मीडिया में हलचल: क्या भारत अरब देशों की बैठक में ‘बोर्ड ऑफ पीस’ के मुद्दे पर बात करेगा? गाजा कूटनीति पर नजरें टिकीं

नई दिल्ली में अरब देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक का शनिवार को आयोजन हो रहा है. इसके मुद्दों से अधिक चर्चा इस बात की है कि क्या इसमें डोनाल्ड ट्रंप के गाजा बोर्ड ऑफ पीस पर भी औपचारिक या अनौपचारिक बात होगी?

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  • भारत सरकार ने अब तक ‘बोर्ड ऑफ पीस’ पर आधिकारिक रुख स्पष्ट नहीं किया है.
  • मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह मुद्दा 31 जनवरी को होने जा रहे भारत-अरब विदेश मंत्रियों की बैठक में उठ सकता है.
  • गाजा बोर्ड ऑफ पीस पर भारत संतुलित कूटनीति अपनाते हुए अभी विकल्पों पर विचार कर रहा है.
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भारत शनिवार (31 जनवरी 2026) को नई दिल्ली में भारत-अरब विदेश मंत्रियों की दूसरी बैठक की मेजबानी कर रहा है. यह बैठक 10 साल के बाद हो रही है. जिसमें करीब 22 देशों के मंत्री या वरिष्ठ प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं. इससे पहले यह मीटिंग पहली बार 2016 में बहरीन में हुई थी. भारत के साथ यूएई इस बैठक में सह-अध्यक्ष है. इसमें सूडान, फलस्तीन, ओमान, कतर, लीबिया, सोमालिया के प्रतिनिधि शामिल हो रहे हैं. इसमें जिन विषयों पर चर्चा की जाएगी उनमें गाजा शांति योजना, बोर्ड ऑफ पीस के संभावित प्रभाव और क्षेत्रीय स्थिरता है.

पहली बैठक के दौरान, नेताओं ने सहयोग के पांच जरूरी मुद्दों- अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, शिक्षा, मीडिया और संस्कृति, की पहचान की और इसमें कुछ गतिविधियों का प्रस्ताव रखा.

विदेश मंत्रालय ने कहा, "भारत-अरब विदेश मंत्रियों की बैठक इस साझेदारी को आगे बढ़ाने वाला सबसे बड़ा इंस्टीट्यूशनल सिस्टम है, जिसे मार्च 2002 में तब औपचारिक रूप दिया गया था जब भारत और लीग ऑफ अरब स्टेट्स (एलएएस) ने बातचीत की प्रक्रिया को इंस्टीट्यूशनल बनाने के लिए एक एमओयू पर हस्ताक्षर किया था."

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लीग ऑफ अरब स्टेट्स (एलएएस) क्या है?

The League of Arab States (LAS) का गठन 22 मार्च 1945 को मिस्र की राजधानी काहिरा में हुई थी. तब इसमें मिस्र, इराक, जॉर्डन, लेबनान, सउदी अरब और सीरिया शामिल थे. अब इस लीग में 22 सदस्य देश हैं, इनमें उत्तरी अफ्रीका और मध्य पूर्व के देश शामिल हैं.

साथ ही इसमें भारत समेत कुछ देश ऑब्जर्वर की भूमिका में हैं. ऑब्जर्वर देशों में आर्मेनिया, ब्राजील, चाड, इरिट्रिया, ग्रीस, भारत और वेनेज़ुएला शामिल हैं.

लीग ऑफ अरब स्टेट्स का उद्देश्य अपने सदस्यों के राजनीतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक कार्यक्रमों को मजबूत और कोऑर्डिनेट करना और उनके बीच या उनके और तीसरे पक्षों के बीच विवादों में मध्यस्थता करना है.

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क्या गाजा बोर्ड ऑफ पीस पर भी बात होगी?

ऐसा माना जा रहा है कि भारत मध्य-पूर्व संकट में संतुलित और सक्रिय कूटनीति की दिशा में लीग ऑफ अरब स्टेट्स में एक बड़ा कदम बढ़ाने जा रहा है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक गाजा युद्ध के बाद बने हालात के बाद अभी हाल ही में अमेरिका की तरफ से प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस' योजना पर भारत अब अरब देशों और इजरायल, दोनों से संवाद शुरू करने की तैयारी में है. इस प्रक्रिया में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका केंद्रीय मानी जा रही है.
31 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में होने जा रही दूसरी भारत–अरब विदेश मंत्रियों की बैठक इस दिशा में बेहद अहम मानी जा रही है. अरब लीग के सदस्य देशों के साथ होने वाली इस बैठक में गाजा में स्थायी संघर्षविराम, मानवीय सहायता, पुनर्निर्माण और अमेरिका के प्रस्तावित बोर्ड ऑफ पीस मॉडल पर चर्चा होने की संभावना है.

