अरशद नदीम ही नहीं, कॉमनवेल्थ में पूरा पाकिस्तान दल हुआ टांय-टांय फिस्स, जाने भारत के मुकाबले क्या रहा हाल

पाकिस्तान को ग्लासगो में सिर्फ एक पदक मिला और वो भी फातिमा जाहरा ने दिलाया, जबकि अरशद नदीम खाली हाथ घर लौटे.

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India Won 39 Pakistan Won just one Medal

ग्लासगो 2026 में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में अरशद नदीम पाकिस्तानी आवाम को उम्मीदों पर खड़े नहीं उतरे. पेरिस ओलंपिक का स्वर्ण पदक विजेता ब्रॉन्ज भी नहीं जीत पाया और खाली हाथ घर लौटा. पाकिस्तान सिर्फ़ एक मेडल लेकर लौटा. फ़ातिमा ज़हरा ने महिलाओं की 60किलो कैटेगरी में ब्रॉन्ज़ मेडल अपने नाम कर इतिहास रच दिया. ज़हरा कॉमनवेल्थ गेम्स में मेडल जीतने वाली पाकिस्तान की पहली महिला बॉक्सर बनीं. इससे पहले पाकिस्तान को बॉक्सिंग में पिछला मेडल मोहम्मद वसीम ने दिलाया था, जब 2014 के ग्लासगो गेम्स में उन्होंने सिल्वर मेडल अपने नाम किया था. पाकिस्तान ने ग्लासगो के लिए 21 सदस्यों का दल भेजा था. 

भारत vs पाकिस्तान, कॉमनवेल्थ में कौन कहां

भारतीय दल ने ग्लासगो में 39 मेडल जीते. भारत मेडल टैली में चौथे स्थान पर रहा. हालांकि, यह मेडल संख्या बर्मिंघम में जीते मेडल से कम है. बर्मिंघम में हुए राष्ट्रमंडल खेल 2022 में भारत ने कुल 61 मेडल जीते थे. इसमें 22 स्वर्ण, 16 रजत और 23 कांस्य पदक शामिल थे. हालांकि, भारत ने भले ही कम मेडल जीते, लेकिन यह विदेशी धरती पर उसका कॉमनवेल्थ में सबसे बेहतर प्रदर्शन रहा. दूसरी तरफ पाकिस्तान, जिसने बर्मिंघम में कुल 8 मेडल जीते थे- 2 स्वर्ण, 3 रजत और 3 कांस्य, ग्लासगो में सिर्फ 1 मेडल से वापस लौटा. 

कॉमनवेल्थ खेलों के सिर्फ एक या दो संस्करण तक ही यह अंतर सीमित नहीं है बल्कि राष्ट्रमंडल खेलों के इतिहास को उठाकर देखें तो यह और अधिक दिखता है. कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास में भारत ने कुल 602 पदक जीते हैं. इसमें 215 स्वर्ण, 207 रजत और 180 कांस्य पदक शामिल हैं. बात अगर पाकिस्तान की करें तो उसने खेलों के 15 संस्करण में हिस्सा लिया है और केवल 75 मेडल जीते हैं. जिनमें 25 स्वर्ण , 24 रजत और 26 कांस्य पदक शामिल हैं.

फ़ातिमा ज़हरा ने दिखाया सरकार को आईना

फ़ातिमा ज़हरा ने पाकिस्तानी सरकार को आईना दिखाने में जरा भी नहीं देर नहीं लगाई. उन्होंने साफ कहा कि अगर स्थानीय स्तर पर उन्हें सरकार का थोड़ा भी समर्थन मिलता तो पदक का रंग दूसरा होता. पाकिस्तानी अखबार डॉन न्यूज ने फ़ातिमा ज़हरा के हवाले से लिखा,"कॉमनवेल्थ गेम्स में मेडल जीतने वाली पहली पाकिस्तानी महिला बॉक्सर बनकर मुझे खुशी हो रही है. मुकाबला बहुत कड़ा था. मेरे लगभग सभी प्रतिद्वंद्वी अमेरिका में ट्रेनिंग कर रहे थे." 

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फातिमा ज़हरा ने इसके बाद सवाल उठाते हुए कहा कि भारत समेत कई देशों ने अमेरिका में अपने ट्रेनिंग कैंप आयोजित किए, जबकि पाकिस्तान ने अपनी सारी तैयारियां घर पर ही कीं. उन्होंने कहा,"घर पर विश्व स्तरीय ट्रेनिंग और कोचिंग सुविधाओं के साथ-साथ विदेशी प्रतियोगिताओं के माध्यम से अधिक से अधिक अंतरराष्ट्रीय अनुभव मिलने से मेरे सहित पाकिस्तानी एथलीटों की किस्मत बदल सकती है." 

"पाकिस्तान में उपलब्ध खेल के माहौल और अन्य देशों के माहौल में बहुत बड़ा अंतर है. जब तक हमारे एथलीटों को उच्च गुणवत्ता वाली ट्रेनिंग नहीं मिलती और वे नियमित रूप से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा नहीं करते, तब तक हमारे लिए उच्चतम स्तर पर सफल होने के लिए आवश्यक मानक विकसित करना मुश्किल होगा."

अरशद नदीम पर बवाल, लेकिन स्पोर्ट्स स्ट्रक्चर कहां? 

यह बीते 36 सालों में कॉमनवेल्थ खेलों में उसका सबसे खराब प्रदर्शन है. अरशद नदीम के फेल होने पर बवाल मचा हुआ है. अरशद नदीम के कोच ने इसके लिए इस जैवलीन स्टार की लापरवाही को जिम्मेदार ठहराया है, लेकिन उससे बड़ा सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान की सरकार अपने खिलाड़ियों के लिए वो इंफ्रा खड़ा कर पाई है, क्या वो अपने एथलीट्स को बुनियादी सुविधाएं भी दे पा रही है

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पाकिस्तानी अखबार पाकिस्तान ट्रिब्यून ने अपनी एक रिपोर्ट में ग्लासगो में खराब प्रदर्शन का रिव्यू करते हुए साफ लिखा कि इसने एक बार फिर पाकिस्तान में खेल व्यवस्था की गहरी कमियों को उजागर किया है. अखबार ने जूडो में निराशा हाथ लगने,  रेसलिंग का खेलों का हिस्सा ना होने और वेटलिफ्टिंग में प्रमुख वेटलिफ्टर तलहा तालिब और नूह दस्तगीर बट की अनुपस्थिति को दल के खराब प्रदर्शन के कारण में तो गिना.  अंत में रिपोर्ट ने लिखा कि ये नतीजे पाकिस्तान के स्पोर्ट्स स्ट्रक्चर से जुड़ी बड़ी चिंताओं को उजागर करते हैं. "देश में खिलाड़ियों के विकास के लिए कोई टिकाऊ सिस्टम नहीं है; यहां लंबे समय की योजना, ट्रेनिंग प्रोग्राम और संस्थागत सहयोग की कमी है."

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Arshad Nadeem