26 January Special: 26 जनवरी पर जानें उत्तराखंड की जमीन से लोकतंत्र की कहानी

26 January Special: उत्तराखंड के गांवों में लोकतंत्र किसी विधानसभा, सचिवालय या मतदान केंद्र में नहीं बल्कि जंगल की आग बुझाते हाथों में, पीरियड्स पर थाली परोसे जाने या न परोसे जाने के फैसले में और गलत इलाज से जूझते मरीज की बेचैनी में दिखाई देता है. यहां देखिए गणतंत्र दिवस पर उत्तराखंड की ये खास रिपोर्ट.

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गणतंत्र दिवस पर जानें उत्तराखंड में जी रहे लोगों की कहानी.

26 January Special: उत्तराखंड के गांवों में लोकतंत्र किसी विधानसभा, सचिवालय या मतदान केंद्र में नहीं बल्कि जंगल की आग बुझाते हाथों में, पीरियड्स पर थाली परोसे जाने या न परोसे जाने के फैसले में और गलत इलाज से जूझते मरीज की बेचैनी में दिखाई देता है. कहीं आस्था का सैलाब उमड़ता है तो कहीं बाजार यात्रा पर टिका दिखाई देता. यह रिपोर्ट उत्तराखंड के उन्हीं गांवों और कस्बों से है, जहां लोकतंत्र हर दिन वोट से नहीं, जिंदगी से परखा जाता है.

मंजियाली गांव : पानी, बसावट और खेती के संघर्ष

उत्तरकाशी जिले के रवाईं क्षेत्र की मुंगरसन्ती पट्टी में स्थित मंजियाली गांव जिला मुख्यालय से लगभग 100 किलोमीटर दूर है. गांव के प्रधान प्रकाश रावत बताते हैं कि वे मूल रूप से बिल्ला गांव के रहने वाले हैं, जहां पानी की भारी कमी थी. मौजूदा मंजियाली क्षेत्र में पहले गौशाला थी और लोग सर्दियों में यहां मवेशियों के साथ आते थे. धीरे-धीरे, लगभग एक पीढ़ी पहले, लोग यहीं स्थायी रूप से बस गए. गांव के पास यमुना और कमल नदी बराबर में बहती हैं, लेकिन इसके बावजूद गांव में आज तक कोई नौला नहीं है.

प्रशासन, आबादी और सामाजिक संरचना

मंजियाली गांव बड़कोट तहसील के अंतर्गत आता है, पोस्ट ऑफिस गांव से 2 किलोमीटर दूर है, एसबीआई नौगांव में है और बड़कोट तहसील 6 किलोमीटर दूर पड़ती है. गांव में जियो और एयरटेल नेटवर्क काम करता है. यहां 165 परिवार रहते हैं और कुल जनसंख्या लगभग तेरह सौ बताई जाती है. रावत, राणा, चौहान, कोहली, लाल, आर्य और कुमार समुदाय के लोग यहां रहते हैं. आबादी में लगभग 50 प्रतिशत सामान्य वर्ग और शेष ओबीसी व अन्य वर्ग हैं. दलित परिवार मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर हैं.

जंगल, जमीन और खेती की तस्वीर

गांव की वन पंचायत में आठ सदस्य हैं और रिज़र्व जंगल से लकड़ी मिलती है. बंजर भूमि ज्यादा है, फिर भी खेती होती है। यहां मटर, टमाटर, बीन्स, मंडुआ, गेहूं, झंगोरा, धान, आलू, प्याज, मक्का, चौलाई, राजमा, मसूर और तौर उगाए जाते हैं. गाय, भैंस, बकरी, खच्चर और घोड़े पाले जाते हैं और लगभग सभी परिवारों के पास अपनी जमीन है. इस क्षेत्र को रवाईं इसलिए कहा जाता है क्योंकि यहां लंबे समय तक हिमाचल के राजा शासन करते रहे.

सरकारी योजनाएं, शराब और महिला आंदोलन

गांव में 45 से 50 लोग सरकारी नौकरी में हैं. लोग ऑनलाइन बैंकिंग का इस्तेमाल करते हैं और किसान सम्मान निधि, मनरेगा, उज्ज्वला और प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं. इसके साथ ही गांव में शराब का चलन भी ज्यादा बताया जाता है. इसके खिलाफ महिलाओं का आंदोलन लंबे समय से चलता आ रहा है. ग्रामीण बताते हैं कि साल 2004–05 में महिलाओं ने शराब के खिलाफ बड़ा आंदोलन किया था, जिसकी याद आज भी गांव में बनी हुई है.

सूर्य मंदिर और खेती का मौजूदा संकट

मंजियाली गांव में सूर्य देव का एक मंदिर है, लेकिन इसका कोई लिखित इतिहास कहीं दर्ज नहीं है. ग्रामीण चाहते हैं कि इसका संरक्षण हो, ताकि पर्यटन के रूप में गांव को नया सहारा मिल सके. खेती की मौजूदा हालत रवींद्र कुमार की कहानी में दिखती है. उन्होंने बड़कोट के श्रीदेव सुमन कॉलेज से पढ़ाई की और एयरफोर्स में चयन भी हुआ था, लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण वे नहीं जा सके. अब वे खेती करते हैं, रविन्द्र ने बताया कि इस साल बारिश की कमी से टमाटर की पैदावार में लगभग 40–50 प्रतिशत गिरावट आई है. आधुनिक मशीनें मौजूद हैं, लेकिन खेतों तक रास्ते न होने के कारण आज भी कई जगह बैलों से खेती करनी पड़ती है.

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महरगांव : जब बेटी के पीरियड्स पर जशोदा ने पूरे परिवार को खिलाया

महरगांव की जशोदा ने अपनी बेटी के पहली बार पीरियड्स आने पर पूरे परिवार को भोजन कराया. गांव में जहां आज भी पीरियड्स के दौरान अलग रहने और रसोई से दूर रखने की परंपरा है, वहां जशोदा का यह कदम बदलाव की एक साफ़ तस्वीर पेश करता है. यही बदलाव, पानी, खेती, महिलाओं और सामाजिक संरचना के बीच महरगांव की असली कहानी कहता है.

