Parenting Tips: पैरेंटिंग का 7-7-7 नियम क्या है, पता भी नहीं चलेगा और बड़े हो जाएंगे बच्चे, परवरिश होगी बेहद आसान और फन

The 7-7-7 Rule of Parenting: यहां हम बात कर रहे हैं 7-7-7 रूल ऑफ इफेक्टिव पैरेंटिंग की. पैरेंटिंग के इस तरीके को कई लोग काफी आसान व प्रभावी मानते हैं.

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पैरेंटिंग का 7-7-7 नियम क्या है? जानें

The 7-7-7 Rule of Parenting: हर माता पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा खुश रहे, आत्मविश्वास से भरा हो और आगे चलकर एक अच्छा इंसान बने. लेकिन परवरिश का कोई एक तय फॉर्मूला नहीं होता. हर बच्चा अलग होता है और हर परिवार की परिस्थितियां भी अलग होती हैं. यहां हम बात कर रहे हैं 7-7-7 रूल ऑफ इफेक्टिव पैरेंटिंग की. पैरेंटिंग के इस तरीके को कई लोग काफी आसान व प्रभावी मानते हैं.

Easy Parenting Tips: माना जाता है कि यह नियम बच्चों को सही दिशा देने में मदद करता है और उन्हें एक संतुलित इंसान बनने की राह दिखाता है. यह नियम बच्चे के पहले 21 साल को तीन हिस्सों में बांटता है. हर हिस्सा सात साल का होता है और हर दौर में पैरेंट्स की भूमिका थोड़ी अलग मानी जाती है.

पेरेंटिंग का 7-7-7 नियम (The 7-7-7 Rule of Parenting)

पहला दौर- 0 से 7 साल, फोकस खेल पर

बच्चे की जिंदगी के शुरुआती सात साल खेलने, मस्ती करने और आसपास की दुनिया को समझने के लिए सबसे अहम माने जाते हैं. इस उम्र में बच्चे किताबों से ज्यादा खेल और गतिविधियों के जरिए सीखते हैं. खेलना उनके दिमाग के विकास, भाषा सीखने और दूसरों से घुलने मिलने में मदद करता है.

इस दौरान पैरेंट्स का काम होता है कि वे बच्चों के साथ समय बिताएं, उनके साथ खेलें, कहानियां सुनाएं और उनकी जिज्ञासा को बढ़ावा दें. ऐसा माहौल बच्चे को खुशी देता है और माता पिता से उसका रिश्ता मजबूत बनाता है. जब बच्चा खुद को सुरक्षित और प्यार महसूस करता है, तो आगे सीखने की नींव मजबूत होती है.

दूसरा दौर: 7 से 14 साल, फोकस सिखाने पर

सात से चौदह साल की उम्र में बच्चे ज्यादा समझदार होने लगते हैं और स्ट्रक्चर्ड लर्निंग के लिए तैयार रहते हैं. यह समय उन्हें लाइफ स्किल्स, वैल्यूज और सोशल बिहेवियर सिखाने का होता है. इस उम्र में पैरेंट्स बच्चों को सही और गलत का फर्क समझा सकते हैं, दोस्ती निभाना सिखा सकते हैं और उनकी रुचियों को पहचानने में मदद कर सकते हैं.

साथ ही स्कूल से जुड़ी पढ़ाई और दूसरी गतिविधियों में उनकी भागीदारी बच्चों का कॉन्फिडेंस बढ़ाती है और अकादमिक सफलता में भी सहायक होती है. यह दौर जिम्मेदारी, कम्युनिटी और विश्वास जैसे विचारों को समझाने के लिए भी अच्छा माना जाता है.

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तीसरा दौर: 14 से 21 साल, फोकस गाइड करने पर

आखिरी सात सालों में बच्चे धीरे धीरे युवा वयस्क बनने लगते हैं. इस समय पैरेंट्स की भूमिका टीचर से ज्यादा गाइड या मेंटर की हो जाती है. टीनएज और यंग एडल्ट उम्र में बच्चे अपने फैसले खुद लेना शुरू करते हैं. पैरेंट्स को चाहिए कि वे उनकी बात सुनें, सलाह दें और मुश्किलों से निपटने में मदद करें, लेकिन हर कदम पर कंट्रोल न करें.

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उन्हें थोड़ी आजादी देना और खुद को एक्सप्रेस करने का मौका देना जरूरी होता है. ऐसा करने से बच्चों में सेल्फ कंट्रोल, आत्मविश्वास और सही फैसले लेने की क्षमता विकसित होती है. साथ ही पैरेंट और बच्चे के बीच भरोसा भी मजबूत होता है.

क्यों जरूरी माना जाता है यह नियम

  • 7-7-7 नियम पैरेंट्स को यह समझने में मदद करता है कि किस उम्र में किस बात पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए.
  • हर स्टेज में क्वालिटी टाइम बिताने से पैरेंट और बच्चे का रिश्ता मजबूत होता है.
  • बच्चों का इमोशनल, सोशल और मेंटल ग्रोथ बेहतर तरीके से होता है.
  • साथ ही यह नियम पैरेंटिंग को कम स्ट्रेसफुल बनाता है, क्योंकि पैरेंट्स को साफ दिशा मिल जाती है.
  • यह धीरे धीरे बच्चों को इंडिपेंडेंट बनने की तैयारी भी कराता है, बिना उन्हें अकेला छोड़े.

कुल मिलाकर, 7-7-7 नियम आसान और प्रैक्टिकल माना जाता है. यह याद दिलाता है कि जैसे जैसे बच्चा बदलता है, वैसे वैसे पैरेंटिंग का तरीका भी बदलना चाहिए. कोई भी पैरेंट परफेक्ट नहीं होता, लेकिन सही दिशा में उठाया गया हर छोटा कदम बच्चे को आगे चलकर बेहतर इंसान बनने में मदद करता है.

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