- भारतीय कॉमिक्स का स्वर्ण युग 80 और 90 के दशक में था जब नागराज, चाचा चौधरी जैसे देसी सुपरहीरो लोकप्रिय थे
- चंदामामा और चंपक जैसी बाल पत्रिकाओं ने लोककथाओं और संस्कारों के माध्यम से बच्चों को महत्वपूर्ण सीख दी थी
- 2000 के बाद वितरण नेटवर्क टूटने और डिजिटल मीडिया के आने से भारतीय कॉमिक्स इंडस्ट्री का पतन शुरू हुआ
Indian comics industry downfall: 80 और 90 के दशक में बड़े हो रहे बच्चों के लिए सुपरहीरो का मतलब मार्वल के 'एवेंजर्स' या डीसी का 'सुपरमैन' नहीं था. इस पीढ़ी के सुपरहीरो तो देसी थे—नागराज, सुपर कमांडो ध्रुव, डोगा, चाचा चौधरी और साबू. वह एक ऐसा दौर था जब बच्चे पूरे यकीन के साथ इस बात को सच मानते थे कि "चाचा चौधरी का दिमाग कंप्यूटर से भी तेज़ चलता है" और "जब जुपिटर ग्रह से आए साबू को गुस्सा आता है, तो कहीं न कहीं ज्वालामुखी फटता है." उस दौर के बचपन में यह कोई काल्पनिक लाइनें नहीं, बल्कि परम सत्य थीं. गर्मी की लंबी छुट्टियों का मतलब होता था दोपहर की कड़कती धूप में कूलर के सामने लेटकर कॉमिक्स के पन्नों में खो जाना, जहां 'चंदामामा' और 'चंपक' जैसी पत्रिकाओं से संस्कार और जानकारी का डबल डोज भी साथ मिलता था. तब दोस्तों के बीच सबसे बड़ी रईसी इस बात से तय होती थी कि किसके पास कॉमिक्स का कितना बड़ा कलेक्शन है और सबसे बड़ा बिज़नेस था एक के बदले दूसरी कॉमिक्स एक्सचेंज करना. आइए, समय के पहिए को थोड़ा पीछे घुमाते हैं और उस जादुई दुनिया के उतार-चढ़ाव की कड़वी मगर सच्ची कहानी टटोलते हैं.
लोककथाओं और संस्कारों का पहला पाठ: 'चंदामामा' और 'चंपक'
बात को शुरू से शुरू करते हैं....इस सफर की शुरुआत कॉमिक्स क्रांति से पहले 'चंदामामा' और 'चंपक' जैसी बाल पत्रिकाओं से हो चुकी थी. जुलाई 1947 में तेलुगु और तमिल से शुरू हुई 'चंदामामा' को प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक बी. नागी रेड्डी और चक्रपाणि ने स्थापित किया था, जो बाद में हिंदी सहित 13 भाषाओं में छपने लगी. इसके कवर पेज पर मशहूर चित्रकार शंकर और वप्पा के बनाए स्केच और तलवार लटकाए शव को पीठ पर ले जाते राजा विक्रम-बेताल की कहानियां हर अंक की यूएसपी (USP) थीं, जो ऐतिहासिक तथ्यों और पंचतंत्र की लोककथाओं के जरिए बच्चों को संस्कार देती थीं.
ठीक इसी के समानांतर, साल 1968 में दिल्ली प्रेस द्वारा शुरू की गई 'चंपक' ने पाक्षिक (Fortnightly) मैगजीन के तौर पर बच्चों के दिलों पर राज किया. 'चंपक' ने इंसानी दुनिया के जटिल पाठ पढ़ाने के लिए चीकू बंदर, शेर सिंह और डैम्पी हाथी जैसे फिक्स कैरेक्टर्स का एक पूरा 'चंपक वन' तैयार किया था. दिल्ली प्रेस के आंकड़ों के मुताबिक, अंग्रेजी समेत 8 भाषाओं में पब्लिश होने वाली चंपक भारत में सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली बाल पत्रिका बनी, जिसने अपनी आसान और घरेलू भाषा के कारण प्राइमरी स्कूल के बच्चों को व्यावहारिक सामाजिक जीवन की सीख दी.
ये भी पढ़ें: डालडा कभी भारतीय किचन का था किंग ! 90% बाजार पर था कब्जा, जानिए कैसे अर्श से पहुंचा फर्श पर ?
जब भारतीय कॉमिक्स ने रचा अपना 'गोल्डन एरा'
नब्बे का दशक आते-आते भारतीय कॉमिक्स का वो स्वर्ण युग शुरू हुआ, जिसने हर गली-मोहल्ले को अपनी गिरफ्त में ले लिया. इस सुनहरे दौर के दो सबसे मजबूत स्तंभ थे—डायमंड कॉमिक्स और राज कॉमिक्स.
उस दौर में क्रेज ऐसा था कि राज कॉमिक्स के केवल एक सुपरहीरो (नागराज या ध्रुव) के नए अंक की पहली ही खेप में 5 लाख से अधिक कॉपियां बिक जाती थीं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, 90 के दशक के मध्य तक भारतीय कॉमिक्स इंडस्ट्री का सालाना टर्नओवर 100 करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच चुका था. कॉमिक्स की नई कॉपी बुक स्टॉल पर आते ही लूट मच जाती थी. 'मनोज कॉमिक्स' के सांपों के राजा 'तौसी' व 'क्रुकबांड' और 'तुलसी कॉमिक्स' के 'अंगारा' ने भी इस जादुई दुनिया को बड़ा बिज़नेस बनाया. व्यावसायिक सफलता के बीच साबू का सादा जीवन, चाचा जी की लाल वास्कट और नागराज की इच्छाधारी शक्तियां बच्चों के लिए सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि परम सत्य थीं.
