भूटान में शुरू होने वाला है सबसे बड़ा उत्सव, जानिए क्यों खास है पारो त्शेचू फेस्टिवल

Paro Tshechu Festival: देश में कई खास उत्सव भी मनाए जाते हैं, जो अलग-अलग समुदायों को एक साथ लाकर उन्हें अपनी विरासत का सम्मान करने का मौका देते हैं. आज हम आपको भूटान के सबसे बड़े और मशहूर फेस्टिवल के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसका नाम है पारो फेस्टिवल.

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जानिए क्यों खास है भूटान का पारो त्शेचू फेस्टिवल.

Paro Tshechu Festival: हिमालय की गोद में बसा दक्षिण एशियाई देश भूटान अपनी प्राकृतिक सुंदरता, अनोखी संस्कृति और परंपराओं के लिए जाना जाता है. दुनिया के बेहतरीन पर्यटन स्थलों में से एक के रूप में पहचाना जाने वाला यह देश, पृथ्वी पर सबसे खुशहाल जगहों में से भी एक है. भूटान में साल भर कोई न कोई त्योहार मनाए जाते हैं. देश में कई खास उत्सव भी मनाए जाते हैं, जो अलग-अलग समुदायों को एक साथ लाकर उन्हें अपनी विरासत का सम्मान करने का मौका देते हैं. आज हम आपको भूटान के सबसे बड़े और मशहूर फेस्टिवल के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसका नाम है पारो फेस्टिवल.

पारो त्शेचू उत्सव

पारो त्शेचू भूटान के सबसे प्रसिद्ध उत्सवों में से एक है. यह वसंत ऋतु में मनाया जाता है, आमतौर पर अप्रैल की शुरुआत में 5 दिनों के दौरान ये मनाया जाता है. इस साल ये फेस्टिवल 29 मार्च से 2 अप्रैल तक चलेगा. यह उत्सव स्थानीय लोगों की आस्था और विश्वास का प्रतीक है, जिसे 'त्शेचू' के रूप में मनाया जाता है.

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इस उत्सव के दौरान, भिक्षु और आम लोग मुखौटे पहनकर डांस करते हैं और बौद्ध मंत्रों का जाप करते हैं. अनुयायी और स्थानीय लोग पारंपरिक, रंग-बिरंगे परिधान पहनकर फेस्टिवल में शामिल होते हैं. ये जीवंत प्रस्तुतियां प्राचीन भूटानी लोककथाओं और ऐतिहासिक घटनाओं को दिखाती हैं, जिनमें बताया गया है कि कैसे गुरु पद्मसंभव ने भूटान के सम्राट को ठीक करने में मदद की और देश में तिब्बती बौद्ध धर्म की शुरुआत की.

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फेस्टिवल में क्या है सबसे खास?

इस फेस्टिवल का मुख्य आकर्षण विशाल 'थांगका' का अनावरण है. यह 350 साल पुरानी एक धार्मिक चित्रकला (स्क्रॉल पेंटिंग) है जिसे सभी लोगों के दर्शन के लिए खोला जाता है. भूटान के लोगों का मानना ​​है कि जो लोग इस पवित्र चित्रकला की एक झलक पा लेते हैं, उनके मन से बुरे विचार दूर हो जाते हैं. पारो त्शेचू उत्सव का ऐतिहासिक महत्व बहुत अधिक है और यह लंबे समय से भूटानी संस्कृति की एक खास परंपरा रहा है.

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