समर्पण और ध्यान का असली मतलब क्‍या है : गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर

हम प्रतिदिन भोजन करते हैं, फिर भी भूख लगती है. प्रतिदिन सोते हैं, फिर भी विश्राम की आवश्यकता होती है. कोई यह नहीं कहता कि नित्य खाना या सोना उबाऊ है. जब जीवन की आवश्यक क्रियाएं हम नियमित रूप से करते हैं, तो प्रार्थना और ध्यान क्यों नहीं?

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अक्सर लोग सोचते हैं कि एक बार भगवान के आगे सिर झुका दिया या प्रार्थना कर ली तो काम पूरा हो गया. लेकिन समर्पण कोई एक बार की घटना नहीं है बल्कि यह हर पल चलने वाली एक प्रक्रिया है. जैसे हमें रोज भूख लगती है और हम रोज खाना खाते हैं. वैसे ही प्रार्थना और ध्यान भी रोज की जरूरत है. साधना का असली सार यही है कि हम बार बार उस परम शक्ति को याद करें और अपने भीतर की जागरूकता को जगाए रखें.

“हे प्रभु, बार-बार मैं तुम्हें प्रणाम करता हूं. बार-बार मैं तुम्हें अपने भीतर पहचानता हूं.” - यही साधना का सार है-निरंतर स्मरण, निरंतर जागरूकता.

प्रार्थना और रोज के काम में अंतर

एक मां ने अपने बेटे से कहा कि सोने से पहले प्रार्थना किया करो. बच्चा बैठता और एक क्षण में प्रार्थना करके सो जाता. एक दिन मां ने पूछा, “इतनी जल्दी कैसे समाप्त कर लेते हो?”

लड़के ने उत्तर दिया, “मां, प्रतिदिन वही बातें दोहराने का क्या अर्थ? इसलिए मैं ‘डिट्टो' कह देता हूं.” मां मुस्कुराई और बोली, “ठीक है, कल से मैं भी नाश्ते में ‘डिट्टो' कह दूंगी.”

हम प्रतिदिन भोजन करते हैं, फिर भी भूख लगती है. प्रतिदिन सोते हैं, फिर भी विश्राम की आवश्यकता होती है. कोई यह नहीं कहता कि नित्य खाना या सोना उबाऊ है. जब जीवन की आवश्यक क्रियाएं हम नियमित रूप से करते हैं, तो प्रार्थना और ध्यान क्यों नहीं? प्रार्थना हमें किसी नई वस्तु से नहीं जोड़ती; वह हमें हमारे मूल जुड़ाव का स्मरण कराती है. गतिविधियां हमें हमारे अस्तित्व से दूर ले जाती हैं, प्रार्थना हमें याद दिलाती है कि हम उससे कहीं अधिक विशाल हैं, जितना हम स्वयं को समझते हैं.

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ध्यान में आंखें बंद क्यों करते हैं

हम निरंतर कर्ता और दर्शक की भूमिका निभाते रहते हैं, पर अपने शुद्ध अस्तित्व को भूल जाते हैं. “सोऽहम्”-मैं वही हूं. यह बोध विश्राम और निर्विकार अवस्था में प्रकट होता है. ध्यान दीजिए, जब आप किसी बात को बहुत ध्यान से सुनना चाहते हैं, तो आँखें बंद कर लेते हैं. हमारी ऊर्जा सीमित है. यदि किसी दृश्य को गहराई से देखना हो, तो शोर नहीं चाहिए.

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यदि कोई दूरबीन से तारों को देख रहा हो और आप पास में संगीत चला दें, तो वह विचलित हो जाएगा. आकाशीय पिंडों को देखने के लिए पूर्ण शांति आवश्यक है. उसी प्रकार, ध्यान में हम आंखें बंद करते हैं, ताकि चेतना बाहर की वस्तुओं में न उलझे और भीतर की ओर मुड़े.

