- यूपी चुनाव से पहले सपा, आज़ाद समाज पार्टी और एआईएमआईएम के बीच गठबंधन को लेकर बातचीत और नरमी बढ़ रही है
- चंद्रशेखर ने भाजपा पर फायरिंग की जिम्मेदारी प्रशासन पर डालने का आरोप लगाते हुए सपा के रुख का समर्थन किया है
- असदुद्दीन ओवैसी ने सपा से सम्मानजनक गठबंधन की मांग की है लेकिन सपा उनकी पार्टी को भाजपा की बी-टीम मानती है
उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर हर राजनीतिक दल अपनी अपनी तैयारियों में लग गया है. इस बीच गठबंधन बचाने और गठबंधन बढ़ाने की कवायद में भी तेजी दिख रही है. हाल ही में असदुद्दीन ओवैसी ने सपा के साथ गठबंधन करने की इच्छा जताई तो वहीं आज़ाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आज़ाद का ताज़ा बयान समाजवादी पार्टी की तरफ़ बढ़ाया हुआ हाथ साबित हो सकता है? सपा भी चंद्रशेखर को लेकर काफ़ी नरम रुख़ अपना रही है. दरअसल जेन-ज़ी आंदोलन में हुई फायरिंग को लेकर ज़िम्मेदारी तय करने पर बहस चल रही है.
भाजपा फायरिंग को लेकर प्रशासन को ज़िम्मेदार बता रही है तो वहीं विपक्ष भाजपा को उस इतिहास के नाम पर घेर रही है, जिस इतिहास में अयोध्या के कारसेवकों पर गोली चलाने की घटना को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के आदेश से जोड़ा जाता है. सवाल पूछा जा रहा है कि अगर गोली प्रशासन के आदेश पर चलती है तो मुलायम सिंह यादव कैसे कारसेवकों पर गोली चलवाने के आरोपी हुए? इस आरोप प्रत्यारोप के बीच आज़ाद समाज पार्टी के मुखिया और नगीना लोकसभा सीट से सांसद चंद्रशेखर आज़ाद ने भी भाजपा को घेरते हुए सपा के लाइन पर बयान जारी किया.
उन्होंने कहा कि ज़िम्मेदारी तय होनी ही चाहिए. अगर भाजपा गोली चलवाने का आरोप प्रशासन पर लगा रही है तो उसे मान लेना चाहिए कि कारसेवकों पर हुई फायरिंग तब के मंत्री (मुलायम सिंह यादव) ने नहीं बल्कि प्रशासन ने चलवाई थी.आज़ाद समाज पार्टी वर्तमान में किसी के साथ गठबंधन में नहीं हैं. हाल में स्वामी प्रसाद मौर्य से मुलाक़ात और ओवैसी के साथ गठबंधन के कयासों के बीच चंद्रशेखर का सपा के प्रति नरम रूख गठबंधन की कई संभावनाओं को जन्म दे रहा है. इसकी वजह ये है कि चंद्रशेखर आज़ाद ने यूपी में सक्रिय होकर दलित वोटों को साधने पर काम शुरू कर दिया है. इंडिया अलायंस को भी कोई ऐसा साथी चाहिए, जिससे बीते लोकसभा चुनाव की तरह इस बार भी दलितों को साथ लाया जा सके. चंद्रशेखर INDIA अलायन्स के लिए बेहतर विकल्प दिखाई देते हैं.
समाजवादी पार्टी ने भी चंद्रशेखर के बयान पर समर्थन करते हुए नरम रूख अख़्तियार किया है. सपा के पूर्व एमएलसी और प्रवक्ता उदयवीर सिंह ने कहा कि आज़ाद समाज पार्टी सपा की विरोधी नहीं है. उन्होंने कहा कि चंद्रशेखर हमारे विरोधी नहीं हैं, हम सब विपक्ष में हैं और बीजेपी विरोधी हैं. ये अलग बात है कि किसी का गठबंधन किसी के साथ और किसी का किसी और के साथ है, लेकिन सबका मत भाजपा को हटाना है. आजाद समाज पार्टी से गठबंधन होगा या नहीं, ये कोई प्रवक्ता नहीं बता सकता. इसके लिए INDIA अलायंस के नेता बैठकर फैसला लेंगे.
इस बीच एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने भी सपा की तरफ़ हाथ आगे बढ़ाया है. उन्होंने यूपी की रैली में कहा कि अगर सपा भाजपा को हटाना चाहती है तो उसे उनकी पार्टी से गठबंधन करना चाहिए. सम्मानजनक गठबंधन की शर्त रखते हुए ओवैसी ने कहा कि उनकी पार्टी अब सिर्फ दरी नहीं बिछाएगी बल्कि उन्हें बराबरी का हक़ चाहिए. संकेत साफ़ है कि ओवैसी यूपी में इंडिया अलायन्स के साथ आना चाहते हैं, लेकिन सम्मानजनक हिस्सेदारी मिलने की बात होनी चाहिए. ओवैसी को लेकर समाजवादी पार्टी कभी भी सकारात्मक नहीं दिखाई दी है.