जंगल से पानी, खेतों तक नालियां और सामूहिक जिम्मेदारी

महरगांव में पानी के प्राकृतिक स्रोत से खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए नालियां बनाई गई हैं. घरों तक पानी पहुंचाने के लिए स्रोत पर सीमेंट की टंकी बनाई गई है, जिससे पाइपलाइन के जरिए पानी सप्लाई होती है. गांव के ऊपर बांझ का जंगल है और यहीं से पानी का स्रोत आता है. जंगल में आग लगने पर गांव के दस–पंद्रह लोग झाड़ियों की मदद से आग बुझाने जाते हैं. इसे गांव वाले अपनी सामूहिक जिम्मेदारी मानते हैं.

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आबादी, शिक्षा और नए मौके

महरगांव में करीब 90 परिवार रहते हैं और आबादी लगभग 800 है. गांव में करीब दस प्रतिशत लोग सरकारी नौकरी में हैं. लड़कियां स्कूल जाती हैं और पढ़ाई में बराबरी देखी जाती है. गांव की युवती भारती पंवार ने बताया कि पढ़ाई के लिए डिग्री कॉलेज पुरोला और बड़कोट अहम केंद्र हैं. गांव की एक लड़की और एक लड़का वायरलेस में चयनित हुए हैं.

महावीर सिंह रवॉल्टा ने रवॉल्टी भाषा में लेखन के जरिए इस क्षेत्र में खास पहचान बनाई है और अपने उपन्यासों, कहानियों और कविताओं में पहाड़ का दर्द उठाया है.

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खेती, लाल चावल और बदलता श्रम-संस्कृति

भारती कहती हैं के गांव में आलू, मटर, मंडुआ, लाल चावल, गेहूं और सोयाबीन की खेती होती है. आलू और मटर हिमाचल के व्यापारी ले जाते हैं. लाल चावल के लिए यह इलाका मशहूर है, यह 120 रुपये किलो में बिकता है और बाहर 200 रुपये किलो से ज्यादा में बेचा जाता है. खेती में गोबर, चारे और पत्तियों से बनी खाद का ज्यादा इस्तेमाल होता है. नई बहुएं अब खेती का काम पहले से कम करती हैं और उन पर सास का पहले जैसा दबाव नहीं है. भारती के साथ बैठे उनके परिवार के सदस्य बताते हैं कि इस साल न बर्फ पड़ी और न पहले जैसी ठंड रही.

समूह, बैंकिंग और महिलाओं की भागीदारी

गांव के बारे में अधिक जानकारी देते हुए भारती ने बताया कि गांव में दस स्वयं सहायता समूह हैं. इन समूहों से महिलाओं को दो प्रतिशत ब्याज पर बैंक कर्ज मिलता है. महिलाओं ने सिलाई मशीन और आटा पीसने की मशीनें ली हैं. हर दस समूहों पर एक सक्रिय महिला होती है, जो फील्ड में जाकर लोगों को जोड़ती है. जनधन खातों से गांव को फायदा मिला है. महिलाओं के पास एंड्रॉयड फोन हैं और वे फेसबुक व व्हाट्सएप का इस्तेमाल करती हैं, हालांकि बैंकिंग और स्किल इंडिया जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म की जानकारी अब भी सीमित है.

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स्वास्थ्य, पीरियड्स और सामाजिक व्यवहार

स्वास्थ्य के लिए गांव पुरोला अस्पताल पर निर्भर है, जो करीब 9 किलोमीटर दूर है. भारती पंवार ने बताया कि हाथ में गुड़ाई के दौरान उनके हाथ में कट लग गया और इसके लिए उन्हें पुरोला इलाज कराना पड़ा. देहरादून नजदीक होने की वजह से डिलीवरी के दौरान महिलाओं की मौत के मामले कम बताए जाते हैं. गांव में पीरियड्स के दौरान चार दिन अलग रहने की परंपरा है, हालांकि टॉयलेट वही इस्तेमाल होता है. कुछ परिवारों में 21 दिन तक अलग बिस्तर और रसोई से दूरी भी देखी जाती है. महिलाओं ने मेंस्ट्रुअल कप के बारे में नहीं सुना है, जबकि लड़कियों ने सोशल मीडिया और टीवी से इसकी जानकारी पाई है. ऐसे माहौल में जशोदा का अपनी बेटी के पीरियड्स शुरू होने पर पूरे परिवार को खिलाना एक सामाजिक बदलाव का संकेत माना जा रहा है.

जातीय संरचना, परंपराएं और देवी का मेला

महरगांव में तीन–चार अनुसूचित जाति के परिवार हैं, जिनके अपने मकान और जमीन हैं. स्कूलों में भेदभाव की बात सामने नहीं आती. गांव में राणा, रावत, पंवार, भट्ट, बहुगुणा, नौटियाल, ठाकुर और ब्राह्मण रहते हैं. पहले यहां रावत रहते थे, बाद में अन्य जातियां भी बसीं. छानियों में रहने वाले लोगों को पहले ‘मर' कहा जाता था, जब सब यहीं बस गए तो गांव महरगांव कहलाया. यहां माता राजराजेश्वरी का मंदिर है, जिनके पुजारी उनियाल होते हैं. हर साल 5 सितंबर को देवी का मेला लगता है और देवी की डोली महरगांव, उदकोटी और बैंणा के हर घर में जाती है.

डाडा जलालपुर : गांव में दुकान, खेती और बदलती अर्थव्यवस्था

डाडा जलालपुर में खेती, दुकानों और फैक्ट्री के काम से आजीविका चल रही है, लेकिन उधार, पशुपालन और दूध उत्पादन में गिरावट चिंता है.

