बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भारतीय जनता पार्टी के दो बड़े राजनीतिक फैसलों ने पार्टी के भीतर और बाहर नई बहस छेड़ दी है. सवाल उठ रहा है कि क्या एनडीए के सहयोगी दलों को साधने की रणनीति में भाजपा अपने परंपरागत और सबसे मजबूत माने जाने वाले भूमिहार वोट बैंक की नाराजगी मोल ले रही है? राजनीतिक गलियारों में चर्चा इस बात की भी है कि क्या उपेंद्र कुशवाहा और उनकी पार्टी को साधने के लिए भाजपा ने अपने ही नेताओं के राजनीतिक हितों से समझौता किया है. हाल के दो फैसले इस चर्चा की सबसे बड़ी वजह बने हैं.
पहला, राज्यसभा की वह सीट जो नवादा से सांसद बनने के बाद विवेक ठाकुर के इस्तीफे से खाली हुई थी. दूसरा विधान परिषद सदस्य देवेश कुमार का समय से पहले इस्तीफा, जिससे राष्ट्रीय लोक मोर्चा (रालोमो) के नेता और मंत्री दीपक प्रकाश को विधान परिषद भेजने का रास्ता साफ हुआ.
गठबंधन की राजनीति या कोर वोटर की कीमत?
भाजपा लंबे समय से बिहार में भूमिहार समाज के सबसे बड़े राजनीतिक आधार वाली पार्टी मानी जाती रही है. 1990 के दशक से लेकर आज तक विधानसभा और लोकसभा चुनावों में इस समाज का बड़ा हिस्सा लगातार भाजपा के साथ खड़ा रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार में भूमिहार मतदाता का एक बड़ा वर्ग भाजपा का "कोर वोट बैंक" माना जाता है, जो कठिन राजनीतिक परिस्थितियों में भी पार्टी के साथ बना रहा. इसी वजह से जब पार्टी की अपनी सीटें सहयोगी दलों को दी जाती हैं, तब इस वर्ग के भीतर सवाल उठना स्वाभाविक माना जा रहा है.
पहला संकेत: विवेक ठाकुर की सीट
2024 में नवादा से लोकसभा चुनाव जीतने के बाद विवेक ठाकुर ने राज्यसभा की सदस्यता छोड़ दी थी. सामान्य राजनीतिक परंपरा के अनुसार उम्मीद थी कि भाजपा अपने किसी अन्य नेता को राज्यसभा भेजेगी. लेकिन पार्टी ने यह सीट राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा को दे दी. राजनीतिक संदेश स्पष्ट था- भाजपा विधानसभा चुनाव से पहले कुशवाहा समाज और उपेंद्र कुशवाहा को एनडीए में पूरी राजनीतिक अहमियत देना चाहती है.
दूसरा संकेत: देवेश कुमार का इस्तीफा
अब एमएलसी देवेश कुमार का मार्च 2027 से पहले इस्तीफा भी इसी रणनीति की अगली कड़ी माना जा रहा है. मंत्री बनने के बावजूद विधानमंडल के किसी सदन के सदस्य नहीं होने के कारण दीपक प्रकाश के सामने संवैधानिक चुनौती थी. ऐसे में भाजपा ने अपनी सीट खाली कर सहयोगी दल के नेता को विधान परिषद भेजने का रास्ता बनाया यानी कि दो वर्षों के भीतर भाजपा ने अपनी दो महत्वपूर्ण सीटें सहयोगी दल के नेताओं को दे दीं.
आखिर कुशवाहा समाज इतना महत्वपूर्ण क्यों?
बिहार की राजनीति में कुशवाहा समाज को प्रभावशाली पिछड़ा वर्ग माना जाता है. विभिन्न राजनीतिक आकलनों के अनुसार यह समाज मध्य बिहार, मगध, शाहाबाद, तिरहुत और सीमांचल के कई विधानसभा क्षेत्रों में यह समुदाय चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है. उपेंद्र कुशवाहा का व्यक्तिगत जनाधार भले पहले की तुलना में सीमित माना जाता हो, लेकिन एनडीए के लिए उनका साथ चुनावी सामाजिक संतुलन की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है.
