कौन थीं आदिवासी नेत्री निशा भगत? बेंगलुरु की नौकरी छोड़ जल-जंगल-जमीन और सरना धर्म कोड की लड़ाई में उतरीं, गुमला से लड़ा था चुनाव

झारखंड की आदिवासी नेत्री निशा भगत के निधन के बाद उनके संघर्षमय जीवन की चर्चा हो रही है. होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई के बाद उन्होंने बेंगलुरु की नौकरी छोड़ आदिवासी अधिकारों, सरना धर्म कोड, जल-जंगल-जमीन और संस्कृति संरक्षण के मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभाई थी.

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  • निशा भगत झारखंड की आदिवासी नेत्री थीं जिन्होंने आदिवासी अधिकारों और संस्कृति के लिए लगातार संघर्ष किया
  • होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई के बाद बेंगलुरु में नौकरी की थी लेकिन बाद में सामाजिक कार्यों में सक्रिय हो गईं
  • निशा भगत सरना धर्म कोड, जल-जंगल-जमीन की सुरक्षा और सीएनटी-एसपीटी एक्ट की रक्षा जैसे मुद्दों पर मुखर थीं

झारखंड की राजधानी रांची के पिठौरिया थाना क्षेत्र में आदिवासी नेत्री निशा भगत के निधन की खबर सामने आने के बाद उनके जीवन, सामाजिक संघर्ष और राजनीतिक सफर की चर्चा हो रही है. निशा भगत आदिवासी समाज के अधिकारों, पहचान, संस्कृति और परंपराओं से जुड़े मुद्दों को लेकर लगातार सक्रिय रही थीं. उन्होंने होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई की थी और बेंगलुरु में नौकरी भी की, लेकिन बाद में नौकरी छोड़कर सामाजिक गतिविधियों में खुद को पूरी तरह सक्रिय कर लिया.

निशा भगत मूल रूप से गुमला जिले की रहने वाली थीं. वह उरांव आदिवासी समुदाय से आती थीं. उनके पिता हांडू भगत झारखंड आंदोलन से जुड़े आंदोलनकारी रहे थे. जानकारों के अनुसार, पिता के आंदोलन और आदिवासी अधिकारों के संघर्ष का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा था.

होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई के बाद बेंगलुरु में की नौकरी

निशा भगत ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद दुर्गापुर से होटल मैनेजमेंट का कोर्स किया था. इसके बाद उन्होंने बेंगलुरु में नौकरी की. हालांकि, बाद में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और आदिवासी समाज की पहचान, संस्कृति और अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर काम करना शुरू कर दिया.

सरना धर्म कोड और आदिवासी अधिकारों को लेकर रहीं सक्रिय

निशा भगत की सामाजिक सक्रियता के केंद्र में आदिवासी पहचान और अधिकारों से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दे रहे. वह सरना धर्म कोड की मांग, जल-जंगल-जमीन की सुरक्षा, सीएनटी-एसपीटी एक्ट की रक्षा, पेसा कानून लागू करने तथा आदिवासी संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण जैसे विषयों पर मुखरता से अपनी बात रखती थीं. इसके अलावा धर्मांतरण और डीलिस्टिंग के मुद्दे पर भी उन्होंने सार्वजनिक मंचों से लगातार अपनी राय व्यक्त की थी.

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डीलिस्टिंग के विरोध में मुंडवाया था सिर

दिसंबर 2025 में धर्मांतरण और डीलिस्टिंग के मुद्दे को लेकर निशा भगत ने अपना सिर मुंडवाकर विरोध दर्ज कराया था. उनका तर्क था कि धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों को आदिवासी आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए. इस मुद्दे को लेकर उन्होंने सार्वजनिक मंचों से अपनी बात रखी थी और आदिवासी समाज के बीच जागरूकता अभियान भी चलाया था.

JLKM से जुड़ीं, 2024 में गुमला से लड़ा था चुनाव

सामाजिक गतिविधियों के साथ निशा भगत राजनीति में भी सक्रिय हुईं. वह झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLKM) से जुड़ी थीं. वर्ष 2024 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने गुमला सीट से चुनाव लड़ा था. सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों के माध्यम से वह आदिवासी समाज से जुड़े मुद्दों को लगातार उठाती रही थीं.
 

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