Delhi Me Akele Rehne Wali Ladki Ki Diary: बचपन वाली होली, जो आज भी रंगों से ज्यादा यादों में बसी है

Bachpan Ki Holi Wali Diary: यही थी मेरी असली होली. अब न तो हैंडपंप है, न वो 12 घरों वाली कॉलोनी, न बिना कुछ सोचे रंग लगाने की आजादी. अब लोग पहले पूछते हैं, रंग ऑर्गेनिक है न? स्किन पर रिएक्शन तो नहीं होगा? लेकिन सच कहूं, तब रंग सिर्फ चेहरे पर लगते थे… लेकिन आज यादें दिल पर लगी रहती हैं.

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Bachpan Wali Holi Diary: होली अब बस एक छुट्टी का दिन बनकर रह गई है.

होली आने वाली है… लेकिन न जाने क्यों अब वैसा उत्साह दिल में महसूस नहीं होता. कैलेंडर पर तारीख देखकर तो मोबाइल में नोटिफिकेशन देखकर याद आ जाता है कि हां, होली है… पर वो गुदगुदी, वो बेचैनी, वो एक्साइटमेंट, हर तरह के रंग होना और घंटों प्लान बनाने वाली खुशी अब कहीं खो सी गई है. कभी-कभी लगता है कि होली अब बस एक छुट्टी का दिन बनकर रह गई है. एक ऐसा दिन जिसमें लोग एक-दूसरे से मिले बिना फोन पर ही होली की शुभकामनाएं दे देते हैं...और बस दूसरे ही दिन ये त्यौहार खत्म हो जाता है. जिसका इतंजार एक समय से पूरे साल किया जाता था. 

लेकिन जैसे ही आंखें बंद करती हूं, बचपन वाली होली खुद ब खुद सामने आ कर खड़ी हो जाती है. गुजिया तलने की खुशबू, पापड़ सूखने की महक, थैलियों में भरे गुलाल और उनसे निकलता रंग...ये सब मिलकर एक अलग ही दुनिया में ले जाते हैं. 

आज पैसे हैं, जितना चाहें उतना गुलाल खरीद सकते हैं… लेकिन उन रंगों के साथ खेलने वाले लोग साथ नहीं हैं. शायद इसी वजह से अब रंग भी थोड़े फीके लगने लगे हैं.

इस बार भी होली पर घर नहीं जा रही. काम की वजह से सबको एक साथ छुट्टी मिलना संभव नहीं हो पाता...ऐसे में मन को खुदकर ये कहकर समझाया जाता है कि मै अपने पैरों पर खड़ी हूं, उसके कुछ फायदे हैं तो कभी कुछ कुर्बानियां भी देनी पड़ती हैं...लेकिन त्योहार उन कुरबानियों को एहसास कुछ ज्यादा ही करा देता है.  होली आने वाली है तो सोचा, क्यों न अपनी डायरी में ही बचपन वाली होली की याद को साझा कर उस पल को फिर से जी लूं और आपको सुना भी दूं. शायद आप ही इसे पढ़ने के बाद अपने बचपन वाले होली के समय को याद कर मुस्कुरा पाएं और अपने किस्से औरों को सुना पाएं...

मुझे याद है, मैं पुलिस कॉलोनी में रहती थी. उस कालोवी में हमें मिलाकर कुल 12 परिवार रहते थे. होली की बात करें तो इसकी तैयारी सर्द दिन खत्म होने पर ही शुरू हो जाती थीं. घरों में सफाई से पहले के साथ पापड़ बनाने के लिए घर में सभी कमर कस चुके होते थे. आज बड़ी-बड़ी बिल्डिंग्स में हजारों लोग एक साथ रहते हैं लेकिन मुझे लगता है जो मैने अपनापन उस 12 घर वाली कॉलोनी में महसूस किया है वो इन हजारों फ्लैटों में रहने वालों के बीच भी कभी इसका एहसास नहीं हुआ. वहां रहने का एक फायदा था कि ज्यादा काम नहीं करना पड़ता था. एक दिन हमारे घर पापड़ बनते थे, तो सारे पड़ोस की आंटियां और बच्चे मिलकर मदद करते. अगले दिन किसी और के घर पर काम भी हो जाता था तो मेरे घर से मम्मी, चाची और मैं चली जाती थी. जिसमें हंसी-मजाक के बीच कब काम पूरा हो जाता था पता भी नहीं चलता था.

होली है तो गुजिया को कैसे भुला सकते हैं भला...गुझिया बनाने का प्रोगॉम होलिका दहन वाले दिन ही रखा जाता था. दादी उबटन बनाती थीं और सबको लगाती थीं. हंसते हुए कहती थीं, 'इससे सारी बीमारियां जल जाएंगी' हम भी उनकी इस बार पर विश्वास करते थे और बिना मुंह बनाए अपने हाथों और पैरों की जबरदस्त मसाज कराने के लिए बैठ जाते थे...क्योंकि मन में कहीं ना कहीं एक डर था कि अगर नहीं किया तो बीमार हो जाएंगे. इस शरीर से निकले इस उबटन को होलिका दहन में डालते थे और मानते थे कि सारी बीमारियां अब आग में जलकर खत्म हो गई हैं.

