Uttarakhand: बेमौसम बारिश और बर्फबारी, क्या कोई खतरा आने वाला है? जान लीजिए 2 एक्सपर्ट की चेतावनी

Uttarakhand Snowfall Avalanche Risk: प्रोफेसर एसपी सती ने कहा कि गर्मी का सीजन लंबा हो रहा है. ठंड के मौसम में सर्दी नहीं पड़ रही है. इस जलवायु परिवर्तन का असर न सिर्फ मौसम पर पड़ रहा है, बल्कि धीरे-धीरे जीव-जंतुओं और प्रकृति जैसे पेड़-पौधों पर भी पढ़ना शुरू हो गया है. अगर, ऐसा ही रहा तो वन्य जीव और जीव जंतु के प्रजनन के समय में भी बदलाव हो सकता है. न तो समय पर फल लगेंगे और न ही मौसमी फसलें हो पाएंगी. 

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उत्तराखंड में मार्च की बारिश-बर्फबारी को एक्सपर्ट्स ने बताया खतरा.

Uttarakhand Snowfall Weather News: उत्तराखंड में मार्च महीने हुई बारिश और बर्फबारी से एक बार फिर से ठंड ने दस्तक दे दी है. अमूमन, इस महीने में गर्मी शुरू हो जाती है, लेकिन इस बार बारिश और बर्फबारी के कारण गर्मियों का एहसास अभी तक नहीं हुआ है. यह सब ग्लोबल वार्मिंग के कारण हुए जलवायु परिवर्तन से हो रहा है, लेकिन विशेषज्ञों ने इसे एक खतरा भी बताया है. उनका कहना है कि इस समय पढ़ने वाली बर्फबारी के कारण एवलांच आने का खतरा ज्यादा रहा है, क्योंकि धरती और वायुमंडल के तापमान बढ़े हुए हैं. 

दरसअल, उत्तराखंड मौसम विज्ञान केंद्र ने 27 मार्च तक प्रदेश के उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, चमोली, बागेश्वर, पिथौरागढ़ में हल्की बारिश और बर्फबारी की संभावना जताई है. मौसम विज्ञान केंद्र के अनुसार, 3300 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फबारी हो सकती है. हालांकि, आमतौर पर होली के त्योहार के बाद वसंत ऋतु के आगमन से गर्मी का मौसम शुरू हो जाता है. लेकिन, इस बार मार्च महीने में मौसम ने दो बार करवट बदली, इससे पहाड़ी क्षेत्रों में बर्फबारी और मैदानी क्षेत्रों में बारिश हुई.

पिथौरागढ़ एक ऐसा जिला जहां नहीं हुई बारिश 

बारिश और बर्फबारी के कारण उत्तराखंड में तापमान काफी नीचे गिर गया है. हालात यह हैं कि लोगों को सर्दियों के गर्म कपड़े एक बार फिर निकालने पड़ गए हैं. मार्च महीने में बारिश की बात करें तो 1 मार्च से 21 मार्च 2026 तक राज्य में 35% बारिश हो चुकी है, जबकि सामान्य तौर पर 39.4 प्रतिशत बारिश का अनुमान रहता है. उत्तराखंड के 13 जिलों में सबसे ज्यादा बारिश पौड़ी जिले में हुई है लगभग 150% हुई है. वहीं, दूसरे नंबर पर टिहरी जिले में लगभग 137%, हरिद्वार में 59%, बागेश्वर में 48%, चंपावत में 39%, चमोली में 10% अल्मोड़ा में 28%, देहरादून में 27%, नैनीताल में 8%, रुद्रप्रयाग व उधम सिंह नगर में 6-6% और उत्तरकाशी में 35% बारिश दर्ज की गई है. पूरे  उत्तराखंड में पिथौरागढ़ एकमात्र ऐसा जिला है जहां अब तक 0  फीसदी बारिश दर्ज की गई है.  

यहां हुई बारिश और बर्फबारी

उत्तराखंड में पिछले 48 घंटे में हुई बारिश और बर्फबारी से तापमान काफी नीचे गिरा है. इसके अलावा पहाड़ी क्षेत्रों में बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री, हरसिल, नीति, माणा, मलारी, गूंजी, आदि कैलाश, ओम पर्वत, खरसाली, जंगल चट्टी, सुखी टॉप, चकराता, मुनस्यारी धारचूला जैसे कई क्षेत्रों में जमकर बर्फबारी हुई है. देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल, उधम सिंह नगर, काशीपुर टिहरी, पौड़ी, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी में जमकर बारिश हुई है. 

कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन तेजी से बढ़ा 

मार्च महीने में बदले मौसम को लेकर NDTV ने पर्यावरणविद् और प्रोफेसर एसपी सती से बातचीत की. इस दौरान उन्होंने बताया कि लगातार जलवायु परिवर्तन हो रहा है, इसकी वजह से जनवरी और फरवरी में पढ़ने वाली बर्फ अब मार्च अप्रैल के महीने में पढ़ रही है. यह सब ग्लोबल वार्मिंग का एक बड़ा असर है. जिस तरीके से मार्च के महीने में बारिश और बर्फबारी हुई, उसका संकेत साफ है कि धरती का तापमान तेजी से बढ़ रहा है, इसका सबसे बड़ा कारण कार्बन डाइऑक्साइड का तेजी से उत्सर्जन है.

 मार्च, अप्रैल, मई तक शिफ्ट हुई बारिश-बर्फबारी

प्रोफेसर एसपी सती ने बताया कि जिस समय सर्दियों में ठंड, बर्फबारी और बारिश होनी चाहिए थी, वह नहीं हो रही है. यह जनवरी और फरवरी की जगह अब मार्च, अप्रैल यहां तक मई में शिफ्ट हो गई है. 

न फल लगेंगे, न फसल होगीं, प्रजनन का समय भी बदलेगा  

प्रोफेसर एसपी सती ने कहा कि तेजी से जलवायु परिवर्तन हो रहा है, इससे गर्मी का सीजन लंबा हो रहा है. वहीं, ठंड के मौसम में सर्दी नहीं पड़ रही है. बारिश भी या तो अचानक से, या तेजी से हो जा रही है या फिर लंबा गैप लेकर बारिश हो रही है. उन्होंने कहा कि इस जलवायु परिवर्तन का असर न सिर्फ मौसम पर पड़ रहा है, बल्कि धीरे-धीरे जीव-जंतुओं और प्रकृति जैसे पेड़-पौधों पर भी पढ़ना शुरू हो गया है. उन्होंने कहा कि अगर, ऐसे ही जलवायु परिवर्तन का संतुलन बिगड़ता रहा तो वन्य जीव और जीव जंतु के प्रजनन के समय में भी बदलाव हो सकता है. न तो समय पर फल लगेंगे और न ही मौसमी फसलें हो पाएंगी. 

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बर्फ में पानी की मात्रा ज्यादा 

वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के पूर्व वरिष्ठ वैज्ञानिक और ग्लेशियोलॉजी डॉ. डीपी डोभाल ने NDTV से बातचीत में कहा कि मार्च के महीने में बर्फबारी और बारिश होती थी, लेकिन इतनी नहीं जितनी हुई है. ये सब जलवायु परिवर्तन के कारण हो रहा है. उन्होंने कहा कि अभी पड़ने वाली बर्फ में पानी की मात्रा ज्यादा है, इसलिए एवलांच आने का खतरा ज्यादा है और एवलांच आएंगे. 

अब मार्च-अप्रैल में आ रहा पश्चिमी विक्षोभ

डॉ. डोभाल ने बताया कि धरती और वायुमंडल का तापमान बढ़ हुआ है, गर्मी का सीजन लंबा हो रहा है और सर्दी का छोटा हो गया है. ये सब ग्लोबल वार्मिंग के कारण है. उन्होंने कहा कि  पश्चिमी विक्षोभ के कारण मार्च महीने में बर्फबारी और बारिश हो रही है. लेकिन, पश्चिमी विक्षोभ जो जनवरी और फरवरी में आता था वो अब मार्च या अप्रैल में आ रहा है. उन्होंने कहा कि मानसून की बारिश 4000 मीटर तक चली गई है, जो जलवायु परिवर्तन के कारण 3000 मीटर या साढ़े तीन हजार मीटर तक होती थी. लेकिन अब यह 4000 मीटर पर भी मिल रही है. 

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