पहले भीतर की होलिका को जलाओ और फि‍र जानों होली क्यों मनाई जाती है : गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर

ऐसी कथा प्रचलित है कि हिरण्यकश्यप को प्रह्लाद की नारायण भक्ति पसंद नहीं थी. वह चाहता था कि प्रह्लाद नारायण की नहीं बल्कि उसकी ही भक्ति करे, उसे ही भगवान माने.

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उत्तर भारत में होली के विषय में हिरण्यकश्यप और होलिका एक कहानी बहुत प्रचलित है. ‘हिरण्यकश्यप' वह है जो सदा स्वर्ण को देखता रहता है, हमेशा संपत्ति-संपदा देखने वाला, जिसको माँ-बाप, बेटा और पत्नी कुछ नजर नहीं आता; सिर्फ पैसे ही नजर आते हैं.  हिरण्यकश्यप की बहन होलिका के पास एक ऐसा वस्त्र था, जिसे पहनकर जब वह अग्नि पर बैठती थी, तो अग्नि उसको जला नहीं सकती थी. 

हिरण्यकश्यप का पुत्र था प्रह्लाद. आह्लाद माने खुशी, संतोष! एक अति विशिष्ट संतोष, खुशी और आह्लाद ही प्रह्लाद है. प्रह्लाद नारायण का भक्त था. नारायण माने आत्मा. जो खुशी आत्मा से मिलती है वह खुशी और कहीं नहीं मिलती. हम सभी को एक ऐसे विशिष्ट आनंद की चाह है जो कभी समाप्त ही न हो. हर एक व्यक्ति की चाह एक ही है- प्रह्लाद! ऐसे ही विशिष्ट आनंद की तलाश में लोग शराब पीते हैं, जुआ खेलते हैं और पैसे इकट्ठे करते हैं. लोग जो भी हित-अहित काम कर बैठते हैं वह सब उसी विशिष्ट आह्लाद ‘प्रह्लाद' की चाह में करते हैं. 

ऐसी कथा प्रचलित है कि हिरण्यकश्यप को प्रह्लाद की नारायण भक्ति पसंद नहीं थी. वह चाहता था कि प्रह्लाद नारायण की नहीं बल्कि उसकी ही भक्ति करे, उसे ही भगवान माने.  

यद्यपि हिरण्यकश्यप स्वयं आनंद की खोज में निकला लेकिन अपने पुत्र प्रह्लाद के इतने पास होते हुए भी उसे पहचान नहीं पाया. उसकी यह बात समझ में नहीं आई कि ऐसा आनंद कहाँ से मिलता है? वह  ऐसे आनंद को  इधर-उधर ढूंढता रहा. हिरण्यकश्यप इस तरह स्वयं भी परेशान रहा और उसने तरह-तरह से प्रह्लाद को भी परेशान किया, मगर प्रह्लाद को कुछ नहीं हुआ. 

लोभी व्यक्ति दूसरों को कम, खुद को ज्यादा सताते हैं. इसलिए ऐसे लोगों के चेहरे में कोई आनंद, मस्ती और शांति कभी नहीं होती. उसने अपने बेटे को सताया या खुद को सताया, दोनों एक ही बात है. 

एक बार हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका से कहा कि वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि पर बैठ जाए. उसने ऐसा सोचा कि होलिका को वरदान के कारण कुछ नहीं होगा लेकिन प्रह्लाद  अग्नि में जलकर मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा. हिरण्यकश्यप के कहने पर होलिका प्रह्लाद को लेकर अग्नि पर बैठी किंतु प्रह्लाद नहीं जला बल्कि होलिका जल गई. यह होलिका दहन की कहानी है. 

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इसीलिए प्राचीन काल से भारत में यह पद्धति चली आ रही है कि फाल्गुन पूर्णिमा के दिन घर की पुरानी व्यर्थ वस्तुओं को इकट्ठा करके उसकी होली जलाते हैं. यदि हम पुरानी सब बातों और कामनाओं को नहीं जलाते, तो कामनाएँ हमें जला देती हैं . कामनाओं को जलाने का अर्थ है,  तृप्त हो जाना, पूर्ण हो जाना, समर्पण कर देना. 

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आपके भीतर के आनंद और खुशी को बचाने की तृष्णा इस पूरी समष्टि को है. ये सृष्टि हर तरह से आपको खुश करने की चेष्टा में लगी हुई है . यहाँ केवल एक तरह का फूल नहीं है, हजारों तरह के फूल और सब्जियां हैं, यहाँ रोज एक ही तरह के बादल नहीं होते हैं; आपको रोज-रोज आसमान में अलग-अलग तरह की पेंटिंग मिलती है! हम फिर भी मुँह लटका कर हिरण्यकश्यप बने रहते हैं. 

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जो भोलेभाव से भरा हो और जिसमें मस्ती हो, भगवान के सिवा जिसे कुछ दिखाई ही नहीं देता, ऐसे अपने भक्त प्रहलाद की प्रार्थना सुनकर भगवान नारायण खंभे से निकल आये और उन्होंने हिरण्यकश्यप की जीवन लीला को समाप्त कर दिया. जीवन में जब हम सिर्फ धन के बारे में सोच-सोच कर पत्थर जैसे हो जाते हैं, तब उससे भी भगवान निकल आते हैं. उस जड़ता में से चेतना का उदय ही होली है. जब चेतना का उदय हो जाता है तो फिर रंग-बिरंगी होली होती है, सब लोग रंगों से खेलते हैं और उत्सव मनाते हैं. 

होली हमें यही सिखाती है- पहले भीतर की होलिका को जलाओ, फिर बाहर रंग खेलो. पहले जड़ता को पहचानो, फिर चेतना को जागृत करो. जब भीतर का प्रह्लाद सुरक्षित रहता है, तब जीवन रंगों से भर उठता है.
 

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