नर्म बनें या सख्त रहें? बच्चों की परवरिश में माता-पिता हमेशा क्यों उलझन में रहते हैं? जानें कैसी होनी चाहिए पेरेंटिंग

Parenting Styles: सोशल मीडिया, स्कूल का दबाव, कंपटीशन और कंपैरिजन ने माता-पिता को हर वक्त सेल्फ डाउट में डाल दिया है. कोई कहता है नर्म पेरेंटिंग सही है, तो कोई सलाह देता है डिसिप्लिन के बिना बच्चा नहीं सुधरता.

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ज्यादातर माता-पिता इसी उलझन में रहते हैं कि वे बच्चों के साथ सख्त रहें या प्यार से पेश आएं.

Parenting Tips: आज के समय में माता-पिता बनना पहले जितना आसान नहीं रहा. एक तरफ पुरानी पीढ़ी की सीख है ज्यादा लाड-प्यार बच्चे को बिगाड़ देता है, तो दूसरी तरफ नई सोच कहती है बच्चों को समझो, डांटो मत. ऐसे में ज्यादातर माता-पिता इसी उलझन में रहते हैं कि वे बच्चों के साथ सख्त रहें या प्यार से पेश आएं. हर फैसले के साथ डर जुड़ा होता है कहीं ज्यादा आजादी देकर बच्चे बिगड़ न जाएं, और कहीं ज्यादा सख्ती से बच्चे अंदर से टूट न जाएं. असल में यह दुविधा इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि आज की पेरेंटिंग सिर्फ घर तक सीमित नहीं है. सोशल मीडिया, स्कूल का दबाव, कंपटीशन और कंपैरिजन ने माता-पिता को हर वक्त सेल्फ डाउट में डाल दिया है. कोई कहता है नर्म पेरेंटिंग सही है, तो कोई सलाह देता है डिसिप्लिन के बिना बच्चा नहीं सुधरता.

लाड-प्यार से या सख्त कैसी होनी पेरेंटिंग? | Should Parenting Be Indulgent or Strict?

1. बदलते समय के साथ बदलती सोच

पहले के समय में सख्त पेरेंटिंग को सही माना जाता था. बच्चे सवाल नहीं करते थे, बस बात मानते थे. आज बच्चे सवाल करते हैं, अपनी राय रखते हैं और अपनी भावनाएं जाहिर करते हैं. माता-पिता इसी बदलाव को समझने में उलझ जाते हैं क्या बच्चों को रोकना जरूरी है या समझाना?

2. बिगड़ न जाए का डर

कई माता-पिता को लगता है कि ज्यादा प्यार देने से बच्चा जिद्दी, जिद्दी या आलसी हो जाएगा. इसलिए वे चाहकर भी खुलकर प्यार नहीं दिखा पाते. हर हां कहने के बाद गिल्ट और हर ना के बाद डर पैदा हो जाता है.

3. सख्ती और अनुशासन के बीच की रेखा

सख्त होना और अनुशासन सिखाना एक जैसी चीज नहीं है, लेकिन अक्सर माता-पिता इन्हें मिला देते हैं. गुस्से में डांटना या सजा देना आसान लगता है, लेकिन शांति से समझाना मुश्किल. इसी वजह से पेरेंट्स कंफ्यूज रहते हैं कि सही तरीका क्या है.

4. कंपैरिजन पेरेंटिंग का दबाव

फलां का बच्चा इतना आज्ञाकारी है, देखो वो कितने नंबर लाता है, ऐसी बातें माता-पिता के मन में असुरक्षा पैदा करती हैं. वे अपने बच्चे को दूसरों से तुलना करने लगते हैं और फिर पेरेंटिंग स्टाइल बदलते रहते हैं कभी बहुत नरमी, कभी बहुत सख्ती.

5. खुद के बचपन का असर

अक्सर माता-पिता अपने बचपन के अनुभवों के आधार पर फैसले लेते हैं. जिनको ज्यादा सख्ती मिली, वे या तो वही दोहराते हैं या बिल्कुल उल्टा करते हैं. यह असमंजस भी पेरेंटिंग को उलझा देता है.

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लाड-प्यार और सख्ती के बीच सही संतुलन ही अच्छी पेरेंटिंग है. बच्चों को प्यार, सुरक्षा और समझ की जरूरत होती है, लेकिन साथ ही सीमाएं भी जरूरी हैं.

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