अकाल तख्त सिख धर्म की सबसे ऊंची धार्मिक और सांसारिक संस्था मानी जाती है. हाल ही में जब पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान की अकाल तख्त पर पेशी की खबर सामने आई, तो आम लोगों के मन में ये सवाल उठने लगा कि आखिर अकाल तख्त है क्या और वहां कौन बैठता है. बहुत से लोग इसे सिर्फ एक धार्मिक स्थान समझते हैं. लेकिन असल में ये सिख समुदाय के लिए न्याय, मर्यादा और फैसलों का सबसे बड़ा मंच है. यहां लिए गए फैसले सिखों के धार्मिक और सामाजिक जीवन को गहराई से प्रभावित करते हैं.
अकाल तख्त पर कौन बैठता है और उसकी भूमिका क्या है?
अकाल तख्त के प्रमुख को जत्थेदार कहा जाता है. जत्थेदार को सिख समुदाय का सर्वोच्च आध्यात्मिक और नैतिक प्रवक्ता माना जाता है. वो खालसा पंथ से जुड़े मामलों में फैसले सुनाते हैं. जत्थेदार के पास ये अधिकार होता है कि वो किसी भी सिख को, चाहे वो आम व्यक्ति हो या बड़ा नेता, अकाल तख्त पर पेश होने के लिए बुला सकते हैं.
अकाल तख्त क्या है और इसकी शुरुआत कैसे हुई?
अकाल तख्त की स्थापना सिखों के छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद साहिब ने वर्ष 1609 में की थी. इसका मकसद सिर्फ पूजा-पाठ नहीं था, बल्कि सिखों को ये सिखाना था कि धर्म के साथ-साथ सांसारिक जिम्मेदारियां और न्याय भी उतने ही जरूरी हैं. अकाल तख्त को अकाल यानी ईश्वर और तख्त यानी सिंहासन कहा जाता है. ये स्थान सिखों के लिए न्याय और नैतिक फैसलों का केंद्र है. यहां समाज, राजनीति या धार्मिक मर्यादा से जुड़े मामलों पर विचार किया जाता है और जरूरत पड़ने पर दोषी माने गए व्यक्ति को जवाब देने के लिए बुलाया जाता है.














