प्रशासन की लापरवाही ने ली एक और जान, सड़क किनारे बने गड्ढे के दलदल में 12 घंटे तक फंसा रहा युवक, हुई मौत

कानपुर देहात में स्ट्रीट लाइट न होने के कारण बाइक सवार युवक धीरेंद्र गहरे दलदल में गिर गया और 12 घंटे तक फंसे रहने के कारण उसकी मौत हो गयी.

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  • कानपुर देहात के रूरा-शिवली मार्ग पर गहरे कीचड़ भरे गड्ढे में बाइक सवार युवक धीरेंद्र गिर गया था
  • धीरेंद्र करीब बारह घंटे तक उस दलदल में फंसा रहा लेकिन अंधेरे और ठंड के कारण मदद नहीं मिल पाई
  • सुबह किसानों ने धीरेंद्र को कीचड़ में फंसा देखा और ग्रामीणों ने मिलकर उसे बाहर निकाला और अस्पताल पहुंचाया
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कानपुर:

नोएडा में कार सहित दलदल में गिरे इंजीनियर की मौत और दिल्ली में बाइक सवार के गड्ढे में गिरने की घटनाओं की चर्चा के बीच कानपुर देहात में एक बार फिर सिस्टम की बदइंतजामी ने एक हंसते-खेलते परिवार को उजाड़ दिया. रसूलाबाद के भवानीपुर निवासी 25 वर्षीय धीरेंद्र कुमार को अंदाजा भी नहीं था कि जिस सड़क से वह रोज गुजरता है, वही सड़क एक दिन उसकी कब्र बन जाएगी. घटना शिवली कोतवाली क्षेत्र के रूरा-शिवली मार्ग पर कड़ी गांव के पास की है.

पनकी पावर हाउस में काम करता था मृतक

पनकी पावर हाउस में वेल्डर का काम करने वाला धीरेंद्र मंगलवार शाम करीब 6 बजे अपनी बाइक से घर के लिए निकला था. शाम गहरा रही थी और सड़क पर स्ट्रीट लाइट का नामोनिशान नहीं था. अचानक, अंधेरे में उसकी बाइक अनियंत्रित होकर सड़क किनारे बने एक गहरे, कीचड़ भरे गड्ढे (दलदल) में जा गिरी. गड्ढा इतना गहरा और सड़क से नीचे था कि गिरने के बाद वह सड़क से गुजरने वालों की नजरों से ओझल हो गया.

यह दुर्घटना मात्र एक हादसा नहीं, बल्कि एक इंसान की बेबसी की इंतहा थी. गिरने के बाद धीरेंद्र पूरी रात, करीब 12 घंटे तक उस दलदल में फंसा रहा. कड़ाके की ठंड और कीचड़ की जकड़न के बीच वह मदद के लिए चिल्लाता रहा, लेकिन सन्नाटे और अंधेरे ने उसकी आवाज को वहीं दफन कर दिया. न कोई राहगीर रुका, न कोई मदद पहुंची. वह जिंदगी और मौत के बीच झूलता रहा, उम्मीद करता रहा कि शायद कोई फरिश्ता बनकर आएगा.

किसानों ने बाहर निकाला

बुधवार की सुबह जब किसान अपने खेतों पर काम करने पहुंचे, तो उन्हें कीचड़ में कुछ फंसा हुआ दिखाई दिया. पास जाकर देखा तो एक युवक अपनी बाइक समेत धंसा हुआ था. यह मंजर देख ग्रामीणों के होश उड़ गए. ग्राम प्रधान अंकुश कुमार और विजय कुमार ने अन्य ग्रामीणों की मदद से उसे बाहर निकाला. युवक का शरीर ठंड से अकड़ चुका था और वह कीचड़ से सना था. ग्रामीणों ने तुरंत आग जलाई और उसके शरीर को गर्मी देने की कोशिश की. उसका मुंह साफ किया गया और तत्काल 102 एंबुलेंस बुलाकर उसे शिवली अस्पताल भेजा गया. लेकिन अस्पताल में इलाज के दौरान धीरेंद्र ने दम तोड़ दिया.

पुलिस ने परिवार वालों की दी सूचना

मृतक के भाई बृजेंद्र कुमार ने बताया कि धीरेंद्र पूरी रात घर नहीं पहुंचा था, जिससे परिवार चिंतित था. सुबह पुलिस के फोन ने उनकी दुनिया उजाड़ दी. शिवली कोतवाली इंचार्ज प्रवीण यादव के अनुसार, प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि स्ट्रीट लाइट न होने और गड्ढे के सड़क से काफी नीचे होने के कारण रात में यह हादसा किसी को दिखाई नहीं दिया.

इस घटना ने एक बार फिर प्रशासन के दावों की पोल खोल दी है. रूरा-शिवली मार्ग पर स्ट्रीट लाइट का न होना और सड़कों के किनारे मौत के कुएं जैसे गड्ढे होना आम बात हो गई है. धीरेंद्र की मौत महज एक हादसा नहीं, बल्कि उस हत्यारी व्यवस्था का परिणाम है जो करदाताओं के पैसों से सड़कें तो बनाती है, लेकिन उनकी सुरक्षा की गारंटी नहीं देती.
12 घंटे तक तड़पकर एक युवक की जान चली गई, लेकिन बड़ा सवाल वही है आखिर इस मौत का जिम्मेदार कौन है?

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