ओवैसी को साथ लाने से क्यों बचती है समाजवादी पार्टी
सपा ओवैसी पर भाजपा की बी-टीम होने का आरोप लगाते हुए कहती है कि ओवैसी भाजपा के इशारे पर सिर्फ विपक्षी दलों को नुकसान पहुंचाने के लिए चुनावों में उतरते हैं. सपा को ओवैसी से दो तरह का ख़तरा है. पहला यह कि उनके साथ आने से सपा के साथ खड़े हिंदू वोटर्स छिटक सकते हैं. इसके अलावा ओवैसी अगर यूपी में स्थापित हो गए तो वो जिन वोटों का सबसे बड़ा हिस्सा अपने साथ ले जाएंगे वो सब सपा के वोट हैं. भाजपा ने सपा और आजाद के नरम हुए रुख़ पर तंज़ करते हुए कहा कि ऐसे गठबंधन का कोई मतलब नहीं है. यूपी के मंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने कहा कि INDIA अलायन्स के दल किसी राज्य में एक साथ दिखते हैं तो दूसरे में एक दूसरे के ख़िलाफ़ खड़े हो जाते हैं.
विपक्ष की वैचारिक एकता पर क्या बोली भाजपा
उन्होंने कहा कि ये लोग सिर्फ़ चुनावी फायदे के लिए साथ दिखाई देते हैं. लेकिन वैचारिक तौर पर ये कभी एक नहीं हो सकते. उन्होंने दावा किया कि बीजेपी ने जिनके साथ गठबंधन किया है, वो दल बीजेपी के साथ वैचारिक प्रतिबद्धता रखने वाले दल हैं. यूपी की राजनीति में ओवैसी लगभग हर राजनीतिक दल के लिए अछूत दिखाई देते हैं. भाजपा के ख़िलाफ़ खड़े दल भी ओवैसी से दूरी बनाये रखना चाहते हैं। इतिहास में देखें तो कई राज्यों में ओवैसी का चुनाव लड़ना हमेशा से भाजपा को फ़ायदा दिलाता रहा है. यही वजह है कि विपक्ष ओवैसी को भाजपा की बी-टीम करार देने में कभी कोताही नहीं करता. दूसरा मुस्लिमों के बीच ओवैसी की पैठ बढ़ने से भाजपा के ख़िलाफ़ खड़े दलों को मुस्लिम वोटों में बिखराव और अपने मुस्लिम वोटों के छिटकने का डर हमेशा लगा रहता है.
बसपा का विकल्प बनने की कोशिश में हैं चंद्रशेखर आजाद
बात करें चंद्रशेखर आज़ाद की तो चंद्रशेखर बहुजन समाज पार्टी का विकल्प बनने की जुगत में लगे हैं. इसमें कोई शक नहीं कि बीते कुछ सालों में उनकी पार्टी आज़ाद समाज पार्टी का जनाधार भी बढ़ा है. हालांकि अंदरख़ाने में विपक्षी दल चंद्रशेखर पर भी बीजेपी की बी-टीम वाला आरोप मढ़ते रहे हैं. उनका मानना है कि विपक्ष को मिलने वाले दलित वोटों में बिखराव के लिए बीजेपी ने चंद्रशेखर को आगे बढ़ाने में मदद की है. शायद यही वजह है कि आज तक आज़ाद समाज पार्टी का किसी बड़े दल से समझौता नहीं हो सका है.
क्या विपक्ष पूरा एकसाथ आएगा, या बंटकर लड़ेगा?
उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में मुख्य लड़ाई भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए और सपा-कांग्रेस के गठबंधन वाले इंडिया अलायन्स के बीच दिखाई दे रही है। भाजपा के साथ सुभासपा, निषाद पार्टी, अपना दल (सोनेलाल) और आरएलडी हैं। वहीं विपक्ष में सपा कांग्रेस के गठबंधन के अलावा बीएसपी, एआईएमआईएम और आज़ाद समाज पार्टी प्रमुख हैं। ऐसे में अब नए सिरे से साथ आने की पहल अलग-अलग तरीके से की जाने लगी हैं. देखना होगा कि आख़िर में कौन किसके साथ रहता है और कौन किसका साथ छोड़ता है. फिलहाल यूपी की लड़ाई बहुत बड़ी दिखाई दे रही है.