120 दिनों तक रोज़ लिखने से बदला मेरा दिमाग: 23 साल के राजवीर सिंह ने साझा किए अनुभव

रोज़ लिखने की एक छोटी‑सी आदत ने आलस, थकान और भूलने की समस्या कैसे दूर कर दी—23 साल के राजवीर सिंह का सच्चा अनुभव.

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Real Life Experience of a 23 Year Old: मेरा नाम राजवीर सिंह है और मैं एक प्राइवेट फर्म में काम करता हूं. दिखने में मैं एकदम चिल और खुशमिजाज इंसान हूं, लेकिन पिछले कुछ महीनों से मेरे साथ कुछ अजीब हो रहा था. मैं छोटी‑छोटी बातें भूलने लगा था. जैसे किचन में किसलिए आया हूं, यह याद नहीं रहता था या किसी ज़रूरी मीटिंग का पॉइंट दिमाग से स्लिप हो जाता था. मुझे लगा कि शायद यह काम का स्ट्रेस है, पर जब यह रोज़ होने लगा, तो मुझे डर लगने लगा कि कहीं मेरी मेमोरी जवाब तो नहीं दे रही.

जब ये असर मेरे करियर और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर दिखने लगा, तब एहसास हुआ कि समस्या सिर्फ स्ट्रेस नहीं है- मेरा दिमाग धीमा पड़ रहा है. तभी एक सीनियर की सलाह पर- 

मैंने तय किया कि मैं अगले 120 दिनों तक रोज़ कुछ न कुछ लिखूंगा. मुझे खुद यकीन नहीं था कि इससे कोई फर्क पड़ेगा, लेकिन आज मैं पूरा भरोसे से कह सकता हूं- इस एक आदत ने मेरे दिमाग को पूरी तरह रीसेट कर दिया. 

राजवीर का कहना है कि स्कूलिंग के बाद जब वे कॉलेज पहुंचे, तो लिखने का काम बेहद कम हो गया. वे नोटबुक से टैब पर आए, टैब से फोन के मैसेज पर, और अब तो उन्हें मैसेज लिखने में भी आलस आने लगा था, इसलिए वे ऑडियो नोट ही भेजने लगे थे.

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मैंने तो गूगल सर्च भी ऑडियो असिस्टेंट से शुरू कर दी थी. मुझे एक अक्षर लिखने में ही मौत आने लगी थी. लेकिन ये आदत सिर्फ लिखने तक नहीं रही थी. अब मैं धीरे‑धीरे बेहद आलसी होने लगा था और हर काम को टालने लगा था. भले ही इससे मैं आराम के मोड में रहता था, लेकिन इस आदत का असर मेरे बाकी कामों पर होने लगा था.

राजवीर हर चीज़ टालने लगे थे. चाहे दोस्तों से मिलना हो, घर का कोई फंक्शन अटेंड करना हो, बैंक का कोई काम हो या उठकर खुद के लिए पानी ही क्यों न लेना हो. वे कहते हैं—

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“मुझे कितनी ही प्यास लगी हो, मैं वेट करता था कि कोई किचन की तरफ से आए या फिर उस तरफ जाए, तो मैं पानी मंगा लूं. ऐसा लगता था जैसे हवा में ही थकान है. मैं सांसों में ऑक्सीजन नहीं, थकान ले रहा था और बदले में छोड़ रहा था और ज़्यादा थकान.”

जब असर करियर और दफ्तर के काम पर दिखने लगा, तो मुझे चिंता हुई. इसी बीच ऑफिस में अपने एक सीनियर प्रवीण जी से बात करते हुए मैंने उनके सामने अपनी परेशानी रखी और बताया कि इसी उम्र में मुझे 45 वाली फीलिंग आ रही है. मैं हमेशा थका रहता हूं और काम में मन नहीं लगता.

तो उन्होंने सलाह दी कि मैं रोज़ लिखना शुरू करूं.

मेरे सीनियर उम्र में मुझसे कहीं बड़े थे. वे करीब 45 साल के हैं और मैं 23 का. लेकिन अगर आप हम दोनों से कुछ देर बात करें और हमारे साथ काम करें, तो आपको लगेगा कि वे 23 के हैं और मैं 45 का हूं. उन्होंने कहा-  “रोज़ लिखो. कम से कम 3 महीने तक.”

मुझे लगा, क्या ही बकवास कर रहा है ये इंसान. लेकिन क्योंकि मैं बड़ों का सम्मान करता हूं और वे मेरे बेहद करीब हैं, तो सोचा- चलो, इनकी बात मान ली जाए.