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पांचों इन्द्रियां निरंतर क्रिया में संलग्न रहती हैं- सुनना, देखना, स्पर्श करना, चखना, सूंघना. ध्यान इन क्रियाओं से हटकर कर्ता के बोध में स्थापित होना है. एक उपाय है-आंखें बंद कर मौन में बैठना और ऊर्जा को भीतर समेटना. दूसरा उपाय है मंत्र-जप. जब आप मंत्र सुनते हैं, तो मानो उसमें स्नान करते हैं.

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दृष्टि के माध्यम से भी साधना की जाती है-जैसे त्राटक, दीपक की लौ पर एकटक देखना, या दृष्टि को नासिका के अग्रभाग पर स्थिर करना. यदि दृष्टि भूमि से लगभग तीस डिग्री के कोण पर टिके, तो मन स्वाभाविक रूप से अंतर्मुखी होने लगता है.

दृष्टि और मन का गहरा संबंध

यह विधि श्रीमद्भगवद्गीता में भी वर्णित है, जहां भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि दृष्टि को नासिका के अग्रभाग पर स्थिर रखो, इधर-उधर न भटकाओ. इसका आशय है- मन को दिशाओं में भटकने से रोककर भीतर की ओर मोड़ना. दूसरी ओर, गौतम बुद्ध ने ध्यान में आँखें पूर्णतः बंद करने की बात कही. महावीर जी ने भी अंतर्मुखता पर बल दिया. शिव की प्रतिमाओं में आंखें लगभग पूर्णतः बंद और किंचित् खुली दिखाई देती हैं- न पूरी तरह बाहर, न पूरी तरह भीतर. यह अवस्था ‘संध्या' की है-जागृति और निद्रा के बीच, बाह्य और आंतरिक जगत के मध्य संतुलन.

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चिंता छोड़ें और विश्वास रखें

प्रारंभ में थोड़ा प्रयास आवश्यक होता है, पर आगे चलकर प्रयास भी छोड़ना पड़ता है. समाधि तब घटित होती है जब साधक का प्रयत्न विलीन हो जाता है. ध्यान के लिए घंटों बैठना अनिवार्य नहीं; थोड़े समय में भी गहराई संभव है, यदि वैराग्य हो- यह बोध कि सब नश्वर है. पीछे मुड़कर देखिए,पिछले दस-पंद्रह वर्षों में हमने कितने घंटे चिंता में बिताए? परीक्षा की चिंता, नौकरी की चिंता, विवाह की चिंता… पर प्रत्येक कठिन समय में कोई अदृश्य प्रकाश हमारा मार्गदर्शन करता रहा. फिर अब चिंता क्यों?

“अग्ने नय सुपथा राये” अर्थात हे अग्नि, हमें शुभ मार्ग पर ले चलो. यह विश्वास ही श्रद्धा है कि जो शक्ति अब तक संभालती आई है, वही आगे भी संभालेगी. “मेरे लिए केवल सर्वोत्तम ही होगा”- यह योगी का दृढ़ संकल्प है. यदि कोई व्यक्ति या घटना आपको विचलित करे, तो स्मरण कीजिए कि एक दिन सब भस्म हो जाएगा; यह शरीर भी और वह भी. तब ईर्ष्या या घृणा किससे? भूमिकाएं बदलती रहती हैं; आत्मा शाश्वत है.

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भूमिकाओं से परे अपनी आत्मा को पहचानें

उपनिषदों का संदेश यही है- भूमिकाओं से परे जाओ. स्वयं को रिक्त भी बनाओ और पूर्ण भी. बार-बार स्मरण करो, बार-बार प्रणाम करो, क्योंकि समर्पण एक क्षणिक घटना नहीं, बल्कि चेतना की सतत धारा है. जब यह जागरूकता स्थिर हो जाती है, तब चिंता मिट जाती है और जीवन सहज श्रद्धा, शांति और आनंद में प्रवाहित होने लगता है.

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