खेती में पॉपुलर के पेड़ों की ओर रुझान बढ़ा है, जबकि शिक्षा और आस्था गांव को जोड़े रखती हैं.

रुड़की से लगभग दस किलोमीटर दूर डाडा जलालपुर गांव में राजवीर सैनी की पुरानी दुकान है. राजवीर सैनी बताते हैं कि गांव की आबादी दो से चार हजार के बीच है. इनमें सौ के आसपास लोग सरकारी नौकरी में हैं, जबकि बाकी लोग फैक्ट्रियों में नौकरी, खेती और पशुपालन पर निर्भर हैं. गांव में करीब सत्तर दुकानें हैं, जिनमें राशन और खेती के सामान की चार दुकानें शामिल हैं. राजवीर सैनी की दुकान में पशुओं का चारा, ज्वार और बाजरा जैसे सामान मिलते हैं.

उधार, ऑनलाइन भुगतान और खेती के बदलते स्वरूप

राजवीर सैनी बताते हैं कि उधार गांव की बड़ी समस्या है. साल भर में उनकी दुकान पर पांच से छह लाख रुपये तक का उधार हो जाता है. गांव में गन्ना, गेहूं और धान की खेती होती है, लेकिन अब लोग पॉपुलर के पेड़ों की तरफ जा रहे हैं. उनके अनुसार पॉपुलर लगाने से एक एकड़ में करीब दस लाख रुपये की कमाई पांच साल में हो रही है. पॉपुलर के साथ अन्य फसल भी लग जाती है. गांव में ऑनलाइन पेमेंट बढ़ा है और इससे फायदा ही हुआ है. बैंक से निकालकर पैसे देने की बात कहने वाले लोग अब कम हैं.

पशुपालन में गिरावट और दूध की कमी

राजवीर सैनी बताते हैं कि पहले जहां लोगों के पास पांच–छह पशु होते थे, अब एक–दो ही पशु रह गए हैं. गांव में अब लोग डेयरी से दूध लेने लगे हैं. पुरुष फैक्ट्री में काम करते हैं और नई पीढ़ी की महिलाएं पशुपालन नहीं करना चाहती.

एक अन्य दुकानदार मुनेश कुमार सैनी बताते हैं कि गांव में अब सिर्फ एक ही डेयरी बची है. उनके अनुसार छह साल पहले गांव में दस–बारह क्विंटल दूध अतिरिक्त होता था, जो अब घटकर करीब दो–ढाई क्विंटल रह गया है.

बांझ पशु, इलाज और रोज़गार की प्राथमिकताएं

मुनेश कुमार सैनी ने बताया कि इन दिनों पशुओं का बांझ होना सबसे बड़ी समस्या बन गया है. लोग डॉक्टरों के पास जाते हैं, लेकिन उनका कहना है कि डॉक्टर भी इस समस्या को गंभीरता से नहीं लेते. शायद खेतों में प्रयोग हो रही केमिकल युक्त खाद इसका बड़ा कारण है.

उन्होंने आगे बताया कि गांव में लोग सरकारी नौकरी को बहुत गंभीरता से नहीं लेते और हिंदुस्तान लीवर जैसी कंपनियों में प्राइवेट नौकरियों की तरफ जा रहे हैं. गांव के दो–तीन युवा पीएचडी कर चुके हैं और कुछ बीटेक कर रहे हैं, यह गांव के अच्छे भविष्य की उम्मीद जगाता है.

शिक्षा, स्वास्थ्य और आस्था का केंद्र

डाडा जलालपुर में सरकारी स्कूल है. गंभीर बीमारी के लिए लोगों को देहरादून के अस्पतालों का रुख करना पड़ता है. गांव में चार प्राइवेट स्कूल हैं और तीन किलोमीटर दूर वैभलपुर में भी सरकारी स्कूल है. मुनेश का कहना है कि सरकारी स्कूल में अब अच्छी शिक्षा मिल रही है.

गांव के एक और युवा मुकेश सैनी बताते हैं कि डाडा जलालपुर में हर साल जुलाई महीने में जारवीर गोगा माड़ी का मेला लगता है. इस दौरान न सिर्फ गांव बल्कि आसपास के कई इलाकों से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. लोग गोगा माड़ी में पूजा करते हैं, निशान चढ़ाते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि के साथ सांप-बिच्छू के डर से सुरक्षा की कामना करते हैं. कुछ युवाओं की इस मेले में दुकान लगाने से अच्छी कमाई भी हो जाती है. मुकेश ने बताया कि गांव में कभी–कभी जाति और धार्मिक आधार पर तनाव की स्थिति बनी है, लेकिन अधिकांश समय यहां शांति बनी रहती है.

श्यामनगर गांव : खेती, सौहार्द और बदलते रोज़गार की जमीनी हकीकत

ऊधम सिंह नगर जिले का श्यामनगर गांव खेती, सामाजिक सौहार्द और बदलती ग्रामीण अर्थव्यवस्था की एक स्पष्ट तस्वीर पेश करता है. गांव के युवा अर्जुन सिंह कृष्णा बताते हैं कि उनके पिता किसान हैं. गांव में बड़े पैमाने पर पलायन नहीं है. युवा फैक्ट्रियों में काम कर रहे हैं, जबकि नई पीढ़ी का झुकाव खेती से कम होकर नौकरी की ओर बढ़ा है. कुछ घर आज भी पूरी तरह खेती पर निर्भर हैं.

ढांढी नदी, डैम और खेती पर असर

श्यामनगर से होकर बहने वाली ढांढी नदी तुमरिया डैम से आती है. इसी नदी से फायदा उठाते हुए गांव वालों द्वारा नाली बनाकर खेतों में पानी पहुंचाया गया है. गांव में अनुसूचित जाति के लगभग आठ सौ वोट हैं और उनके पास भूमि भी अधिक है.

