इस हिल स्टेशन पर घूमना तो दूर भारतीयों के लिए पैदल चलना भी था गुनाह लेकिन अब आते हैं लाखों पर्यटक

Hill stations interesting facts : एक वक्त ऐसा भी था मसूरी में घूमना तो दूर की बात है आस-पास भटकने की भी मनाही थी भारतीय नागरिकों के लिए.

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इस हिल स्टेशन पर घूमना तो दूर भारतीयों के लिए पैदल चलना भी था गुनाह लेकिन अब आते हैं लाखों पर्यटक
अंग्रेजी शासन के समय इस हिल स्टेशन के मॉल रोड पर बड़े-बड़े शब्दों में लिखा हुआ था- Indians and dogs Not Allowed.

Uttarakhand hill stations : 'पहाड़ों की रानी' के नाम से मशहूर 'मसूरी' उत्तराखंड का सबसे ज्यादा घूमा जाने वाला हिल स्टेशन है. गर्मी हो चाहे ठंडी लाखों की संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं, यहां की खूबसूरत वादियों का आनंद उठाने के लिए. लेकिन एक वक्त ऐसा भी था यहां घूमना तो दूर की बात है आस-पास भटकने की भी मनाही थी भारतीय नागरिकों के लिए. आखिर ऐसा क्यों था, इसी से जुड़े कुछ दिलचस्प किस्से आज इस आर्टिकल में हम आपको बताने वाले हैं, जो आपको जानकर बहुत हैरानी होगी.

मसूरी से जुड़े दिलचस्प किस्से

1- असल में इस जगह को अंग्रेजों ने ही बसाया था. इतिहासकारों के मुताबिक 1823 में ब्रिटिश अफसर एफजे शोर इस जगह पर पर्वातारोहण करते समय पहुंचे थे. तब वह मसूरी के नजारे देखकर दंग रह गए. फिर उन्होंने यहीं पर शिकार करने के लिए एक मचान बना लिया. वो यहां घूमने के लिए अक्सर आया करते थे. कुछ समय बाद यहां पर अंग्रेजों ने भवन बनवाया, 1828 में लंढौर बाजार बना और 1829 में यहां पहली दुकान खुली और 1926-31 तक मसूरी तक पक्की सड़क भी पहुंच गई. तो इस तरीके से मंसूरी का विकास होना शुरू हुआ. 

2- अंग्रेजी शासन के समय इस हिल स्टेशन के मॉल रोड पर बड़े-बड़े शब्दों में लिखा हुआ था- Indians and dogs Not Allowed. इसका विरोध सबसे पहले पंडित मोतीलाल नेहरू ने किया था. उन्होंने यह नियम तोड़ा और घूमने के लिए गए. मंसूरी का नाम यहां की एक झाड़ी पर पड़ा है. ये झाड़ी यहां पर सबसे ज्यादा मात्रा में उगती है. हालांकि, अधिकतर लोग इस जगह को मसूर नाम से भी पुकारते हैं.

3- मसूरी अगर आप घूमने जा रहे हैं तो फिर लाल टिब्बे जरूर घूमें. यह टिब्बा 2290 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. यहां से आप मसूरी की वादियों का भरपूर आनंद उठा सकते हैं. यहां से हिमालय की रेंज को भी देख सकते हैं. 

4- मंसूरी से जुड़ा एक और किस्सा है. यहां पर गन हिल थी. यहां पर ऊंची चोटी पर एक बंदूक हुआ करती थी. इस बंदूक से रोज दोपहर 12 बजे फायरिंग हुआ करती थी जिससे लोग अपनी घड़ी का समय मिलान करते थे. हालांकि बाद में उस बंदूक को हटा दिया गया.  

अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.

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