संसद सत्र के दौरान गुरुवार को एक ऐसी चीज भी दिखी जिसने कई लोगों का ध्यान खींच लिया. कांग्रेस नेता राहुल गांधी के गले में एक अलग तरह का हार नजर आया. पारंपरिक डिजाइन और धातु के सजावटी टुकड़ों वाला यह हार नागालैंड की जनजातीय संस्कृति से जुड़ी नगा शैली की माला है. नॉर्थ-ईस्ट के नागा समुदायों में इस तरह के आभूषण केवल सजावट के लिए नहीं पहने जाते, बल्कि इन्हें पहचान, सम्मान और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक माना जाता है. यही वजह है कि संसद में इसके दिखने के बाद कई लोगों के मन में सवाल उठा कि आखिर इस पारंपरिक माला का इतिहास क्या है और नागा संस्कृति में इसका महत्व क्यों खास माना जाता है.
नागा समाज में आभूषण का खास महत्व
नागालैंड की जनजातीय परंपराओं में आभूषणों का महत्व बहुत गहरा है. पारंपरिक नेकलेस, हेडगियर और अन्य आभूषण किसी व्यक्ति की जनजातीय पहचान, सामाजिक स्थिति और समुदाय से जुड़ाव को दर्शाते हैं. कई बार ये आभूषण पीढ़ियों तक परिवारों में विरासत के रूप में संभालकर रखे जाते हैं और विशेष अवसरों पर पहने जाते हैं.
राहुल गांधी ने जो नेकलेस पहना है उसे कोन्याक नागा जनजाति का बताया जा रहा है. यह जनतजाति नागालैंड के मोन जिले में रहने वाली सबसे बड़ी जनजातियों में से एक हैं. इन्हें 'हेडहंटर्स' (सिर का शिकार करने वाले) के रूप में भी जाता है.
कई तरह की सामग्री से बनते हैं ऐसे हार
नागा समुदाय के पारंपरिक आभूषणों में केवल मोतियों का ही इस्तेमाल नहीं होता. इनमें धातु के पेंडेंट, कांच या पत्थर के मोती, सीप, हड्डी, लकड़ी या अन्य प्राकृतिक सामग्री भी इस्तेमाल की जाती है. यही वजह है कि हर जनजाति की ज्वेलरी का डिजाइन थोड़ा अलग दिखाई देता है और उससे उस समुदाय की पहचान भी झलकती है.
प्रतिष्ठा और परंपरा से भी जुड़ा रहा है रिश्ता
इतिहास में कई नागा जनजातियों के बीच ऐसे आभूषण सामाजिक प्रतिष्ठा और संपन्नता का संकेत भी माने जाते थे. कई परिवार इन्हें कीमती धरोहर की तरह संभालकर रखते थे और खास अवसरों पर ही पहना जाता था. कुछ आभूषण तो परिवारों में पीढ़ियों से चले आ रहे होते हैं.
इस तरह की पारंपरिक मालाएं अक्सर त्योहारों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सामुदायिक समारोहों के दौरान पारंपरिक पोशाक के साथ पहनी जाती हैं.