अर्जुन सिंह कृष्णा बताते हैं कि बारिश के दौरान जब डैम से पानी बंद कर दिया जाता है, नदी में पानी की कमी हो जाती है और इसका असर खेती पर पड़ा है. अर्जुन सिंह के अनुसार पांच से दस साल पहले एक एकड़ में करीब तीस क्विंटल पैदावार होती थी, जो अब घटकर लगभग बीस क्विंटल रह गई है. गांव में मुख्य रूप से गन्ने की खेती की जाती है.

सामाजिक ताना–बाना, कम आबादी और ज्यादा भागीदारी

गांव में मुस्लिम आबादी कम है और उनके वोट लगभग सौ बताए जाते हैं. शादी–बारात में सभी समुदायों को निमंत्रण दिया जाता है. ईद के मौके पर सबको बुलाया जाता है और हिंदुओं के त्योहारों में मुस्लिम समुदाय शामिल होता है. गांव में माता देवी का मंदिर है, माता की झांकी और रामलीला जैसे आयोजनों में मुस्लिमों का योगदान भी रहता है. 

शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजमर्रा की चुनौतियां

श्यामनगर से तीन किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश स्थित ठाकुरद्वारा है, जहां कोचिंग सेंटर हैं. यहां से स्टेनो की पढ़ाई कर कई लोग सरकारी नौकरी में लगे हैं. गांव के आसपास फाइलों में इस्तेमाल होने वाला कागज़ बनाने वाली एक पेपर मिल भी है, जिससे कुछ स्थानीय लोगों को रोज़गार मिलता है.

दस किलोमीटर दूर जसपुर में इंटर कॉलेज हैं और बच्चे वहीं पढ़ने जाते हैं. वे गांव से पहले साइकिल से हाइवे तक और फिर बस से स्कूल पहुंचते हैं. इलाज के लिए लोगों को काशीपुर जाना पड़ता है. पानी की सुविधा के लिए लगभग हर घर में निजी नल लगे हैं और गांव में पानी की टंकी लगाने का काम चल रहा है. गांव में दुधारू पशु हैं और गायों की संख्या अधिक है.

सड़क, पुल, पंचायत और खेल : बदलाव की कहानी

अर्जुन कहते हैं कि गांव में सड़क, पुल और बारातघर के लिए दिवंगत कंचन सिंह का संघर्ष अहम रहा है. साल 2017 से पहले ठाकुरद्वारा जाने के लिए नदी पार करनी पड़ती थी. कंचन सिंह ने काफी भागदौड़ करने के बाद गांव में पुल बनवाया और इसके बाद आवागमन आसान हुआ. अब गांव का गन्ना उत्तर प्रदेश तक जाता है और उसके अच्छे दाम मिल जाते हैं, साथ ही पढ़ाई के लिए बाहर जाना भी सहज हो गया है. बावर खेड़ा ग्राम पंचायत से अलग होना भी कंचन सिंह के प्रयासों से जोड़ा जाता है. 

अर्जुन ने बताया कि गांव की कई लड़कियां भी सरकारी नौकरी में हैं और उन्हें बराबरी की नजर से देखा जाता है. गांव के एक युवा अरविंद कुमार राज्य स्तर पर वॉलीबॉल खेल चुके हैं और वह गांव के अन्य लड़कों को भी वॉलीबॉल का प्रशिक्षण देते हैं. गांव के करीब पंद्रह लड़के इस खेल में बढ़िया हैं और यहां वॉलीबॉल टूर्नामेंट भी हो चुका है.

स्वील गांव : नाम के पीछे की कथा, सुतक की परंपरा और देवता की यात्रा पर टिका सामाजिक जीवन

अस्कोट आराकोट यात्रा का एक पड़ाव स्वील गांव में पड़ता है. यात्रा के दौरान गांव में पहुंचते ही हमारी मुलाकात मनमोहन सिंह चौहान से होती है. बातचीत की शुरुआत में वह बताते हैं कि स्वील गांव कमल सेराई पट्टी में आता है. पट्टी की संरचना को समझाते हुए वह कहते हैं कि सरकारी और राजस्व रिकॉर्ड में लगभग बीस से पच्चीस गांवों के समूह को एक पट्टी कहा जाता है. यही व्यवस्था प्रशासनिक पहचान के साथ-साथ सामाजिक जीवन को भी जोड़ती है.

स्वील गांव का नाम अपने भीतर एक लोककथा और सामाजिक परंपरा समेटे हुए है. गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि जब इस क्षेत्र में बसावट शुरू हो रही थी, उस समय यहां एक महिला को प्रसव हुआ था. स्थानीय बोली में प्रसव के बाद की अवस्था को “सुतक” कहा जाता है. सुतक की अवस्था में महिला को कुछ समय के लिए अलग बैठाया जाता है और उसके हाथ का बना भोजन नहीं खाया जाता. इसी अवस्था में बैठी महिला को स्थानीय लोग “स्वीली” कहकर संबोधित करते थे. गांव के लोगों के अनुसार, इसी शब्द से धीरे-धीरे इस स्थान का नाम स्वील पड़ गया.

गांव के ही कवित चौहान साफ करते हैं कि सुतक को लेकर यहां किसी तरह का सामाजिक बहिष्कार नहीं होता. यह एक पारिवारिक परंपरा है. परिवार के लोग महिला की पूरी देखभाल करते हैं. केवल पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यों से उसे कुछ समय के लिए अलग रखा जाता है. यह परंपरा लगभग हर गांव में देखने को मिलती है और स्वील में भी उसी तरह निभाई जाती है. सुतक की अवधि आमतौर पर 21 दिन मानी जाती है.

पट्टी, थान और देवता की यात्रा

स्वील पहुंचने के दिन गांव में रुद्रेश्वर महादेव का मेला लगा हुआ है. मनमोहन सिंह बताते हैं कि यह मेला हर तीसरे साल जून–जुलाई के महीनों में लगता है. यह समय पूरे क्षेत्र के लिए खास होता है, क्योंकि इसी दौरान देवता की यात्रा शुरू होती है.

