कौन हैं हजरत अली, जिनके जन्मदिन पर CM योगी से लेकर पूर्व जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने दी मुबारकबाद

हजरत अली का जन्मदिन 3 जनवरी को मनाया गया, जहां सभी धर्मों के लोग और राजनीतिक दलों के नेता एक साथ उनके सम्मान में जुटे. पूर्व जस्टिस मार्कंडेय काटजू और यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ ने हजरत अली को उनकी बहादुरी, न्यायप्रियता और इंसानियत के लिए याद किया.

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पैगम्बर मोहम्मद साहब के दामाद, और शिया और सुन्नियों के खलीफा हज़रत अली का जन्मदिन इस साल 3 जनवरी को मनाया गया, जिसमें दुनियाभर में उनके चाहने वालों ने मुबारकबाद पेश की. कहीं  महफिल की गई तो कहीं उनकी याद में सेमिनार. गौर करने वाली बात ये है कि हज़रत अली का नाम और जिवनी में इतनी इंसानियत है जिसे हर धर्म के लोग याद करते हैं. तभी भारत के सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिट मार्कंडेय काटजू (Markandey Katju) से लेकर यूपी सीएम योगी अदित्यानाथ तक ने हज़रत अली के जन्मदिन पर उन्हें मुबारकबाद दी थी. वहीं यूपी के सुल्तानपुर में अली डे नाम से प्रोग्राम हुआ जहां कांग्रेस, बीजेपी, सपा समेत हर धर्म के लोग तक मौजूद रहें. 

क्या कहा जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने? 

जस्टिस काटजू (Markandey Katju) ने X पोस्‍ट में कहा, 'हजरत इमाम अली की जयंती पर सभी मुस्लिम भाइयों और बहनों को शुभकामनाएं. सुन्नी, शिया और सूफी मुसलमानों के बीच एक गहराई से सम्मानित व्यक्ति, एक दिव्य रूप से निर्देशित खलीफा, एक वीर सैनिक, एक विद्वान, न्यायाधीश और रहस्यवादी के रूप में हजरत अली को सूफी सिलसिलों के स्रोत के रूप में माना जाता है. उनका सार्वभौमिक दृष्टिकोण उनके प्रसिद्ध उद्धरण में परिलक्षित होता है: "आप या तो आपके धर्म में भाई हैं या मानवता में." मलिक-ए-अश्तर को उनके पत्र, मिस्र के गवर्नर के रूप में उनके नियुक्ति, एक बुद्धिमान और न्यायपूर्ण प्रशासक के रूप में कार्य करने के लिए स्पष्ट निर्देश दिए गए थे. मक्का में काबा में 600 ईस्वी में जन्मे, उन्हें इराक के नजफ में दफनाया गया, जो कर्बला से लगभग 100 किमी दूर है. आज उनकी 1425वीं जयंती है.'

वहीं इससे पहले यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ ने भी X के माध्यम से हजरत अली के जन्मदिवस पर मुबारकबाद दी थी.

हजरत अली के नाम पर हर पार्टी  के नेता हुए एक साथ, ईसाई, हिंदू, मुस्लिम सब दिखे एक ही मंच पर. बहुत ही कम ऐसे मौके होते हैं जहां हर पार्टी के नेता, या हर धर्म के लोग एक साथ नज़र आए.

ऐसी ही एक तस्वीर यूपी के सुल्तानपुर के अमहट(AMHAT) में देखने को मिली, जहां कर्नाटक सरकार में सेंट्रल रिलीफ कमेटी के चैयरमेन और कांग्रेस के महासचिव(कर्नाटक) आगा सुलतान आए तो वहीं बीजेपी के लखीमपुर खीरी के प्रभारी(अल्प.मो) राज हुसैन राणा भी मिले.