राजवीर कहते हैं कि जब मैं इस सलाह को फालतू मानकर फॉलो करना शुरू कर रहा था, तो मुझे पूरी उम्मीद थी कि इससे कुछ नहीं होने वाला. लेकिन हुआ इसका उलटा.

मैंने तय किया कि मैं अगले 120 दिनों तक रोज़ कुछ न कुछ लिखूंगा. आज मैं अपना वही अनुभव आपके साथ शेयर कर रहा हूं कि कैसे लिखने की इस छोटी‑सी आदत ने मेरे दिमाग को पूरी तरह रीसेट कर दिया.

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120 दिनों तक रोज़ लिखने की आदत डालने से मेरे दिमाग पर क्या असर पड़ा?

आज के तेज़ रफ्तार और डिजिटल युग में हमारा दिमाग लगातार जानकारी और विचारों से भरता रहता है. ऐसे में रोज़ाना लिखने की आदत केवल एक साधारण एक्टिविटी नहीं रही, बल्कि यह दिमाग को दुरुस्त रखने और कल्पनाओं को पंख देने का एक प्रभावी माध्यम बन गई है. लिखने की यह आदत तनाव कम करने, क्रिएटिविटी बढ़ाने और बेहतर निर्णय लेने की क्षमता विकसित करने में मदद करती है. राजवीर कहते हैं कि इस बीच सबसे अच्छी बात यही है कि इसका असर आप नियमित अभ्यास के शुरुआती 12 दिनों में ही महसूस करने लगेंगे.

अनुशासन:  रोज़ाना लिखने की आदत ने अनुशासित जीवन को बढ़ावा दिया. यह आपके जीवन के दूसरे पहलुओं पर भी प्रभाव डालती है. नियमित लेखन से आप अपने लक्ष्यों और दिनचर्या के प्रति ज़्यादा कमिटेड रहते हैं. इससे टाइम मैनेजमेंट और काम करने की क्षमता में सुधार होता है.

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मेरी सहानुभूति और समझ बढ़ी: अगर आप किसी कैरेक्टर को ध्यान में रखकर लिखते हैं, तो उसी नज़रिए से चीज़ों को देखने लगते हैं. इससे भावनाएं और दूसरों को समझने की क्षमता मजबूत होती है.

सोच में सुधार हुआ:  इस एक आदत को अपनाने से मेरी सोच में बहुत बदलाव आए. असल में हमारे दिमाग में विचारों और भावनाओं का एक उलझा हुआ जाल होता है. लिखने की आदत इस जाल को सुलझाने का माध्यम बनती है. यह हमें अपने विचारों को स्पष्ट करने और उन्हें लॉजिकल ऑर्डर में रखने के लिए मजबूर करती है. ठीक वैसे ही जैसे आप गंदे कमरे को व्यवस्थित करते हैं, लेखन से विचारों में स्पष्टता और समझ आती है.

मेंटल हेल्थ की काया पलट गई:  लिखने की आदत ने थेरेपी का काम किया. अपने विचारों और भावनाओं को कागज़ पर व्यक्त करने से मानसिक राहत मिलती है, तनाव कम होता है और अंदरूनी संघर्षों को सुलझाने में मदद मिलती है.

नए विचारों का सृजन:  रोज़ाना लिखने की आदत नए विचारों को जन्म देती है. किताबें, बातचीत, अनुभव, ऑनलाइन कंटेंट और मीडिया सहित तमाम माध्यम आपके लिए विचारों का उर्वर मैदान हैं. लिखने से दिमाग हमेशा नए दृष्टिकोण और समाधान खोजने के लिए एक्टिव रहता है.

राइटिंग स्किल में सुधार: जितना ज़्यादा आप लिखते हैं, उतना ही बेहतर बनते हैं. डिजिटल युग में अच्छी लेखन क्षमता नए अवसर और संभावनाओं के दरवाज़े खोल सकती है. चाहे प्रोफेशनल जीवन हो या पर्सनल, लिखने की आदत आपकी स्किल्स को लगातार सुधारती है.

वाकई, मैं आज प्रवीण सर को थैंक यू कहता हूं और खुद पर गर्व करता हूं कि मैंने अपने जीवन को सही दिशा दी. अगर आप भी मेरी तरह टेक्नोलॉजी के युग में लिखना छोड़ चुके हैं, तो एक बार खुद को 120 दिनों का समय दें और बदलाव देखें.

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