मनमोहन ने कहा कि इस वर्ष तिया बजलाड़ी थान से महाराज बाहर निकले हैं और पश्चिम के कंडाव, देवल, सारी थान के लगभग तीस गांवों का भ्रमण करते हैं. वह समझाते हैं कि यहां थान का अर्थ है लगभग चौदह गांवों का समूह, जो एक ही मंदिर और देवता की पूजा करता है.रुद्रेश्वर महाराज चार थानों के देवता हैं और हर वर्ष देवता का निवास अलग-अलग थान में होता है.

इन दो महीनों के दौरान महाराज जिस-जिस गांव में पहुंचते हैं, उस दिन वहां मेला लगता है. गांव से बाहर रह रहे लोग भी इसी अवसर पर अपने गांव लौटते हैं. पूजा-पाठ, मेलों और सामूहिक भोज के जरिए गांवों का सामाजिक जीवन फिर से जुड़ता है.

पालकी, चांदी का बॉक्स और पूजा की विधि

मनमोहन सिंह विस्तार से बताते हैं कि देवता की यात्रा की शुरुआत में पहली रात महाराज की पालकी में एक चांदी का गोलाकार बॉक्स रखा जाता है. यह बॉक्स पौराणिक काल से देवता के साथ जुड़ा माना जाता है. रात में पालकी मंदिर में ही रहती है और देवता के साथ रुद्रेश्वर महादेव कमेटी के लोग वहीं निवास करते हैं.

अगली सुबह लगभग आठ बजे देवता की मूर्ति को दर्शन के लिए चांदी के बॉक्स से बाहर निकालकर देवस्थान (पीड़ा) पर रखा जाता है. इस दौरान लगभग दो से ढाई हजार लोग दर्शन के लिए पहुंचते हैं.

दोपहर करीब तीन बजे देवता की मूर्ति को फिर से बॉक्स में रख दिया जाता है और पालकी को सजाया जाता है. इसके बाद मंदिर प्रांगण में पूजा होती है. गांव के लोग दो-दो कर पालकी को कंधे पर उठाते हैं. ढोल-नगाड़ों के साथ पालकी को नचाया जाता है. पूरा वातावरण भक्ति, संगीत और सामूहिक उल्लास से भर जाता है.

पूजा के बाद देवता को नाचते–गाते अगले गांव के लिए विदा किया जाता है. इसी के साथ एक गांव का मेला समाप्त होता है और अगला गांव देवता की प्रतीक्षा में सजने लगता है.

पानी, गराट और खेती पर टिका जीवन

स्वील गांव में पानी का मुख्य स्रोत सुरोध है. इसी पानी पर गांव की घरेलू जरूरतें, खेती और पारंपरिक जल संरचनाएं निर्भर रही हैं. कवित चौहन ने बताया कि एक समय गांव में सात गराट चलते थे. आज इनमें से केवल एक-दो ही सक्रिय रह गए हैं.

गराट में गेहूं और अन्य अनाज का आटा पीसा जाता है. यह पूरी तरह पारंपरिक व्यवस्था है. ग्रामीण बताते हैं कि वे पांच से दस किलो अनाज ही पिसवाते हैं, ताकि रोजमर्रा के उपयोग के लिए ताजा आटा मिल सके. गराट में पैसे नहीं लिए जाते. आटा पिसने के बाद जो थोड़ा-बहुत आटा बच जाता है, वही गराट चलाने वाले का हिस्सा होता है.

गांव में मटर और टमाटर जैसी सब्जियां भी होती हैं, लेकिन खेती पूरी तरह पानी पर निर्भर है. पानी के स्रोत पर असर पड़ते ही खेती भी प्रभावित हो जाती है. कवित ने बताया कि नीचे बहने वाली कमल नदी ने भी गांव की खेती को काफी नुकसान किया है और यह नदी अब गांव के अस्तित्व के लिए खतरा भी बन गई है, नदी ने अब तक चार पांच लोगों के खेतों में भूकटाव किया है.

बुठोत्रा गांव : खेती, परंपरा और डेमोग्राफिक बदलाव के बीच पहाड़ का यथार्थ

मोरी क्षेत्र से आगे नदी के दूसरी ओर स्थित बुठोत्रा गांव पूरी घाटी में बंगाण क्षेत्र का हिस्सा माना जाता है. गांव के लोग बताते हैं कि आसपास के गांवों में रीति रिवाज और सामाजिक जीवन लगभग एक जैसा है. बुठोत्रा की आबादी करीब डेढ़ सौ से दो सौ के बीच मानी जाती है और गांव के साथ जुड़ी कई थलियां भी हैं.

यहां थलियां गांव से अलग खेतों और जंगलों के पास बनी छोटी बस्तियों को कहा जाता है, जहां पहले लोग खेती और पशुपालन के लिए रहते थे. गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि बुठोत्रा की कुछ थलियां अब पूरी तरह खाली हो चुकी हैं. जिन जगहों पर कभी घर और खेत थे, वहां अब सूखे ढांचे और उजड़ी जमीन दिखती है. लोग धीरे धीरे नीचे की ओर या बाहर बसते चले गए.

खेती, लाल चावल और गुजारे की अर्थव्यवस्था

बुठोत्रा गांव में लाल चावल, धान, गेहूं और सेब की खेती होती है. खेती ही यहां आजीविका का मुख्य आधार है, लेकिन इससे केवल गुजारे भर की आमदनी हो पाती है. ग्रामीण बताते हैं कि साल भर का खर्च खेती से निकल पाना मुश्किल होता है. इसी वजह से कई परिवार मजदूरी, छोटे निजी काम या बाहर जाकर काम करने पर निर्भर हो गए हैं.

