Manali Villages Silence Tradition: आज जब हर समय हम स्मार्टफोन में खोए रहते हैं, सोशल मीडिया की स्क्रॉलिंग बिना सब कुछ अधूरा-अधूरा सा लगता है. सुबह आंख खुलते ही फोन, रात सोते वक्त भी फोन, टीवी पर फिल्में, तब अगर 42 दिनों तक आपकी टीवी बंद, मोबाइल साइलेंट कर दिया जाए तो क्या होगा. हिमाचल प्रदेश के मनाली के कुछ गांवों में ऐसा ही होता है. इस दौरान न टीवी चलती है, न फोन बजते हैं, न मंदिरों में घंटियों की आवाज सुनाई देती है, न रेडियो पर गाने सुन सकते हैं. आइए जानते हैं आखिर ऐसा क्यों किया जाता है.
कौन से गांवों में लागू है ये साइलेंस नियम
मनाली की उझी घाटी और आसपास के इलाकों में हर साल मकर संक्रांति के बाद कुछ गांवों में यह अनोखी परंपरा निभाई जाती है. इन गांवों में गौशाल, कोठी, सोलंग, पलचान, रूआड़, कुलंग, शनाग, बुरूआ और मझाच शामिल हैं. यहां रहने वाले लोग करीब डेढ़ महीने तक खुद ही अपने टीवी बंद कर देते हैं, मोबाइल को साइलेंट मोड पर डाल देते हैं और शोर-शराबे से दूरी बना लेते हैं.
आखिर क्यों लिया जाता है ऐसा फैसला?
गांव वालों की मान्यता है कि इस समय घाटी के आराध्य देवता गौतम ऋषि, ब्यास ऋषि और नाग देवता इस दौरान तपस्या में लीन रहते हैं. देवताओं की तपस्या के दौरान अगर आसपास शोर होगा, तो साधना भंग हो सकती है, इसीलिए पूरे इलाके में शांति बनाए रखने का नियम है. ग्रामीण बताते हैं कि यह परंपरा सैकड़ों साल पुरानी है, जिसे आज भी उतनी ही श्रद्धा से निभाया जाता है. इसे देवता का ही आदेश माना जाता है.
42 दिनों तक क्या-क्या बंद रहता है
इन 42 दिनों में बदलाव सिर्फ स्क्रीन तक सीमित नहीं रहता है. मंदिरों की घंटियों को बांध दिया जाता है, पूजा-पाठ बंद कर दिया जाता है, ऊंची आवाज में बात करना भी ठीक नहीं माना जाता. यहां तक कि खेती-बाड़ी के काम भी रोक दिए जाते हैं, ताकि पूरी घाटी में शांति बनी रहे. सबसे दिलचस्प बात ये है कि इस परंपरा को सिर्फ बुजुर्ग नहीं, बल्कि युवा भी मानते हैं. यहां आने वाले सैलानी भी गांव वालों की भावनाओं का सम्मान करते हैं.
यहां भी शोर पर लग जाती है पाबंदी
मनाली के सिमसा इलाके में देवता कार्तिक स्वामी के मंदिर के कपाट भी इस दौरान बंद कर दिए जाते हैं. सिमसा के साथ कन्याल, छियाल, मढ़ी और रांगड़ी गांवों में भी शोर पर पाबंदी रहती है. मंदिर फिर फागली उत्सव के साथ खोले जाते हैं. अटल टनल के पार सिस्सू गांव में भी कुछ ऐसा ही माहौल रहता है. यहां हालडा उत्सव के चलते बाहरी लोगों की एंट्री बंद कर दी जाती है. गांव पूरी तरह अपने रीति-रिवाजों में डूबा रहता है और ये नियम फरवरी के आखिर तक चलते हैं.