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संतुलन साधने की नीति

भारत की यह रणनीति उसकी पारंपरिक विदेश नीति का हिस्सा मानी जा रही है, जिसमें वह एक तरफ इजरायल के साथ रक्षा, तकनीक और सुरक्षा सहयोग मजबूत करता है, तो दूसरी तरफ अरब देशों और फलस्तीन के साथ अपने ऐतिहासिक संबंध भी बनाए रखता है. भारत लगातार दो-राज्य समाधान का समर्थन करता आया है और अब वह कूटनीतिक मंचों के जरिए संवाद की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है.

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कूटनीतिक के जानकारों के मुताबिक, भारत का यह संतुलित रुख उसे उन गिने-चुने देशों में शामिल करता है, जिनसे क्षेत्र के सभी पक्ष संवाद करने को तैयार रहते हैं. यही वजह है कि अमेरिका के प्रस्तावित बोर्ड ऑफ पीस जैसे ढांचे में भारत की भूमिका संभावित मध्यस्थ और संवाद सेतु के रूप में देखी जा रही है.

नई दिल्ली में होने वाली भारत–अरब बैठक और इजरायल के साथ उच्चस्तरीय संवाद आने वाले महीनों में गाजा संकट पर भारत की भूमिका को और स्पष्ट कर सकते हैं. यह पहल भारत को न केवल पश्चिम एशिया की राजनीति में मजबूत स्थिति दिला सकती है, बल्कि वैश्विक शांति प्रयासों में उसकी छवि भी सुदृढ़ कर सकती है.

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भारतीय विदेश मंत्रालय का बोर्ड ऑफ पीस पर रुख

भारतीय विदेश मंत्रालय ने अब तक आधिकारिक रूप से बोर्ड ऑफ पीस पर कोई स्पष्ट बयान नहीं दिया है. हालांकि विदेश मंत्रालय ने यह जरूर कहा है कि भारत की मध्य पूर्व नीति पारंपरिक रूप से संतुलित है और वह फलस्तीन एवं अरब दुनिया के साथ साझेदारी को महत्वपूर्ण मानता है. एमईए (विदेश मंत्रालय) ने यह भी नहीं बताया है कि क्या वो इस अरब लीग की बैठक के दौरान बोर्ड ऑफ पीस पर औपचारिक तौर पर बात करेगा या नहीं. हालांकि मीडिया में बैठक में इस मुद्दे के उठने की चर्चा इसलिए भी चल रही है क्योंकि गाजा शांति प्रक्रिया इस समय अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मुख्य एजेंडों में है.

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मीडिया में केवल संभावनाएं जताई जा रही

हालांकि किसी भी मीडिया रिपोर्ट में इसकी पुष्टि नहीं की गई है कि भारत बोर्ड ऑफ पीस पर अरब लीग में बातचीत करेगा. केवल इसकी संभावना जताई जा रही है.

इन रिपोर्ट्स के मुताबिक बैठक में गाजा शांति प्रक्रिया, पुनर्निर्माण तथा क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना बताई गई है और इसी दौरान बोर्ड ऑफ पीस पर भी बात हो सकती है.

कूटनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत अपनी संतुलित नीति के कारण इस विषय पर विचार-विमर्श में हिस्सा ले सकता है.

फलस्तीन विदेश मंत्री वर्सेन अघाबेकियन शाहीन
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फलस्तीन विदेश मंत्री ने क्या कहा?

अरब लीग में भाग लेने आईं फलस्तीन विदेश मंत्री वर्सेन अघाबेकियन शाहीन ने कहा है कि प्रस्तावित बोर्ड ऑफ पीस में भारत की भागीदारी फलस्तीन के लिए सहायक हो सकती है.

अरब लीग में भाग लेने भारत पहुंची फलस्तीन की विदेश मंत्री वर्सेन अघाबेकियन शाहीन और भारतीय विदेश मंत्री डॉक्‍टर सुब्रह्मण्‍यम जयंशकर ने शुक्रवार को नई दिल्ली में मुलाकात की. एक सोशल मीडिया पोस्‍ट में डॉक्‍टर जयशंकर ने कहा कि इस बैठक के दौरान दोनों नेताओं ने भारत तथा फलस्‍तीन के बीच विकास और सहयोग की समीक्षा की.  दोनों नेता इस संबंध को आगे ले जाने की पहलों पर सहमत हुए. जयशंकर ने कहा कि दोनों पक्षों ने गाजा शांति योजना और क्षेत्रीय घटनाक्रमों पर अपने विचार साझा किए.