दिलीप कुमार की बातों में सामाजिक बदलाव

गांव में बातचीत के दौरान स्थानीय निवासी दिलीप कुमार बताते हैं कि पहले गांव में छुआछूत और सामाजिक भेदभाव ज्यादा था. समय के साथ इसमें काफी कमी आई है. युवाओं में यह लगभग खत्म हो चुका है, हालांकि बुजुर्ग पीढ़ी में इसके कुछ अवशेष अब भी दिखाई देते हैं.

दिलीप कुमार के अनुसार अब मंदिर, पूजा या देवी देवता के नाम पर खुले तौर पर भेदभाव नहीं होता. मान्यताएं आज भी हैं, लेकिन पहले जैसी सख्ती नहीं रही. गांव का सामाजिक जीवन अब भी सामूहिकता पर टिका है.

युवा, शिक्षा और बाहर जाने की मजबूरी

बुठोत्रा गांव में युवाओं की संख्या लगभग पैंतीस से चालीस के बीच बताई जाती है. इंटरमीडिएट के बाद लगभग सभी युवा पढ़ाई या काम के लिए बाहर चले जाते हैं. गांव में उच्च शिक्षा के साधन नहीं हैं, इसलिए बाहर जाना मजबूरी बन गया है.

कुछ युवा प्रतियोगी परीक्षाओं और पीए जैसी सेवाओं की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन गांव से अब तक बड़े पदों पर चयन बहुत कम हुआ है. लड़कियां भी अब पढ़ाई कर रही हैं और परिवार उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं.

महिलाएं, परंपरा और स्वास्थ्य की चुनौती

गांव में महिलाओं को लेकर पारंपरिक मान्यताएं अब भी मौजूद हैं. दिलीप कुमार बताते हैं कि माहवारी और गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को कुछ समय के लिए पूजा पाठ से अलग रखा जाता है. हालांकि अब इसमें पहले जैसी कठोरता नहीं रही.

स्वास्थ्य सुविधाएं बुठोत्रा गांव की बड़ी चिंता हैं. गंभीर बीमारी या गर्भावस्था में जटिलता होने पर महिलाओं को बाहर के अस्पतालों में ले जाना पड़ता है. दूरी, समय और संसाधनों की कमी कई बार जोखिम बढ़ा देती है.

खेल, टूर्नामेंट और गांव की एकजुटता

बुठोत्रा गांव में एक पुराना खेल टूर्नामेंट भी आयोजित होता है, जिसमें आसपास के कई गांव शामिल होते हैं. यह आयोजन एक कमेटी द्वारा किया जाता है और इसमें करीब एक लाख रुपये तक का पुरस्कार रखा जाता है. हिमाचल से भी टीमें आती हैं और कबड्डी जैसे पारंपरिक खेल खेले जाते हैं.

खेल मैदान पूरी तरह समतल नहीं हैं, लेकिन फिर भी खेल गतिविधियां गांव के सामाजिक जीवन को जोड़ने का काम करती हैं.

डेमोग्राफिक चेंज और बाहरी बसावट की चिंता

बुठोत्रा गांव में अब एक नई चिंता उभर रही है, जिसे ग्रामीण डेमोग्राफिक चेंज के रूप में देखते हैं. गांव के लोग बताते हैं कि आसपास के इलाकों में धीरे धीरे बाहरी लोग बसने लगे हैं. शुरुआत में एक दो परिवार आते हैं, फिर उनके रिश्तेदार भी आने लगते हैं और धीरे धीरे छोटी बस्तियां फैलने लगती हैं.

ग्रामीणों का कहना है कि कई जगहों पर सरकारी या वन भूमि पर अस्थायी डेरों के जरिए बसावट शुरू होती है. समय बीतने के साथ यही डेरें स्थायी घरों में बदल जाती हैं. प्रशासनिक ढील और अधिकारियों के तबादलों का फायदा उठाकर अतिक्रमण बढ़ता चला जाता है.

गांव के बुजुर्ग मानते हैं कि अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले वर्षों में यह बदलाव बुठोत्रा और आसपास के गांवों के सामाजिक संतुलन के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है.

जंगल, पानी और लोग : डख्याट से ठडुंग तक पहाड़ की ग्राउंड रिपोर्ट

उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में जंगल और पानी का रिश्ता सिर्फ पर्यावरण का नहीं, जीवन का सवाल है. उत्तरकाशी जिले के डख्याट गांव से लेकर बड़कोट क्षेत्र के ठडुंग तक लोगों के साथ हुई बातचीत यही बताती है कि जहां जंगल पर स्थानीय समुदाय का अधिकार और जिम्मेदारी है, वहां पानी, खेती और जीवन की निरंतरता बनी रहती है. इन गांवों में जंगल की रक्षा कानून से नहीं, समझ और जरूरत से होती है.

डख्याट : जंगल पर ग्रामीणों का अधिकार, पानी की सुरक्षा की बुनियाद

डख्याट गांव में खेती करने वाले खेमराज सिंह ज्याड़ा बताते हैं कि गांव के जंगल पर पूरा अधिकार ग्रामीणों का है. यहां ग्राम वन पंचायत व्यवस्था लागू है और वन पंचायत समिति का सरपंच पांच साल के लिए चुना जाता है. यह चुनाव प्रशासनिक अधिकारियों की देखरेख में होता है, जिससे पारदर्शिता बनी रहती है.

खेमराज बताते हैं कि पिछले एक दो साल की गर्मियों में जब बड़कोट और आसपास के इलाकों में पानी की भारी किल्लत रही, तब भी डख्याट के चार पानी के स्रोत सूखे नहीं. आसपास के गांवों के लोग भी यहां से पानी लेने आए. वह कहते हैं कि पिछली गर्मी में जहां पहाड़ के कई इलाकों में लोग रजाई छोड़ चुके थे, वहीं डख्याट में रात को रजाई ओढ़नी पड़ती है. इसका कारण घना और सुरक्षित जंगल है.