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शाम होते ही घड़ी पर एक नजर रहती थी कि कब पूजा के लिए जाने का समय होगा. अंदर कमरें में एक नजर घड़ी पर तो दूसरी बॉलकनी में की कही होलिका दहन हो ना जाए. इसी तरह से शाम कटती थी. मुझे आज भी याद है कि कॉलोनी के सभी लोग एक साथ पूजा के लिए जाते थे. मैं दादाजी का हाथ पकड़कर परिक्रमा करती थी. फिर घर आकर मम्मी के साथ गुजिया बनाना…देर रात तक ये तैयारियां चलती रहती थी, कब 2-3 बज जाते थे इसका तो पता ही नहीं लगता था और हां थकान तो महसूस तक नहीं होती थी.

सुबह का नजारा तो और भी खास होता था. सुबह उठते ही मम्मी से जाकर पुराने कपड़ों को मांगकर पहनना और पूरे शरीर और बालों पर सरसों के तेल की मसाज करना. मम्मी के लाख कहने पर भी बिना कुछ खाए-पिए रंग खेलने के लिए भाग जाना.

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फिर शुरू होता था हमारा “मिशन पानी का ड्रम”

ग्राउंड फ्लोर से तीसरी मंजिल की छत तक पानी पहुंचाना…वो भी हैंडपंप से! इस मिशन के लिए पूरी तैयारी होती थी. हैंडपंप पर दो लोग होते थे, जिसमें एक पंप चलाता था तो दूसरा आराम कर लेता था. वहीं ग्राउंड फ्लोर से लेकर छत तक कुछ दूरी पर लोग तैनात रहते थे पानी से भरी बाल्टी को उठाने के लिए.  जब ड्रम भर जाता था, तो लगता था जैसे कोई बड़ी जीत हासिल कर ली हो... आखिर इतनी ऊपर पानी पहुंचाना कोई आसान काम तो है नहीं...

और फिर शुरू होती थी असली होली. तब हमको ज्यादा रंग लगे इस बात का कॉम्पटिशन रहता था. इसलिए खुद के चेहरे पर पहले से ही लाल और हरा रंग लगा लेते थे. मुझे याद है उस समय कोई बुरा नहीं मानता था हर कोई एक-दूसरे को जमकर रंग लगाता था. सबको एक-दूसरे को रंगना ही मकसद होता था. जिन लोगों के बाल लंबे थे उनके बालों में सूखा रंग भरा जाता था जिसको धोने और बालों से निकालने में बहुत मेहनत करनी पड़ती थी.

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कुछ देर बाद मम्मी और आंटियां भी अपने घरों के काम निपटाकर होली खेलने के लिए तैयार हो जाती थीं.  फिर हम सभी 12 घरों में एक-एक करके जाते थे. कोई आंटी पापड़ अच्छे बनाती थी, तो कोई गुझिया. जिन आंटी के यहां शिकंजी और कोल्ड ड्रिंक मिल जाती थी वो सबकी फेवरेट होती थीं.  हर घर में एक अपनापन, प्यार, हंसी, ठिठोली और मजाक भरा होता था और इसके साथ नाच भी खूब होता था.

दोपहर 2-3 बजे तक सब अपने-अपने घर लौट आते. फिर शुरू होता था 'सफाई का मुकाबला' - कौन कितना साफ हो पाया! एक-दो घंटे तक रंग छुड़ाना, बाल धोना…और फिर बालकनी में खड़े होकर दोस्तों से कहना - 'देखो, तुम्हारे चेहरे पर अभी भी रंग है, मेरा तुमसे ज्यादा साफ है गया!' उसके बाद खाना…और फिर ऐसी नींद आती थी कि शाम से पहले आंख ही नहीं खुलती थी.

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यही थी मेरी असली होली. अब न तो हैंडपंप है, न वो 12 घरों वाली कॉलोनी, न बिना कुछ सोचे रंग लगाने की आजादी. अब लोग पहले पूछते हैं, रंग ऑर्गेनिक है न? स्किन पर रिएक्शन तो नहीं होगा? लेकिन सच कहूं, तब रंग सिर्फ चेहरे पर लगते थे… लेकिन आज यादें दिल पर लगी रहती हैं. 

इस बार भी होली पर घर नहीं जा रही. लेकिन जब भी अपने दोस्तों को ये कहानी सुनाती हूं, तो लगता है जैसे एक पल के लिए मैं फिर वही छोटी सी लड़की बन गई हूं…सरसों का तेल लगाकर भागती हुई, पानी भरती हुई और दोस्तों को रंग लगाने की प्लैनिंग करती हुई. बिना फ्रिक के खूब खाते हुए इस दिन को ऐसे जीना की पता हो कि अब ये मौका एक साल बाद ही आएगा.

शायद अब होली पहले जितनी रंगीन नहीं रही है... लेकिन मेरी डायरी में, मेरी बचपन वाली होली आज भी उतनी ही रंगों से सजीं हुई और जीवंत है.

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