भूमिहार समाज की नाराजगी का डर क्यों?
भूमिहार समुदाय की आबादी बिहार में लगभग 3 से 4 प्रतिशत के बीच मानी जाती है, लेकिन कई जिलों और करीब 35 से 40 विधानसभा क्षेत्रों में उसका प्रभाव उल्लेखनीय माना जाता है. यही कारण है कि यह समुदाय संख्या से अधिक राजनीतिक प्रभाव रखता है. भाजपा के कई वरिष्ठ नेता इसी समाज से आते रहे हैं. ऐसे में पार्टी समर्थकों का एक वर्ग मानता है कि जब भी पार्टी के हिस्से की सीटें खाली होती हैं तो प्राथमिकता पार्टी के अपने नेताओं को मिलनी चाहिए. इसी पृष्ठभूमि में यह सवाल उठ रहा है कि विवेक ठाकुर और अब देवेश कुमार जैसे नेताओं के राजनीतिक अवसरों का उपयोग सहयोगी दलों के लिए क्यों किया गया.
यही नहीं भाजपा के भीतर भी भूमिहारों की अनदेखी क्यों की गई. जेडीयू के नेतृत्व में नीतीश कुमार जब मुख्यमंत्री थे, तब भाजपा की तरफ से सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री और विजय कुमार सिन्हा डिप्टी सीएम थे. लेकिन जब नीतीश कुमार की इस्तीफा के बाद बीजेपी खेमे से मुख्यमंत्री बनाने की बात आई तो विजय कुमार सिन्हा को दरकिनार कर दिया गया. यहीं नहीं विजय सिन्हा भूमि और राजस्व विभाग में अपने कार्यकलापों के कारण खूब चर्चा में रहे थे. लेकिन उन्हें इस मंत्री पद से बेदखल कर दिया गया. उन्हें कृषि विभाग दिया गया. हालांकि कृषि विभाग बड़ा विभाग है. लेकिन राजस्व में सुधार की कोशिश के कारण विजय सिन्हा काफी चर्चा में रहे थे.
क्या वास्तव में नाराज है भूमिहार वोटर?
फिलहाल इस बात के कोई ठोस प्रमाण नहीं हैं कि भूमिहार समाज का बड़ा हिस्सा भाजपा से दूरी बना रहा है. न पार्टी के भीतर कोई खुला विरोध सामने आया है और न ही किसी बड़े नेता ने सार्वजनिक असहमति जताई है. हालांकि सोशल मीडिया, राजनीतिक चर्चाओं और स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच इस मुद्दे पर असंतोष की चर्चा जरूर देखने को मिल रही है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण में इस वर्ग को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलता है, तो ऐसी नाराजगी काफी हद तक संतुलित हो सकती है.
भाजपा की रणनीति क्या कहती है?
भाजपा का पूरा फोकस फिलहाल बिहार में एनडीए को एकजुट बनाए रखने पर है. पिछले चुनावों के अनुभव बताते हैं कि बिहार में सामाजिक समीकरण और गठबंधन की मजबूती कई बार व्यक्तिगत राजनीतिक दावेदारियों से अधिक महत्वपूर्ण साबित होती है. भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि एनडीए में हर सहयोगी दल को सम्मान और राजनीतिक भागीदारी मिले. यही कारण है कि राज्यसभा और विधान परिषद जैसी सीटों का इस्तेमाल गठबंधन को मजबूत करने के लिए किया जा रहा है.
चुनाव से पहले सबसे बड़ी चुनौती
विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह दो मोर्चों पर संतुलन बनाए रखे. एक ओर उपेंद्र कुशवाहा जैसे सहयोगियों को पर्याप्त राजनीतिक महत्व देना और दूसरी ओर अपने परंपरागत समर्थक वर्ग- विशेषकर भूमिहार मतदाताओं- को यह भरोसा दिलाना कि उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी और सम्मान में कोई कमी नहीं आएगी. फिलहाल इतना तय है कि विवेक ठाकुर और देवेश कुमार से जुड़े फैसलों ने बिहार की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है, जिसका असर चुनावी विमर्श में भी दिखाई दे रहा है.