रात बारह बजे भी आग बुझाने निकलते हैं ग्रामीण

डख्याट में जंगल से लकड़ी काटना और चारा पत्ती लेना पूरी तरह प्रतिबंधित है. हर पांच साल में वन पंचायत समिति की निगरानी में सीमित काट छांट की जाती है. खेमराज कहते हैं कि अगर जंगल में रात के बारह बजे भी आग लगती है तो गांव के लोग उसे बुझाने निकल जाते हैं. उनके अनुसार जब जंगल सरकार के अधीन होता है तो लोग उसे अपना नहीं मानते, लेकिन जब जंगल गांव का होता है तो हर व्यक्ति उसकी रक्षा करता है.

डख्याट का अनुभव दिखाता है कि जंगल माइक्रोक्लाइमेट बनाता है. वह तापमान को नियंत्रित करता है, नमी बनाए रखता है और पानी के स्रोतों को जीवित रखता है.

ठडुंग : जंगल देता है पानी, गांव करता है सुरक्षा

बड़कोट क्षेत्र के ठडुंग गांव में भी जंगल और पानी का रिश्ता साफ दिखाई देता है. साल 2024 में हुई अस्कोट आराकोट यात्रा के दौरान गांव में मिले जगमोहन सिंह राणा बताते हैं कि ठडुंग लाल धान की खेती के लिए जाना जाता है और इसकी वजह गांव में उपलब्ध पानी का स्रोत है. गांव के ठीक ऊपर बांझ यानी ओक के पेड़ों का घना जंगल है, जिसकी ग्रामीण पूरी तरह सुरक्षा करते हैं.

जगमोहन के अनुसार गांव में सात–आठ लोगों की एक स्थायी टीम बनाई गई है, जो जंगल में आग लगने की स्थिति में वन विभाग के साथ मिलकर आग बुझाने का काम करती है. यह कोई अस्थायी व्यवस्था नहीं है, बल्कि नियमित निगरानी की एक प्रणाली है और सरकार व समुदाय के सहयोग का उदाहरण भी है.

बांझ का जंगल और खेती का सीधा रिश्ता

जगमोहन बताते हैं कि बांझ के जंगल और पानी के बीच सीधा संबंध है. बांझ के पेड़ों की जड़ें गहरी होती हैं और उनकी घनी छतरी मिट्टी और नमी को बनाए रखती है. यही जंगल पानी को धीरे धीरे छोड़ता है, जिससे नीचे खेती संभव हो पाती है.

ठडुंग में उगाया जाने वाला लाल धान पहाड़ की पारंपरिक फसल है, जिसके लिए अच्छी सिंचाई जरूरी होती है. गांव की खेती पूरी तरह ऊपर के जंगल से आने वाले पानी पर निर्भर है. जंगल कमजोर होगा तो पानी और खेती दोनों पर असर पड़ेगा.

शिक्षा, बच्चे और भविष्य के सपने

ठडुंग गांव में प्राथमिक स्कूल है, जबकि आगे की पढ़ाई के लिए बच्चों को पास के हुडोली जाना पड़ता है. गांव की रहने वाली आरुषि आठवीं कक्षा में पढ़ती है और हुडोली के इंटर कॉलेज में पढ़ाई कर रही है. वह बताती है कि स्कूल में सभी विषयों के शिक्षक हैं और करीब 300 बच्चे पढ़ते हैं. आसपास के चार गांवों से बच्चे यहां पढ़ने आते हैं.

आरुषि का सपना है कि वह बड़ी होकर पुलिस अफसर बने. उसके पिता किसान हैं और परिवार खेती पर निर्भर है. जमीन से खाने भर का अनाज हो जाता है, लेकिन बाजार में बेचने लायक उत्पादन नहीं हो पाता. परिवार में पांच भाई बहन हैं और सभी पढ़ाई कर रहे हैं.

खेती, आजीविका और पलायन

जगमोहन ने बताया कि ठडुंग में धान, दालें, राजमा और सब्जियां उगाई जाती हैं. खेती से बहुत अधिक कमाई नहीं होती, लेकिन गुजारा निकल जाता है. कुछ सरकारी योजनाओं का लाभ कभी कभार मिल जाता है, लेकिन गांव की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार खेती ही है.

गांव वालों के अनुसार ठडुंग की आबादी करीब 800 से 900 के बीच है और परिवारों की संख्या 150 से 200 के आसपास है. पढ़ाई के लिए बच्चे बाहर जाते हैं, लेकिन परिवार स्थायी रूप से गांव छोड़कर नहीं जाते. यही वजह है कि यहां बड़े पैमाने पर पलायन नहीं दिखता.

हनोल : जौनसार-बावर का प्रमुख तीर्थ, महासू देवता का धाम और जीवित लोकआस्था

हनोल मंदिर में हमारी मुलाकात मुकेश नेगी से हुई, जो यहीं रहते हैं और मंदिर से जुड़ी परंपराओं को जानते हैं. मुकेश नेगी बताते हैं कि हनोल मंदिर और महासू देवता का इतिहास उन्होंने भी अपने पुराने लोगों से सुना है और यही कथा पीढ़ियों से यहां सुनाई जाती रही है. लोकमान्यता के अनुसार महासू देवता चार हैं और वे कश्मीर से यहां आए थे. जौनसार-बावर क्षेत्र में महासू देवता को न्याय और संरक्षण के देवता के रूप में पूजा जाता है और हनोल उनका प्रमुख धाम माना जाता है. हनोल मंदिर पुरातत्व विभाग के अंतर्गत संरक्षित है.

किरमिर राक्षस, ब्राह्मण परिवार और महासू का आह्वान

मुकेश नेगी बताते हैं कि लोककथा के अनुसार पुराने समय में किरमिर नाम का एक राक्षस था, जो आज के महेंद्रथ की जगह स्थित गांव में आया था. उस गांव में हुना भाट नाम का एक ब्राह्मण रहता था, जिसके सात बेटे थे. गांव वालों ने राक्षस से कहा कि वे उसे हर हफ्ते खाने के लिए देंगे और बदले में वह एक ही जगह रहेगा. इसी दौरान राक्षस ने ब्राह्मण के छह बेटों को खा लिया. यह इलाका पब्बर नदी के किनारे बताया जाता है. एक दिन जब ब्राह्मण की पत्नी नदी के किनारे मिट्टी के बर्तन में पानी भर रही थी, तो पानी की आवाज सुनकर राक्षस ने नदी से बाहर हाथ निकालकर उसे खाने की कोशिश की. उसी समय उसके मुंह से अनायास ही “हे महासू” निकला.

