राजस्थान SI परीक्षा में ओवरएज अभ्यर्थियों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, RPSC ने कहा 713 को पहले ही प्रवेश पत्र जारी

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) द्वारा दायर आवेदन को स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि परीक्षा में शामिल होने का लाभ सभी समान रूप से स्थित ओवरएज अभ्यर्थियों को नहीं दिया जाएगा.

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Rajasthan SI Exam: राजस्थान उप निरीक्षक भर्ती परीक्षा 2025 से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को विशेष अवकाश पीठ बैठाकर 02 अप्रैल 2026 के अपने पूर्व आदेश में संशोधन करते हुए ओवरएज अभ्यर्थियों को दी गई राहत के दायरे को उल्लेखनीय रूप से सीमित कर दिया. न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता एवं न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) द्वारा दायर आवेदन को स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि परीक्षा में शामिल होने का लाभ सभी समान रूप से स्थित ओवरएज अभ्यर्थियों को नहीं दिया जाएगा, जैसा कि 02 अप्रैल 2026 के आदेश की व्यापक व्याख्या से प्रतीत हो रहा था.

आरपीएससी ने न्यायालय को अवगत कराया कि उसने पहले ही लगभग 713 ऐसे ओवरएज अभ्यर्थियों को, जो उच्च न्यायालय में याचिकाकर्ता थे और सूरज मल मीणा की श्रेणी में आते हैं, परीक्षा में सम्मिलित होने की अनुमति दे दी है.

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल आवेदक सूरज मल मीणा को ही परीक्षा में सम्मिलित होने की अनुमति होगी, जिससे पूर्व आदेश की व्यापक व्याख्या को सीमित किया गया. साथ ही, न्यायालय ने आरपीएससी के इस कथन का संज्ञान लिया कि लगभग 713 ओवरएज अभ्यर्थियों को पहले ही प्रवेश पत्र जारी किए जा चुके हैं और वे 5 एवं 6 अप्रैल 2026 को दो चरणों में आयोजित परीक्षा में सम्मिलित हो रहे हैं.

परीक्षा कार्यक्रम में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं

प्रशासनिक स्थिरता बनाए रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि परीक्षा कार्यक्रम में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया जाएगा तथा आरपीएससी अपनी अधिसूचित समय-सारिणी के अनुसार ही परीक्षा आयोजित करेगा. न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका आदेश उन अभ्यर्थियों पर लागू नहीं होगा जिन्होंने न्यायालय का दरवाजा नहीं खटखटाया है, जिससे लाभ का दायरा केवल वादकारियों तक सीमित रहे.

RPSC ने बताई चुनौती

यह संशोधन आरपीएससी द्वारा पूर्व आदेश से उत्पन्न गंभीर प्रशासनिक एवं व्यवस्थागत कठिनाइयों को उजागर करने के बाद किया गया. आयोग ने बताया कि वर्तमान भर्ती प्रक्रिया में लगभग 7.7 लाख अभ्यर्थी पहले से ही सम्मिलित हैं और यदि ओवरएज अभ्यर्थियों को बिना किसी सीमा के शामिल किया गया तो परीक्षा प्रणाली पूरी तरह चरमरा सकती है. आयोग ने यह भी बताया कि परीक्षा 41 शहरों में 1173 से अधिक केंद्रों पर आयोजित की जा रही है और इतने बड़े स्तर पर अतिरिक्त अभ्यर्थियों को अंतिम समय पर समायोजित करना गंभीर संचालनात्मक एवं सुरक्षा संबंधी चुनौतियां उत्पन्न करेगा.

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इसके अतिरिक्त न्यायालय के समक्ष यह भी रखा गया कि वर्ष 2021 की भर्ती प्रक्रिया के 2.21 लाख से अधिक अभ्यर्थियों ने वर्तमान परीक्षा के लिए आवेदन ही नहीं किया है, और अब उन्हें अनुमति देना पूरी प्रक्रिया को बाधित कर देगा.

इन प्रस्तुतियों को स्वीकार करते हुए न्यायालय ने राहत को केवल आवेदक/वादकारियों तक सीमित कर दिया तथा यह सुनिश्चित किया कि चल रही परीक्षा प्रक्रिया पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े.

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पूर्व में, कार्यवाही के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने आवेदक को अस्थायी रूप से परीक्षा में सम्मिलित होने की अनुमति दी थी, साथ ही यह स्पष्ट किया था कि केवल परीक्षा में बैठने से कोई अधिकार (equity) उत्पन्न नहीं होगा और ऐसे अभ्यर्थियों का परिणाम अंतिम निर्णय के अधीन रहेगा.

आरपीएससी की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता शिव मंगल शर्मा तथा राजेश चौहान उपस्थित हुए, जबकि सूरज मल मीणा की ओर से निखिलेश रामचंद्रन ने पैरवी की.

यह निर्णय व्यक्तिगत राहत और विशाल सार्वजनिक भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्षता के बीच संतुलन स्थापित करता है, जिससे परीक्षा बिना किसी व्यवधान के जारी रह सके और न्यायिक हस्तक्षेप केवल वादकारियों तक सीमित रहे.

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