Bhind News: मध्य प्रदेश के भिंड जिले के मेहगांव में आयोजित “संकल्प से समाधान” जनसमस्या निवारण शिविर के दौरान प्रशासनिक लापरवाही और प्रोटोकॉल उल्लंघन का मामला सामने आया है. सरकारी कार्यक्रम में अधिकारियों ने कैबिनेट मंत्री राकेश शुक्ला की अनुपस्थिति में उनके बेटे आलोक शुक्ला को मुख्य अतिथि बना दिया और हितग्राहियों को योजनाओं के प्रमाण पत्र वितरित करा दिए. इसकी तस्वीरें सामने आने के बाद अधिकारियों के इस कारनामे का विरोध हो रहा है.
जानकारी के अनुसार, सोमवार को मेहगांव में “संकल्प से समाधान” अभियान के तहत जनसमस्या निवारण शिविर का आयोजन किया गया था. इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में स्थानीय विधायक और कैबिनेट मंत्री राकेश शुक्ला को शामिल होना था. किसी कारण से मंत्री कार्यक्रम में नहीं पहुंच सके. ऐसी स्थिति में आमतौर पर कार्यक्रम की जिम्मेदारी किसी अन्य जनप्रतिनिधि या वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी को दी जाती है, लेकिन यहां अधिकारियों ने अलग ही रास्ता अपनाया.
मंत्री के बेटे को बनाया मुख्य चेहरा
मंत्री के नहीं पहुंचने पर अधिकारियों ने उनके बेटे आलोक शुक्ला को मंच पर बुलाया और उन्हें प्रमाण पत्र वितरण की जिम्मेदारी सौंप दी. मंच से उन्होंने विभिन्न योजनाओं के लाभार्थियों को प्रमाण पत्र और लाभ वितरित किए. अधिकारियों की मनमानी यहीं नहीं रुकी, जनसंपर्क अधिकारी पुष्पराज सिंह द्वारा जारी प्रेस नोट में आलोक शुक्ला को “जनप्रतिनिधि” बता दिया गया. इसके बाद यह विवाद और बड़ गया. विपक्षी पार्टी को मामले को लेकर हमलावर हो गई. उनका कहना है कि जनप्रतिनिधि वो होता है जिसे जनता द्वारा चुना गया हो, जैसे मंत्री, सांसद, विधायक या निर्वाचित निकाय प्रतिनिधि समेत अन्य. आलोक शुक्ला ने अब तक कोई चुनाव नहीं लड़ा है और न ही उनके पास कोई संवैधानिक या प्रशासनिक पद है. ऐसे में उन्हें “जनप्रतिनिधि” बताना नियमों के तहत गलत है.
क्या कहता है सरकारी प्रोटोकॉल?
सरकारी कार्यक्रमों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश होते हैं. मंच से वितरण कार्य केवल अधिकृत जनप्रतिनिधि या सरकारी अधिकारी ही कर सकते हैं. मंत्री की अनुपस्थिति में यह जिम्मेदारी किसी अन्य अधिकृत अधिकारी या जनप्रतिनिधि को सौंपी जाती है. किसी निजी व्यक्ति या परिजन से मंच पर सरकारी कार्य कराना प्रोटोकॉल का उल्लंघन माना जाता है. इस मामले में इन सभी नियमों को नजरअंदाज किया गया.














