क्या महापुरुषों के नाम से कांग्रेस दलित वोटों को साध पाएगी? 

यूपी में कांग्रेस 37 सालों से सत्ता से बाहर है. नारायण दत्त तिवारी की 1989 की सरकार के बाद यूपी में कांग्रेस को कभी सत्ता नसीब नहीं हुई. इन साढ़े तीन दशकों में कांग्रेस का वोट बैंक छिटककर अलग अलग दलों में शिफ्ट हो गया. सवर्ण, ओबीसी, दलित और मुस्लिम वोट बैंक का बड़ा हिस्सा कभी कांग्रेस के साथ था.

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यूपी में दलित मतदाताओं पर कांग्रेस की नजर
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  • उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव है, जिसमें कांग्रेस दलित वोट बैंक को साधने की कोशिश कर रही है
  • कांग्रेस महापुरुषों की जयंती पर कार्यक्रम आयोजित कर दलित समुदाय को अपने साथ जोड़ने का संदेश दे रही है
  • 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन ने दलित वोटों के कारण यूपी में बड़ी जीत हासिल की थी
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लखनऊ:

यूपी में अगले साल विधानसभा का चुनाव है. राजनैतिक दल अभी से अपनी तैयारियों में लग चुके हैं. धर्म और जाति की धुरी पर चलने वाली यूपी की राजनीति में राजनैतिक दल वोट बैंक साधने के उपाय करते हैं. ऐसा ही एक उपाय कांग्रेस करती नज़र आ रही है. पिछले 27 साल से सत्ता से दूर रही कांग्रेस अब दलित वोटों को साथ लाने की ज़द्दोज़हद करती दिखाई दे रही है.उत्तर प्रदेश में अपनी ज़मीन वापस पाने की कोशिश में जुटी कांग्रेस महापुरुषों की जयंती और पुण्यतिथि पर कार्यक्रम आयोजित कर दलितों को ये संदेश देने में लगी है कि दलितों का उद्धार वही कर सकते हैं. वही हैं जो महापुरुषों का सम्मान करते हैं. वही हैं जो जो दलितों को उनका हक़ दिला सकते हैं. कांग्रेस ये बताना चाहती है कि वही हैं जो दलितों के सबसे बड़े हितैषी हैं. 

दलित हितों के लिए अपने काम की याद दिला रही है कांग्रेस

रविवार को पूर्व उप-प्रधानमंत्री बाबू जगजीवन राम की जयंती है. जगजीवन राम की जयंती की पूर्व संध्या पर लखनऊ में कांग्रेस ने एक गोष्ठी का आयोजन किया. इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर जगजीवन राम की बेटी और लोकसभा की पूर्व अध्यक्ष मीरा कुमार मौजूद रहीं. मीरा कुमार ने कहा कि बिहार या यूपी ही नहीं बल्कि कांग्रेस ने पूरे देश में दलितों के हितों में बहुत काम किया है.कांग्रेस की बात करें तो साल 2024 के लोकसभा चुनाव में इंडिया अलायन्स के सपा-कांग्रेस गठबंधन ने यूपी में बड़ी जीत हासिल की. सपा को 37 और कांग्रेस को छह सीटों पर जीत मिली. इस जीत के पीछे सबसे बड़ी वजह दलितों का इंडिया अलायन्स के पक्ष में जुड़ना माना गया. संविधान बदलने की बीजेपी की साजिश का आरोप लगाकर लड़े गए चुनाव में यूपी में बीजेपी को 33 सीटों से संतोष करना पड़ा था. 

बीते लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने ‘अबकी बार-400 पार' का नारा दिया था. इंडिया अलायन्स में शामिल दलों ने कहा कि सरकार बनाने के लिए जब 272 चाहिए तो बीजेपी 400 पार क्यों जाना चाहती है? इसी सवाल का जवाब बनकर कहा गया कि ये 400 पार वाला नारा सिर्फ संविधान बदलने की साजिश है. इंडिया अलायन्स केंद्र में सरकार भले ना बना पाया हो लेकिन बीजेपी को बड़ा नुकसान ज़रूर पहुंचा दिया गया.यूपी में कांग्रेस में हाल ही में कांशीराम जयंती मनाई.

इस कार्यक्रम में ख़ुद राहुल गांधी शामिल होने लखनऊ पहुंचे. बीएसपी के संस्थापक कांशीराम की जयंती का कार्यक्रम कर कांग्रेस ने साफ़ किया कि दलितों को वोटों को साधने के लिए वो नए प्रयोग कर रहे हैं. कांशीराम की पुण्यतिथि के बाद अब जगजीवन राम की जयंती के आयोजन से कांग्रेस का ये प्रयोग आगे बढ़ता दिख रहा है. संभव है 14 अप्रैल को कांग्रेस अंबेडकर की जयंती भी जोरशोर से आयोजित करेगी. 

अगर आंकड़ों की बात करें तो कांग्रेस यूपी में अपने सबसे बुरे दौर में चल रही है. लोकसभा में इंडिया अलायन्स में उसे छह सीटें भले मिल गईं लेकिन विधानसभा में उनकी संख्या सिर्फ़ 2 है. 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ़ एक सीट मिली थी. तब राहुल गांधी अमेठी से चुनाव हार गए थे. 2024 में राहुल गांधी अपनी मां सोनिया गांधी की संसदीय सीट रायबरेली से चुनाव लड़कर जीत लिया. 

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37 वर्षों से सत्ता से बाहर है कांग्रेस

यूपी में कांग्रेस 37 सालों से सत्ता से बाहर है. नारायण दत्त तिवारी की 1989 की सरकार के बाद यूपी में कांग्रेस को कभी सत्ता नसीब नहीं हुई. इन साढ़े तीन दशकों में कांग्रेस का वोट बैंक छिटककर अलग अलग दलों में शिफ्ट हो गया. सवर्ण, ओबीसी, दलित और मुस्लिम वोट बैंक का बड़ा हिस्सा कभी कांग्रेस के साथ था. 1990 में मंडल और कमंडल की राजनीति के दौर में वोट बैंक कांग्रेस से छिटककर बीजेपी, बीएसपी और सपा में चले गए.मंडल और कमंडल की राजनीति में नुक़सान कांग्रेस का हुआ और फ़ायदे में बीजेपी के अलावा नए बने सपा और बीएसपी को हुआ. बीजेपी जहां राम रथ पर सवार होकर कमंडल की राजनीति को आगे बढ़ा रही थी वहीं सपा-बसपा जैसे क्षेत्रीय दल मंडल के नाम पर जातीय आधार पर अपना वोट बैंक मज़बूत करते गए. इसका सीधा असर ये हुआ कि कांग्रेस तमाम कोशिशों के बावजूद यूपी की सत्ता से अब तक दूर है. 

महापुरुषों की जयंती-पुण्यतिथि से कांग्रेस को कितना फ़ायदा होगा, ये तो वक्त ही बताएगा लेकिन अपने सबसे ख़राब दौर से गुज़र रही कांग्रेस के पास विकल्प भी सीमित हैं. ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष अजय राय घटनाओं और दुर्घटनाओं में मृतकों के घर जाने से लेकर अलग अलग मौकों पर लगातार कार्यक्रम कर पार्टी को लड़ाई में लाने की कोशिश में जुटे हैं. देखना होगा, ये कोशिशें कितनी कारगर साबित होती हैं.

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