3 मिनट 10 सेकंड के 'वंदे मातरम्' को लेकर UP में क्यों हो रहा है बवाल?

'वंदे मातरम्' को लेकर केंद्र सरकार ने नई गाइडलाइंस जारी की हैं. इसके तहत, अब वंदे मातरम् गाना अनिवार्य कर दिया गया है. इसे लेकर उत्तर प्रदेश में विरोध भी शुरू हो गया है.

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सांकेतिक तस्वीर.
IANS
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  • केंद्र सरकार ने वंदे मातरम् के सभी छह पैरा गाने को सरकारी कार्यक्रमों और स्कूलों में अनिवार्य कर दिया है
  • गाइडलाइंस के तहत वंदे मातरम् को राष्ट्रगान जन-गण-मन से पहले गाना जरूरी होगा और इसकी अवधि तीन मिनट दस सेकंड है
  • मुस्लिम संगठनों और विपक्षी नेताओं ने इस फैसले का विरोध करते हुए इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला बताया है
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लखनऊ/मुरादाबाद/सहारनपुुर:

केंद्र सरकार ने 'वंदे मातरम्' को लेकर नई गाइडलाइंस जारी कर दी हैं. अब सरकार ने राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के सभी 6 पैरा गाने को अनिवार्य कर दिया है. इसकी कुल अवधि 3 मिनट 10 सेकंड है. अब तक 'वंदे मातरम्' को लेकर कोई प्रोटोकॉल नहीं था. लेकिन अब इसके लिए भी प्रोटोकॉल होगा. नई गाइडलाइंस के मुताबिक, अब हर सरकारी कार्यक्रमों और स्कूलों में राष्ट्रगान 'जन-गण-मन' से पहले 'वंदे मातरम्' गाना अनिवार्य होगा.

इस नई गाइडलाइंस का विरोध भी शुरू हो गया है. मुस्लिम संगठनों और कई विपक्षी सांसदों ने सरकार के इस फैसले का विरोध किया है. सबसे ज्यादा बवाल उत्तर प्रदेश में हो रहा है. नई गाइडलाइंस आने के बाद 'वंदे मातरम्' को लेकर फिर से बहस शुरू हो गई है.

मुस्लिम संगठनों को आपत्ति क्यों?

'वंदे मातरम्' को लेकर आई नई गाइडलाइंस पर मौलानाओं ने आपत्ति जताई है. सहारनपुर के देवबंदी उलेमाओं ने सरकार के इस फैसले का खुलकर विरोध किया है. 

देवबंदी उलेमाओं का कहना है कि वंदे मातरम् में कुछ अल्फाज ऐसे हैं, जिनका उच्चारण करना इस्लाम में जायज नहीं है. इन शब्दों से किसी देवी-देवता की पूजा होती है लेकिन इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी और की पूजा करना हराम माना जाता है. 

मौलानाओं का कहना है कि अगर कोई अपनी मर्जी से वंदे मातरम् गाना चाहता है तो बखूबी गाए लेकिन जबरन किसी धर्म विशेष पर इसे थोपना लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन है. इसे अनिवार्य करने के फैसले पर सरकार को पुनर्विचार करना चाहिए.

और क्या है आपत्ति?

शिया धर्मगुरु मौलाना कल्बे जवाद ने भी इस फैसले का विरोध किया और कहा कि ये धार्मिक नारा है. उन्होंने कहा, 'आजादी होनी चाहिए. आप किसी पर कुछ भी जबरदस्ती नहीं थोप सकते. आप किसी पर धर्म जबरदस्ती नहीं थोप सकते. ये एक धार्मिक नारा है.'

उन्होंने कहा कि बंकिम चंद्र चटोपाध्याय ने 'वंदे मातरम्' को अंग्रेजों के खिलाफ लिखा था, न कि भारतवासियों के खिलाफ. उन्होंने कहा, 'चटोपाध्याय ने ये उस समय लिखा था जब देश में अंग्रेजों का राज था. उन्होंने इसे अपनी किताब में तब लिखा था, जब हमें अंग्रेजों से आजादी नहीं मिली थी. उन्होंने वह किताब अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाने के लिए लिखी थी. इसलिए ये अंग्रेजों के लिए थी, भारत या देशवासियों के लिए नहीं.'

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मौलाना कल्बे जवाद ने कहा कि इसे सबसे लिए जरूरी नहीं बनाया जाना चाहिए. फिर चाहे कोई इसे पढ़े या न पढ़े. लोगों के पास इसकी आजादी होनी चाहिए.

पूर्व सपा सांसद ने भी उठाए सवाल

मुरादाबाद से समाजवादी पार्टी के पूर्व सांसद डॉ. एसटी हसन ने भी इस फैसले का विरोध करते हुए कहा कि वंदे मातरम् गाने के लिए किसी को बाध्य नहीं किया जाना चाहिए.

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उन्होंने कहा कि देश में अलग-अलग धर्म और विचारधारा के लोग रहते हैं. कुछ लोग वंदे मातरम् को धार्मिक नजरिए से देखते हैं और अपने मत के अनुसार उसे गाने में आपत्ति जताते हैं. उनका कहना है कि किसी भी नागरिक को किसी गीत या नारे के लिए मजबूर किया जा सकता.

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि अदालत ने भी साफ किया है कि किसी को बाध्य नहीं किया जा सकता. उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसे फैसलों से महंगाई या रोजगार पर क्या असर पड़ेगा? उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे मुद्दों से समाज में विवाद बढ़ सकता है और ध्रुवीकरण की स्थिति बन सकती है. उनका कहना है कि देश में सभी को अपनी पसंद और आस्था के अनुसार फैसले लेने की आजादी होनी चाहिए.

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क्या है सरकार की नई गाइडलाइंस?

नई गाइडलाइंस के मुताबिक, अब 'वंदे मातरम्' को पूरा गाना अनिवार्य कर दिया गया है. हर बड़े सरकारी कार्यक्रमों में इसे पूरा गाया जाएगा. अगर किसी कार्यक्रम में 'वंदे मातरम्' और 'जन-गण-मन' दोनों होना है तो पहले 'वंदे मातरम्' गाया जाएगा. इसके अलावा, सभी स्कूल में सुबह की असेंबली में वंदे मातरम् गाया जाएगा.

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