- ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट में पोर्ट, एयरपोर्ट, पावर इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया जाएगा. विपक्ष जंगल कटाई पर हमलावर है.
- जयराम रमेश ने पर्यावरणीय मंजूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं. सरकार का दावा है- सभी मंजूरियां नियमों के तहत हैं.
- विवाद के केंद्र में पर्यावरण, जैव विविधता, आदिवासी अधिकार और राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर संतुलन हैं.
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को लेकर विवाद की मुख्य वजह पर्यावरणीय मंजूरी, जैव विविधता और आदिवासी समुदायों पर पड़ने वाला असर है. हाल ही में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कांग्रेस सांसद जयराम रमेश के आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि परियोजना का मूल्यांकन पूरी तरह नियमों के अनुसार और व्यापक तरीके से किया गया है. जबकि जयराम रमेश ने सरकार पर आरोप मढ़ा कि पर्यावरणीय मंजूरी अधूरे और अपर्याप्त आंकड़ों के आधार पर दी गई है. तो आखिर ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट क्या है, इसका महत्व क्या है और इसे लेकर विवाद क्यों खड़ा हुआ है?
क्या है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट?
ग्रेट निकोबार, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का सबसे दक्षिणी और रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण द्वीप है. इंडोनेशिया और मलेशिया के बीच से गुजरने वाले मलक्का स्ट्रेट के बेहद करीब होने की वजह से इसकी रणनीतिक तौर पर बहुत अहमियत है. मलक्का स्ट्रेट की ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट से दूरी महज 40 नॉटिकल मील यानी करीब 74 किलोमीटर है. इस स्ट्रेट की दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों में गिनती होती है.
भारत सरकार यहां करीब 160 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विकास परियोजना बना रही है. इसमें अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट कंटेनर पोर्ट, सैन्य और नागरिक उपयोग वाला अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, बिजली और ऊर्जा के बुनियादी ढांचे और एक नया ग्रीनफील्ड शहर बनाया जाना है.
सरकार का मानना है कि यह परियोजना भारत को वैश्विक समुद्री व्यापार और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक बढ़त दिला सकती है.
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विवाद की शुरुआत कहां से हुई?
कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने सरकार पर आरोप लगाया कि परियोजना को मिली पर्यावरणीय और तटीय क्षेत्र मंजूरी ऐसे अध्ययनों के आधार पर दी गई जो पर्याप्त नहीं थे.
उनका कहना है कि पर्यावरण के प्रभाव के आकलन की प्रक्रिया में खामियां थीं. उन्होंने ये भी कहा कि जैव विविधता पर पड़ने वाले असर का सही आकलन नहीं किया गया और समुद्री तटों के कटाव और तटीय बदलावों पर भी समुचित स्टडी नहीं की गई. उन्होंने जोर देकर कहा कि इनमें से कई स्टडी तो केवल एक ही मौसम के आंकड़ों पर आधारित थे. जयराम रमेश ने यहां तक कहा कि यह पर्यावरण प्रभाव आकलन प्रक्रिया का मजाक और विज्ञान का अपमान है.
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सरकार का जवाब क्या है?
पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने इन आरोपों को खारिज कर दिया.
उनके मुताबिक परियोजना का मूल्यांकन EIA Notification 2006 और Island Coastal Regulation Zone नियमों के तहत किया गया. साथ ही सभी जरूरी कानूनी प्रक्रियाओं का इसमें पालन हुआ है. भूपेंद्र यादव के मुताबिक परियोजना की पर्यावरणीय, जैव विविधता और तटीय प्रभावों की विस्तार से जांच की गई. साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि मूल्यांकन प्रक्रिया कई स्तरों पर हुई और बाद में इसकी न्यायिक समीक्षा भी हुई.
पर्यावरण मंत्री ने कहा कि यह कहना गलत है कि मंजूरी जल्दबाजी या अधूरे आंकड़ों के आधार पर दी गई.
जैव विविधता को लेकर क्या चिंता है?
ग्रेट निकोबार दुनिया के सबसे समृद्ध जैव विविधता वाले क्षेत्रों में गिना जाता है. यहां बहुत बड़ी मात्रा में कोरल रीफ मौजूद है. साथ ही लेदरबैक समुद्री कछुए और निकोबार मेगापोड पक्षी और दुर्लभ वनस्पतियों का भी यह घर है.
यही कारण है कि इसकी आलोचना करने वालों को इनकी चिंता है और उनका यह मानना है कि इतनी बड़ी परियोजना इन प्रजातियों और उनके प्राकृतिक आवास को प्रभावित कर सकती है.
हालांकि सरकार ने दावा किया है कि विशेषज्ञ संस्थानों, पर्यावरण मूल्यांकन समिति और हाई पावर्ड कमेटी ने इन सभी पहलुओं की गंभीरता से जांच की है.
गैलेथिया बे पर विवाद क्या है?
परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा गैलेथिया बे में बनने वाला ट्रांसशिपमेंट पोर्ट है. इस पर यह आरोप था कि समुद्री कटाव और समुद्र तट के बदलाव का यहां समुचित अध्ययन नहीं किया गया है.
इस पर भूपेंद्र यादव ने कहा कि राष्ट्रीय सतत तटीय प्रबंधन केंद्र (National Centre For Sustainable Coastal Management) ने 17 वर्षों के सैटेलाइट डेटा का अध्ययन किया है.
सरकार के अनुसार गैलेथिया बे का पूर्वी हिस्सा अपेक्षाकृत स्थिर है, प्रस्तावित बंदरगाह वाले क्षेत्र में गंभीर तटीय कटाव का खतरा नहीं पाया गया. साथ ही समुद्री तल और तलछट की स्थिति पोर्ट निर्माण के लिए अनुकूल मानी गई.
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आदिवासी समुदायों पर क्या असर पड़ेगा?
ग्रेट निकोबार में बेहद संवेदनशील आदिवासी समुदाय रहते हैं. आलोचकों का कहना है कि बड़े पैमाने पर विकास परियोजनाएं इन समुदायों की पारंपरिक तरीके से जीवन यापन करने और सांस्कृतिक पहचान को प्रभावित कर सकती हैं.
सरकार का दावा है कि परियोजना के मूल्यांकन में आदिवासी कल्याण और सामाजिक प्रभावों को भी शामिल किया गया है.
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल और हाई पावर्ड कमेटी का क्या रोल है?
इस परियोजना को लेकर मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal) यानी एनजीटी तक पहुंच चुका है. एनजीटी ने पहले एक हाई पावर्ड कमेटी गठित की थी, जिसने परियोजना से जुड़े विभिन्न पहलुओं की समीक्षा की. जयराम रमेश ने हाई पावर्ड कमेटी की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की मांग की है.
सरकार का कहना है कि रिपोर्ट में राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक महत्व की जानकारी है, इसलिए उसके कुछ हिस्से सूचना के अधिकार कानून के तहत सार्वजनिक नहीं किए जा सकते.
कुल मिलाकर ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर असली बहस विकास बनाम पर्यावरण की है. एक पक्ष का कहना है कि भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी रणनीतिक और आर्थिक ताकत बढ़ाने के लिए ऐसे मेगा प्रोजेक्ट्स की जरूरत है. वहीं दूसरा पक्ष मानता है कि पर्यावरणीय रूप से बेहद संवेदनशील द्वीप पर इतने बड़े पैमाने का निर्माण दीर्घकालिक नुकसान पहुंचा सकता है, जिसकी भरपाई संभव नहीं होगी.