महासू देवता का प्रकट होना और चार महाराजों की कथा

लोकमान्यता के अनुसार महासू देवता 64 देवियों और 52 वीरों के साथ चलते हैं. इनमें सबसे बड़े शडकुलिया महाराज ने ब्राह्मण की पत्नी की रक्षा की और कहा कि यदि राक्षस से बचना है तो महासू देवता को कश्मीर से यहां लाना होगा. घर लौटकर ब्राह्मण की पत्नी ने यह बात अपने पति को बताई और हुना भाट कश्मीर गए. वहां उन्होंने पानी के माध्यम से महाराज को बुलाकर सारी बात बताई. महाराज ने कहा कि तुम जाओ, हम आ जाएंगे. इसके बाद महाराज ने ब्राह्मण के गले में माला डाली और लोककथा के अनुसार वह ब्राह्मण तुरंत सैकड़ों किलोमीटर दूर हनोल पहुंच गया.

सोने-चांदी का हल, घायल देवता और चालदा महाराज

मुकेश नेगी बताते हैं कि महाराज ने कहा था कि सोने और चांदी का हल बनाया जाए और उनके लिए पकवान बनाए जाएं, तभी वे बाहर निकलेंगे. पकवान बनते समय राक्षस वहां आ गया और डर के कारण ब्राह्मण ने एक दिन पहले ही हल लगा दिया. सबसे पहले महेंद्रथ में बाशिक महाराज निकले, जिनका कान कट गया. इसके बाद बोठा महासू निकले और हल उनके पैर और आंख में लग गया, जिससे वे वहीं बैठ गए. तीसरी लकीर में पवासी महाराज निकले, जिनकी कोख फट गई. सबसे छोटे चालदा महाराज हस्तलेखन विद्या और कला जानते थे. उन्हें पता था कि समय अनुकूल नहीं है, इसलिए वे हल के पीछे से निकले और उन्हें कोई चोट नहीं आई. बाहर आते ही चालदा महाराज ने राक्षस का वध किया. लोकमान्यता है कि राक्षस 'खूनीगाढ़' में मारा गया और उसका सिर 'मुंडाड़' में गिरा.

चलायमान देवता, हनोल में ठहराव और जिम्मेदारियां

राक्षस के वध के बाद चारों महाराज कश्मीर लौटना चाहते थे, लेकिन घायल और अपाहिज होने की वजह से तीन महाराज हनोल में ही रुक गए. चालदा महाराज को स्थान देने और सुरक्षा का दायित्व सौंपा गया और हनोल क्षेत्र बोठा महासू को दिया गया. लोकमान्यता के अनुसार चालदा महाराज को चलायमान देवता माना जाता है. उनका प्रवास हर साल बदलता है. मुकेश कहते हैं कि चालदा महाराज बाहर जाकर कमा कर लाते हैं और फिर अपने भाइयों को खिलाते हैं. हनोल में वे बारह-तेरह साल बाद केवल एक रात के लिए आते हैं और उनके आने का कोई निश्चित समय नहीं होता. चालदा महाराज को अपने साथ ले जाने के लिए कई लोग यात्रा में साथ चलते हैं.

शाठी-पाशी, पांडव-कौरव और मंदिर की परंपरा

मुकेश नेगी बताते हैं कि यह क्षेत्र शाठी और पाशी, यानी पांडवों और कौरवों से जुड़ा माना जाता है. लोकमान्यता है कि हनोल मंदिर का निर्माण शाठी यानी पांडवों ने किया था. यहां भीम के कंचे आज भी बताए जाते हैं. मेले के दौरान शाठी और पाशी के वंशज आज भी यहां पहुंचते हैं.

माली परंपरा, पुजारी व्यवस्था और आज का हनोल

मुकेश नेगी बताते हैं कि हनोल और आसपास के इलाकों में जिन लोगों के भीतर देवता आते हैं, उन्हें स्थानीय भाषा में “माली” कहा जाता है. माली को देवता का माध्यम माना जाता है और धार्मिक अवसरों पर उनके माध्यम से देवता की इच्छा को समझा जाता है. वह भी एक माली हैं.

हनोल क्षेत्र में चार गांव हैं और हर गांव में लगभग पांच-छह सौ लोग रहते हैं. मंदिर के पुजारी इन्हीं चार गांवों से होते हैं और बाहर का कोई व्यक्ति पुजारी नहीं बनता. पुजारी ड्यूटी के दौरान किसी के हाथ का खाना नहीं खाते. चार गांवों से बारी-बारी से पूजा होती है और बाहर का भोजन वर्जित है. मंदिर परिसर में कुछ स्थान ऐसे हैं, जहां पुजारी के अलावा किसी और का जाना मना है.

खेती कम, पढ़ाई के बाद बाहर और प्रशासनिक व्यवस्था

मुकेश ने बताया कि हनोल में खेतीबाड़ी बहुत कम है और लोग पढ़ाई के बाद रोज़गार के लिए बाहर जाते हैं. मंदिर में किसी तरह के दान की मांग नहीं की जाती और श्रद्धालु अपनी मर्जी से दान करते हैं. हनोल मंदिर की एक समिति बनी हुई है, जो एसडीएम की देखरेख में रहती है. लोककथा, परंपरा और प्रशासनिक व्यवस्था के बीच हनोल मंदिर आज भी जौनसार-बावर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का केंद्र बना हुआ है. इस क्षेत्र के विकास के लिए मास्टर प्लान भी बन रहा है.

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