Jharkhand: 'जान देंगे..जमीन नहीं', नेतरहाट की वादियों में फिर गूंजी आदिवासियों की हुंकार; टूटवापानी में उमड़ा जनसैलाब

नेतरहाट की वादियों में 30 साल बाद भी फायरिंग रेंज के खिलाफ संघर्ष की मशाल बुझी नहीं है. टूटवापानी की संकल्प सभा में उमड़े हजारों आदिवासियों ने पेसा कानून और 5वीं अनुसूची को अपनी ढाल बनाकर सरकार को दो टूक कह दिया है- 'जान देंगे, पर जमीन की एक इंच मिट्टी भी नहीं देंगे.'

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नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज: 30 साल बाद भी कम नहीं हुई संघर्ष की धार, टूटवापानी में नई पीढ़ी ने थामा आंदोलन का झंडा.
NDTV Reporter

Latehar News: झारखंड के लातेहार जिले के नेतरहाट (टूटवापानी) में एक बार फिर जनसंघर्ष की गूंज सुनाई दी है. नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज के खिलाफ जारी ऐतिहासिक आंदोलन के तहत आयोजित संकल्प सभा में हजारों की संख्या में ग्रामीण और आदिवासी समुदाय के लोग जुटे हैं. प्रदर्शनकारियों ने एक स्वर में संकल्प लिया कि वे अपनी पूर्वजों की जमीन और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए अंतिम सांस तक लड़ेंगे.

तानाशाही सरकारों को झुकने पर किया मजबूर

सभा को संबोधित करते हुए केंद्रीय जनसंघर्ष समिति के वरिष्ठ सदस्य अनिल मनोहर ने कहा कि पिछले 30 वर्षों से यह विश्व प्रसिद्ध आंदोलन पूरी मजबूती के साथ जारी है. उन्होंने याद दिलाया कि जनशक्ति के दबाव के कारण ही सरकार को 11 मई 2022 को प्रस्तावित फायरिंग रेंज की अवधि समाप्त करने और परियोजनाओं को स्थगित करने पर मजबूर होना पड़ा था. उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर आने वाली पीढ़ी इस संघर्ष को इसी धार के साथ जारी रखती है, तो जीत सुनिश्चित है.

5वीं अनुसूची और पेसा कानून का हवाला

आंदोलनकारियों ने स्पष्ट किया कि यह पूरा इलाका संविधान की 5वीं अनुसूची के अंतर्गत आता है. संकल्प सभा में वक्ताओं ने कहा, '5वीं अनुसूची वाले क्षेत्रों में केंद्र या राज्य सरकार की एक इंच भी जमीन नहीं है. जल, जंगल और जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय समुदाय का सामुदायिक अधिकार है. पेसा (PESA) कानून के तहत ग्राम सभा की सहमति के बिना सामुदायिक संसाधनों को किसी भी बाहरी संस्था या परियोजना को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता.'

'जान देंगे, जमीन नहीं' के गूंजे नारे

इस संकल्प दिवस के दौरान केवल फायरिंग रेंज ही नहीं, बल्कि व्याघ्र परियोजना (Tiger Project) के कारण होने वाले संभावित विस्थापन और अन्य सामाजिक मुद्दों पर भी विस्तृत चर्चा की गई. सभा का माहौल तब और भी जोशपूर्ण हो गया जब पूरे क्षेत्र में 'जान देंगे, जमीन नहीं' के नारे गूंजने लगे.

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