NDTV के सीनियर एग्जीक्यूटिव एडिटर आदित्य राज कौल के साथ एक लंबे इंटरव्यू में, अघाबेकियन ने बताया कि भले ही गाजा में आंशिक तौर पर सीजफायर है पर वहां जमीनी हालात बहुत खराब हैं. इस दौरान उन्होंने कहा कि अब युद्ध का समय नहीं है. अंतरराष्ट्रीय मसलों का समाधान बातचीत और डिप्लोमेसी से होना चाहिए और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान किया जाना चाहिए.

उन्होंने फलस्तीन मुक्ति संगठन के रुख को दोहराया, "हिंसा नहीं, बातचीत से मुद्दों को सुलझाना चाहिए."

इस दौरान अघाबेकियन ने गाजा के लिए एक इंटरनेशनल 'बोर्ड ऑफ पीस' की घोषणा का स्वागत करते हुए कहा कि कोई भी पहल जो लड़ाई रोकने और मानवीय सहायता पहुंचाने में मदद करती है, वह अच्छी है. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे ढांचे को संयुक्त राष्ट्र संघ के फ्रेमवर्क के साथ तालमेल बिठाना होगा.

जब उनसे यह पूछा गया कि क्या भारत शांति वार्ता में मध्यस्थता कर सकता है तो उन्होंने कहा कि भारत का दोनों के साथ संतुलित संबंध उसे कूटनीतिक फायदा देता है.

उन्होंने कहा, "भारत दोनों इजराइल और फलिस्तीन, के साथ दोस्ताना संबंध रखता है, और हमें लगता है कि वह इस मामले में भूमिका निभा सकता है."

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इजरायल से भी भारत का संपर्क

उधर, इजरायल के साथ भी भारत का संपर्क लगातार बना हुआ है. प्रधानमंत्री मोदी और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच हाल ही में फोन पर बातचीत हुई है, जिसमें गाजा संकट, क्षेत्रीय सुरक्षा और द्विपक्षीय सहयोग जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई. दोनों नेताओं के बीच जल्द ही प्रत्यक्ष मुलाकात की भी संभावना जताई जा रही है.

फलिस्तीन विदेश मंत्री के यह कहने पर कि भारत भरोसेमंद मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है, यह संभावना बढ़ती है कि भारत को इन दोनों के बीच संवाद में मध्यस्थ की भूमिका निभाने का अवसर मिल सकता है. पर विदेश मंत्रालय की ओर से अब तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लिहाजा यह भी संभावना है कि भारत बैठक में स्पष्ट रूप से इस पर बात न करे.

भारत अक्सर ऐसी पहल पर निर्णय लेने से पहले सभी कूटनीतिक पहलुओं पर गहन विचार करता है. बोर्ड ऑफ पीस की संरचना और इसे लेकर यूरोपीय संघ के कुछ देशों की स्पष्ट विरोध भी भारत के लिए संवेदनशील है. 

कुल मिलाकर, बेशक बोर्ड ऑफ पीस पर बातचीत की संभावनाएं खुली हुई हैं, पर इसे लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है कि भारत इससे जुड़ी किसी घोषणा या समर्थन की बात सीधे करेगा या नहीं.

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क्या है गाजा बोर्ड ऑफ पीस और इसका उद्देश्य क्या है?

बोर्ड ऑफ पीस को पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने गाजा में स्थायी शांति, युद्धविराम की निगरानी और पुनर्निर्माण को आगे बढ़ाने के लिए प्रस्तावित किया है. इसका लक्ष्य तकनीकी, राजनीतिक और सहयोगात्मक स्तर पर अंतरराष्ट्रीय भागीदारी से स्थिरता लाना बताया गया है. 

कौन शामिल है?

गाजा पीस बोर्ड में अब तक 25 से अधिक देश शामिल हो चुके हैं. इनमें सऊदी अरब, तुर्की, कतर, मिस्र, जॉर्डन, पाकिस्तान, अर्जेंटीना, मोरक्को, इंडोनेशिया शामिल हैं.

किसने शामिल होने से इनकार किया?

कुछ प्रमुख देशों ने स्पष्ट रूप से इनकार या असमंजस जताया है. फ्रांस, नॉर्वे, स्वीडन और कई बड़े यूरोपीय देशों ने इसे संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका से बाहर बताते हुए शामिल होने से इनकार किया है.

भारत का रुख

भारत को भी डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से आमंत्रण दिया गया है पर उसने इस पर फिलहाल कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. भारत ने न तो इसमें शामिल होने के लिए हां कहा और न ही इनकार किया. भारत अभी इस पर रणनीतिक नजरिए से विचार कर रहा है.

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