वहीं सपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व यूपी मंत्री पवन पांडे भी एक ही मंच पर कांग्रेस एवं बीजेपी के नेताओं के साथ नज़र आए.. साथ ही सुन्नी स्कॉलर डॉ गुलाम रसूल देहलवी, शिया धर्मगुरू मौलाना यासूब अब्बास एवं मिर्ज़ा शफीक हुसैन, ईसाई धर्म स्कॉलर फादर गौरव रे, हिंदू शायर शैलेंद्र अजमेरी, भाभी जी घर पर हैं सीरियल के अभिनेता सलीम ज़ैदी(टिल्लू), समेत सभी ने एक ही मंच पर रहकर हज़रत अली के जन्मदिन और उनके सिंद्धातों को याद किया. ये प्रोग्राम गदीरी युवा फाउंडेशन ने कराया. जो पिछले 11 साल से अली डे का प्रोग्राम करवा रहा है, जिसमें आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह से लेकर कई वरिष्ठ नेता, धार्मिक गुरू शामिल हो चुके है. 

पवित्र काबे के अंदर पैदा होने वाले दुनिया में पहले हैं हजरत अली

शिया सुन्नी की कई किताबों के अनुसार हजरत अली की मां हजरत फातेमा बिन्ते असद जब नवें महीने गर्भ अवस्था में थी तब वो पवित्र काबा के पास गई थीं और ईश्वर से दुआ कर रही थीं. फातिमा बिन्त असद आराम करने के लिए काबा की दीवार के सहारे झुक गईं और तभी चमत्कारिक रूप से दीवार खुल गई. फातिमा बिन्त असद अंदर गईं और दीवार उनके पीछे बंद हो गई. इसके बाद चश्मदीदों ने ये सब देखा तो दरवाजा खोलने लगे और धीरे धीरे पूरे मक्का में ये खबर फैल गई लेकिन फिर सबने सब्र किया और इसे अल्लाह की मर्जी समझते हुए रुक गए.

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तीन दिन तक बिन्ते असद काबे में रहीं और तीसरे दिन हजरत अली की विलादत (जन्म) हुई. इसके बाद वो बाहर आईं और दरार बंद हो गई. साथ ही जब हजरत मोहम्मद साहब ने हजरत अली को गोद में लिया तब जाकर हजरत अली ने अपनी आंख खोली. वहीं आजतक काबे के दीवार पर वो दरार मौजूद है. इस दरार से एक ऐसी खुशबू आती है जो काबा के किसी और हिस्से में नहीं है.

कौन हैं हजरत अली? 

हजरत अली के पिता हजरत अबू तालिब हैं, जिन्होंने पैगम्बर मोहम्मद साहब को बचपन से ही अपने पास पाला और हर तरह से हिफाजत की. वहीं हजरत अली के लिए ही मोहम्मद साहब ने फरमाया कि मैं इल्म का शहर हूं और अली उसका दरवाजा है, अगर किसी को मुझ तक आना है तो उसे अली से दो बार मिलना होगा, एक जब वो शहर में आए और दूसरा जब वापस जाएं.

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साथ ही हजरत अली ने जंग-ए-खैबर, जंग-ए-बद्र, जंग-ए-खंदक आदि इस्लाम के लिए जंग जीती. साथ ही हजरत अली मोहम्मद साहब के चाचाजात भाई तो थे ही, वहीं उनकी बेटी बीबी फातिमा जहरा के शौहर भी थे. हजरत अली को ईद-ए-गदीर के बाद मुस्लिम पहला इमाम मानने लगे, वहीं मोहम्मद साहब के निधन के बाद सुन्नी मुस्लिम उन्हें अपना चौथा खलीफा मानते हैं तो वहीं शिया मुस्लिम हजरत अली को पहला इमाम मानते हैं.

हिंदुस्तान समेत पूरे विश्व में मनाया जाता है अली डे

हजरत अली का पवित्र श्राइन इराक के नजफ शहर में हैं, जहां उनकी कब्र भी है जिसे लोग रौजा भी कहते हैं. इस दिन हजारों की तादात में दुनियाभर से लोग उनके श्राइन पर जाते हैं और उनका जन्मदिवस मनाते हैं. वहीं हिंदुस्तान में हर शहर में अली डे मनाया जाता है. 

