, क्योंकि यहां ग्लेशियर का भंडार है. आर्कटिक और अंटार्कटिका के बाद हिमालय में सबसे ज्यादा ग्लेशियर और स्नो कवर एरिया हैं. पूरे हिमालय की बात करें तो जिसमें नेपाल का क्षेत्र भी आता है, यहां लगभग 16 हजार से ज्यादा ग्लेशियर हैं., ग्लेशियर का कम या ज्यादा होना स्नोफॉल पर निर्भर करता है.
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क्यों कम हो रहा स्नो कवर एरिया?
डॉ डीपी डोभाल ने बताया कि बर्फबारी कम होने का सिलसिला पिछले 10 -15 सालों से शुरू हुआ. जिसकी वजह से स्नो कवर एरिया कम होने लगा. ये कोई आज की प्रक्रिया नहीं है. उन्होंने कहा कि छोटे ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और अब एवलॉन्च का खतरा ज्यादा हो गया है, क्योंकि तापमान बढ़ रहा है और ग्लेशियर पर दरारें पड़ रही है. गेलेशियर अपने ही वजन से गिर रहे हैं. बर्फ गिर नहीं रही है और जो पहले से है वो पिघल रही है. इसीलिए पहाड़ खाली दिख रहे हैं.
डॉ डोभाल ने बताया कि 1986-87 में सितंबर के महीने में बर्फबारी शुरू हो जाती थी. धीरे-धीरे सितंबर के अंतिम हफ्ते में होने वाली बर्फबारी आगे के महीनों में शिफ्ट होती चली गई. इसकी वजह जलवायु परिवर्तन या गोबल वार्मिंग है. डॉ डोभाल ने बताया कि गर्मियों का सीजन लंबा होता जा रहा है और सर्दियों का सीजन छोटा हो रहा है, यानी सर्दियों का कम समय मिल रहा है. वायुमंडल गर्म होने की वजह से सर्दियों में पढ़ने वाली बर्फ ठीक से जम नहीं पा रही है, जमीन का स्तर भी गर्म हो रहा है.














