भारत में 40 डिग्री नॉर्मल, पर यूरोप में होने लगीं मौतें; गर्मी न झेल पाने की वजह क्या है

दफ्तरों में कामकाज प्रभावित है. फिलहाल राहत के लिए यूरोप में लोगों को कोई जगह नहीं मिल रही. यूरोप की जनता की शिकायत है कि 40 डिग्री सेल्सियस तापमान भले ही है, लेकिन उन्हें कहीं ज्यादा महसूस हो रहा है.

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  • यूरोप में 40 डिग्री सेल्सियस तापमान जानलेवा साबित हो रहा है और हजारों लोगों की मौत हो चुकी है
  • यूरोप के मकान पत्थर से बने होते हैं जो गर्म होने में समय लेते हैं और रात को भी ठंडे नहीं होते
  • यूरोप में एयर कंडीशनर का उपयोग बहुत कम होता है जो गर्मी से बचाव में बड़ी चुनौती बन रहा है
नई दिल्ली:

यूरोप में गर्मी से हाहाकार मचा है. भारत में 40 डिग्री सेल्सियस के जिस तापमान को गर्मियों में सामान्य माना जाता है, वह यूरोप में जानलेवा साबित हो रहा है. अकेले फ्रांस में ही 1000 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं. इसके अलावा जर्मनी, ब्रिटेन, स्वीडन जैसे देशों में भी गर्मी ने लोगों को पस्त कर दिया है. हालात ऐसे हैं कि स्कूलों को कुछ घंटों में ही बंद करना पड़ रहा है. स्कूलों की ओर से पैरेंट्स से अपील की जा रही है कि वे बच्चों को जल्दी ले जाएं. दफ्तरों में कामकाज प्रभावित है. फिलहाल राहत के लिए यूरोप में लोगों को कोई जगह नहीं मिल रही. यूरोप की जनता की शिकायत है कि 40 डिग्री सेल्सियस तापमान भले ही है, लेकिन उन्हें कहीं ज्यादा महसूस हो रहा है.

आखिर यूरोप में गर्मी कैसे साइलेंट किलर बन गई है. किसी भी बीमारी से ज्यादा मौतें यूरोप में गर्मी क्यों ले रही है? यह सवाल सभी के मन में आ रहा है, जिसके जवाब हमने तलाशने की कोशिश की है. इसका एक जवाब यह भी है कि यूरोप में घरों की डिजाइन और उसमें लगने वाला सामान ऐसा होता है कि वे सर्द मौसम में भी गर्मी प्रदान करते रहें. यानी वहां मकानों को इस तरह तैयार किया जाता है कि वहां सर्दी का असर कम हो. गर्मी के मौसम में भी यूरोप में एक हद से ज्यादा तापमान नहीं रहता. ऐसे में जब 40 डिग्री वाला तापमान हुआ है तो वहां मकानों के अंदर करीब 50 डिग्री वाला टॉर्चर महसूस हो रहा है.

ऐसा इसलिए क्योंकि वहां ज्यादातर मकान पत्थर से बनते हैं. इन पत्थरों को गर्म होने में यदि वक्त लगता है तो फिर ठंडा होने में भी समय लग रहा है. अब जब तापमान 40 डिग्री सेल्सियस है तो दिन में गर्म होने वाले पत्थर रात को भी ठंडे नहीं होते. इस तरह मकानों का निर्माण एक बड़ी वजह बना है. यूरोप में एसी का इस्तेमाल करीब 7 फीसदी के आसपास ही है. ऐसे में अब जब अचानक गर्मी पड़ी है तो लोगो का जोर ज्यादा से ज्यादा उपकरण खरीदने पर है. फिलहाल इनकी भी किल्लत देखी जा रही है. 

यूरोप के मकानों की डिजाइन सर्दी के अनुकूल, पर गर्मी की तैयारी नहीं

यूरोप में लंबा वक्त गुजारने वाले रवि रंजन का कहना है कि वहां मकानों को इस तरह से बनाया जाता है कि अंदर सर्दी न लगे. अकसर लोग गर्म पकड़े पहनकर निकलते हैं तो घर आते ही उन्हें उतार देते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि घरों में सर्दी नहीं लगती. उनका निर्माण ही इस प्रकार होता है कि सर्दी का असर न हो. ऐसे में अब जब तापमान ही 40 डिग्री सेल्सियस है तो गर्मी का असर अंदर कहीं ज्यादा है. उन्होंने कहा कि यूरोप में आमतौर पर लोग भारत की तरह एसी, पंखे और कूलर आदि नहीं लगाते. यहां तक कि बीते कुछ सालों में ही टेबल फैन का प्रचलन थोड़ा बढ़ा है. ऐसे में जब अचानक तापमान 40 डिग्री सेल्सियस हो जाए तो समझा जा सकता है कि परेशानी कितनी होगी. इसके अलावा एक वजह आनुवांशिकता भी है. यूरोप में लोगों की सर्दी झेलने की क्षमता हजारों सालों में विकसित हुई है, लेकिन गर्मी में रहने का अभ्यास नहीं रहा है. ऐसे में यह भी कष्ट को बढ़ा रहा है.

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