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वहीं हर साल 13 रजब के दिन मुसलमान जश्न मनाते हैं. कई मस्जिदों को सजाया जाता है. दरगाहों में कव्वाली का आयोजन किया जाता है. खाने-पीने का इंतजाम किया जाता है. मुस्लिम समुदाय के लोग एक दूसरे की दावत करते हैं और खुशियां बांटते हैं.

हजरत अली ने 656 ईस्वी से लेकर 661 ईस्वी तक शासन किया. हजरत अली को उनकी बहादुरी, इंसाफ, ईमानदारी और नैतिकता के लिए पहचाना जाता है. ऐसा माना जाता है कि उनकी हुकूमत के दौरान कोई भी भूखा नहीं सोया और किसी के साथ अन्याय नहीं हुआ. हजरत अली के कई ऐसे संदेश हैं, जिन्हें लोग अपनी जिंदगी में अपनाकर जिंदगी को आसान और बेहतर बना सकते हैं. उन्होंने अपनी जिंदगी में लोगों को इंसानियत का पाठ पढ़ाया.

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हजरत अली के खास संदेश

  1. सबसे बड़ा गुनाह वो है जो गुनाह करने वाले की नजर में छोटा हो.
  2. शिक्षा सबसे कीमती चीज है और इस कीमती चीज को कोई नहीं चुरा सकता.
  3. अगर आपने किसी को उसकी दौलत की वजह से सम्मान दिया तो आपने अपना ईमान खो दिया.
  4. हजरत अली कहते हैं कि खुशी में किसी से कोई वादा नहीं करो और गुस्से की हालत में कोई फैसला नहीं करो.

वहीं हजरत अली ने इस दुनिया को तलाक तक दी, यानि वो चाहते तो हर एक आराम पा सकते थे लेकिन उन्होंने अपना जो कुछ था वो हमेशा गरीब, यतीम आदि को दिया और वह बहुत ही नर्म दिली से रहते थे. वहीं इतने बहादुर थे कि उन्होंने जंग के मैदान में बड़े बड़े ताकतवर पहलवानों को पछाड़ दिया था. वहीं हजरत अली का कहना था कि कभी भी जंग में महिलाओं और बच्चों पर हमला न करो.

हजरत अली को पैगम्बर मोहम्मद साहब बहुत चाहते थे. उन्होंने तभी गदीर के मैदान में भी हजरत अली को अपना जानशीन बनाया था. वहीं हजरत अली और मोहम्मद साहब की बेटी जनाबे फातिमा जहरा के दो बेटे इमाम हसन और इमाम हुसैन भी थे जो शिया मुस्लिमों के दूसरे और तीसरे इमाम भी हैं. इन्हीं दोनों को हजरत मोहम्मद साहब ने जन्नत का सरदार भी कहा है. मोहर्रम पर हज़रत अली के बेटे इमाम हुसैन ही अपने 72 साथियों के साथ ईराक के करबला में शहीद हुए थे.

पवित्र काबे में हुआ जन्म तो मस्जिद में हुई शहादत

हजरत अली का जन्म जहां पवित्र काबे में हुआ, वहीं उनकी शहादत इराक के कूफा की मस्जिद में रोजे की हालत में हुई, जब हजरत अली रमजान महीने की 19 तारीख को सुबह नमाज पढ़ने मस्जिद ए कूफा पहुंचे तभी अब्दुर रहमान आतंकी ने नमाज की हालत में ही उनपर हमला कर दिया जिसके बाद उनकी 21 रमजान को शहादत हो गई थी.

उनके इस दुनिया के जाने के बाद सड़कों पर रहने वाले लोग भी उन्हें बहुत याद किया करते थे क्योंकि वो हर यतीमों, गरीबों को रात में खाना दिया करते थे और जब कोई उनसे नाम पूछता था तो कहते थे कि एक भाई दूसरे भाई को खाना दे रहा है.
 

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