ये भी पढ़ें: बजाज चेतक का सफरनामा:कभी 70 देशों में निर्यात होने वाला स्कूटर कैसे घरेलू बाजार में पिछड़ गया
वक्त बदला, आदतें बदलीं और बिखर गया साम्राज्य
लेकिन फिर 2000 के दशक की शुरुआत में वक्त ने करवट ली और पन्नों की वो चमक धुंधली होने लगी. इस पतन की शुरुआत डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क के टूटने से हुई. देशभर के रेलवे स्टेशनों पर मौजूद ए.एच. व्हीलर (A.H. Wheeler) के 300 से अधिक बुक स्टॉल्स, जो इन कॉमिक्स की बिक्री का 40 फीसदी जरिया थे, उन्होंने अपनी शेल्फ से कॉमिक्स को हटाना शुरू कर दिया. इसी के साथ हर गली-मोहल्ले में सक्रिय 'कॉमिक्स सर्कुलेटिंग लाइब्रेरी' का वो नेटवर्क भी पूरी तरह बंद हो गया, जहां 1 या 2 रुपये रोज के किराए पर कॉमिक्स मिलती थी.
साल 2005 के बाद देश में इंटरनेट और स्मार्टफोन की एंट्री ने बच्चों के हाथों से किताबें छीनकर स्क्रीन थमा दी. अब कल्पना करने की मेहनत नहीं करनी थी, रेडीमेड विजुअल्स सामने थे. भारतीय प्रकाशक जब तक डिजिटल बदलाव को समझते, तब तक जापानी 'मैंगा' (Manga) और मार्वल-डीसी जैसी पश्चिमी कॉमिक्स के डिजिटल अवतारों ने भारतीय बाजार के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया.
रही-सही कसर अंदरूनी पारिवारिक विवादों ने पूरी कर दी. राज कॉमिक्स के संस्थापकों (गुप्ता बंधुओं) के बीच साल 2020 में हुए औपचारिक पारिवारिक बंटवारे ने इस विशाल साम्राज्य को तीन अलग-अलग धड़ों (राज कॉमिक्स बाय संजय गुप्ता, राज कॉमिक्स बाय मनोज गुप्ता और मनीष गुप्ता) में बिखेर दिया, जिससे नए प्रोजेक्ट्स और किरदारों की साख दोनों को गहरा नुकसान पहुंचा. वहीं दूसरी ओर, मालिकाना हक के कानूनी विवादों के चलते साल 2013 के आते-आते 'चंदामामा' की जादुई दुनिया पर भी हमेशा के लिए ताला लग गया.
नए अंदाज़ में ज़िंदा हैं हमारे पुराने हीरो
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हमारे बचपन के ये हीरो पूरी तरह खत्म हो चुके हैं? ऐसा सोचना भी गलत होगा. सच तो यह है कि वे मरे नहीं हैं, बस उन्होंने वक्त के साथ अपना चोला बदल लिया है. आज 'चंपक' ने खुद को डिजिटल युग के सांचे में ढालकर मोबाइल ऐप्स, ई-मैगजीन और चुनिंदा प्रिंट के जरिए नई पीढ़ी के बीच अपनी मौजूदगी बनाए रखी है. वहीं डायमंड कॉमिक्स ने भी 'चाचा चौधरी और साबू' की आइकॉनिक जोड़ी को एनिमेटेड सीरीज के रूप में ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म्स पर उतार दिया है, जिन्हें आज के बच्चे स्क्रीन पर कार्टून के रूप में देख रहे हैं.
रही बात नागराज, ध्रुव और डोगा की, तो राज कॉमिक्स के अलग-अलग धड़े अब इनके शानदार 'ग्राफिक नोवेल्स' (Graphic Novels) और री-प्रिंटेड 'कलेक्टर्स एडिशन' बाजार में ला रहे हैं. हालांकि, अब ये कॉमिक्स हमारे दौर की तरह 10 या 20 रुपये की नहीं रहीं, बल्कि इनकी कीमतें अब सैकड़ों रुपये में हैं. यही वजह है कि आज इन्हें कोई बच्चा अपनी पॉकेट मनी से नहीं खरीद रहा, बल्कि वे कामकाजी वयस्क (Adults) खरीद रहे हैं जो कभी 90 के दशक में बच्चे थे. वे आज की भागदौड़ भरी जिंदगी से चंद लम्हे चुराकर अपने उस सुनहरे बचपन को दोबारा जीना और सहेजना चाहते हैं. सच कहें तो चाचा चौधरी और नागराज आज भी हमारे भीतर सांस ले रहे हैं, बस फर्क इतना है कि वे अब हमारी अलमारियों से निकलकर यादों के एक खूबसूरत 'कल्ट' (Cult) में तब्दील हो चुके हैं.
ये भी पढ़ें: 'मेलोडी' वाले पारले की कहानी जान लीजिए 'G': कैसे बना दुनिया का सबसे बड़ा बिस्किट साम्राज्य ?