रामायण के दौर में आया दूरदर्शन का 38 साल पुराना सीरियल, एक्टिंग छोड़ने के बाद आशा पारेख ने किया प्रोड्यूस, रोमांटिक स्टोरी ने जीता दिल

आशा पारेख ने दूरदर्शन का वह शो प्रोड्यूस किया, जो रामानंद सागर की रामायण के दौर में खूब पॉपुलर हुआ. वहीं फैंस के बीच ऐसी जगह बनाई की फैंस के दिलों में बस गया. 

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आशा पारेख का सीरियल, रामायण के दौर में दूरदर्शन पर छाया
नई दिल्ली:

दूरदर्शन का वह दौर जब रामानंद सागर की रामायण ने दर्शकों को टीवी के सामने बैठने पर मजबूर कर दिया था. तब एक टीवी सीरियल की एंट्री हुई, जिसे एक्टिंग छोड़ने के बाद बॉलीवुड की सुपरस्टार आशा पारेख ने प्रोड्यूस किया था. कहानी धार्मिक नहीं बल्कि रोमांटिक थी. इस शो ने दर्शकों के बीच ऐसी पहचान बनाई की फैंस भुला नहीं पाए. यह मंसिमारन सिंह के उपन्यास पर आधारित था, जो लोगों के बीच खूब पॉपुलर हुआ. हम बात कर रहे हैं सीरियल पलाश के फूल की, जो दूरदर्शन पर 1988 से 1990 के दौरान प्रसारित हुआ था. यह एक लोकप्रिय हिंदी टेलीविजन शो था, जो दूरदर्शन-डीडी नेशनल पर प्रसारित होता था. शो की प्रोड्यूसर जानी-मानी एक्ट्रेस रहीं आशा पारेख थीं. आशा पारेख बॉलीवुड की वो एक्ट्रेस थीं, जिन्होंने 60 और 70 के दशक में एक से एक बड़े डायरेक्टर और एक्टर के साथ फिल्में की. आज भी आशा पारेख को उनके फिल्मों के जरिए जाना जाता है. अगर शो पलाश के फूल की बात करें तो यह धारावाहिक डॉक्टर सूर्यबाला की कहानी 'हां लाल पलाश के फूल नहीं ला सकूंगा' या मंसिमारन सिंह के उपन्यास पलाश के फूल पर आधारित था. यह साहित्यकार अमरकांत की भी 'पलाश के फूल' नाम से एक प्रसिद्ध कहानी है, जो लोगों के बीच काफी प्रसिद्ध है.

पलाश के फूल की कहानी 

अगर शो की कहानी की बात करें तो यह कहानी अनूप और उनके बचपन की सहेली वृंदा के आसपास घूमती है. अनूप लगभग 10 साल बाद विदेश से अपने बचपन के घर लौटता है. जब वह देखता है कि वृद्धा की शादी एक उम्रदराज वकील से हो चुकी है. इसके बाद कहानी में फ्लैशबैक शुरू होता है. फ्लैशबैक में उनके अधूरे प्रेम की कुछ ऐसी चीज निकाल कर आती हैं, जो दर्शकों को भावुक कर देती है. इसका सुरीला गीत 'जब-जब मेरे घर आना तुम, फूल पलाश के ले आना तुम' उस दौर में दर्शकों के बीच में काफी लोकप्रिय हुआ था. अगर अशोक की मुख्य कास्ट की बात करें तो इसमें उत्पल दत्त नजर आए थे उत्पल ने रख बाबू का किरदार निभाया था. वहीं अमोल गुप्ते शो में अनूप का किरदार निभाते हुए नजर आए थे. वृंदा का किरदार प्राजक्ता दिघे ने निभाया था. अरुण बाली ने चाचा का किरदार निभाया. ये किरदार उस वक्त काफी लोकप्रिय हुए थे.

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आशा पारेख का वर्कफ्रंट

अगर आशा पारेख के वर्क की बात करें तो उन्होंने साल 1952 में आई 'मां' से एक बाल कलाकार के रूम में अपना करियर शुरू हुआ था. बाद में एक्ट्रेस फिल्म दिल देके देखो में दिखाई दीं. यह फिल्म 1959 में दर्शकों के बीच में आई थी. इसके अलावा आशा 1960 और 70 के दशक में कई फिल्मों में नजर आई. 

इसमें जब प्यार किसी से होता है, भरोसा, जिद्दी, मेरे सनम, तीसरी मंजिल, लव इन टोक्यो, दो बदन, कन्यादान, शिकार, चिराग, साजन, कटी पतंग, समाधि, हीरा, कालिया जैसी तमाम फिल्मों का नाम शामिल है. आशा ने सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार भी जीते और साल 2002 में फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उनकी आत्मकथा द हिट गर्ल साल 2017 में प्रकाशित हुई थी.

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