एक ऐसी जाबांज महिला, जिसने अपनी कानूनी लड़ाई से देश के करोड़ों बेज़ुबान और गरीब लोगों को उनका हक दिलाया. अपनी जेब से पैसे खर्च करके हजारों अजनबियों की जिंदगी बदल दी. देश उन्हें 'Mother of PIL' यानी 'जनहित याचिका की जननी' के नाम से जानता है. उनका नाम था- कपिला हिंगोरानी
एक लेख, जिसने हिलाकर रख दिया
साल 1979 की शुरुआत थी. 8 और 9 जनवरी को 'द इंडियन एक्सप्रेस' अखबार में पुलिस कमीशन के सदस्य के.एफ. रुस्तमजी के दो लेख छपे. इन लेखों में बिहार की पटना और मुजफ्फरपुर जेलों में बंद 19 विचाराधीन कैदियों (undertrials) के दर्द की रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी थी. इनमें छह महिलाएं भी थीं.
इन लोगों का गुनाह क्या था? कुछ भी नहीं. ये बेचारे सालों से सिर्फ इस इंतजार में जेल की सलाखों के पीछे सड़ रहे थे कि कब उनका मुकदमा शुरू होगा. दर्दनाक बात यह थी कि जितने साल की सजा उन्हें उस जुर्म के लिए मिल सकती थी, उससे कहीं ज्यादा वक्त वे पहले ही जेल में काट चुके थे. बिना किसी सुनवाई के.
दिल्ली में रहने वाले सुप्रीम कोर्ट के वकील दंपती कपिला हिंगोरानी और उनके पति निर्मल हिंगोरानी ने जब यह पढ़ा, तो उनका दिल दहल गया. वे बेचैन हो उठे.
बेबस कैदियों की कोई सुनने वाला नहीं
कपिला और उनके पति इन बेबस कैदियों के लिए कोर्ट जाना चाहते थे. लेकिन पेंच यह था कि उस वक्त के नियमों के मुताबिक, सिर्फ पीड़ित व्यक्ति या उसका सगा-संबंधी ही कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता था. वकील के पास 'पावर ऑफ अटॉर्नी' होना जरूरी था. अखबार की रिपोर्ट के आधार पर सीधे कोर्ट जाने का तो कोई प्रावधान ही नहीं था.
लेकिन कपिला ने हार नहीं मानी. उन्होंने ठान लिया था कि वे इन बेज़ुबानों की आवाज बनेंगी. 11 जनवरी 1979 को उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट में 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका दायर कर दी. इस केस को नाम मिला- 'हुसैनआरा खातून बनाम बिहार राज्य'. हुसैनआरा उसी जेल में बंद एक लाचार महिला थीं.
आमतौर पर ऐसी अर्जी पहली ही नजर में ख़ारिज हो जाती. लेकिन यह भारतीय न्यायपालिका का एक अलग दौर था. 1975 की इमरजेंसी के दौरान लोगों के अधिकारों की रक्षा न कर पाने के कारण सुप्रीम कोर्ट की साख को गहरा धक्का लगा था. कोर्ट अपनी खोई हुई साख वापस पाना चाहती थी. 22 जनवरी 1979 को जजों ने मामले की गंभीरता को समझा और बिहार सरकार को नोटिस जारी कर दिया.
कपिला ने रच दिया गया इतिहास
9 मार्च 1979 को जस्टिस पी.एन. भगवती की अगुवाई वाली बेंच ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया. कोर्ट ने न सिर्फ उन कैदियों को निजी मुचलके पर तुरंत रिहा करने का आदेश दिया, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 (जीने के अधिकार) की नई परिभाषा लिख दी. कोर्ट ने साफ कहा कि 'जल्दी ट्रायल पाना हर नागरिक का बुनियादी अधिकार है'.
इसके साथ ही, संविधान के अनुच्छेद 39A का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि अगर कोई गरीब आरोपी वकील का खर्च नहीं उठा सकता, तो सरकारी खर्च पर उसे वकील मुहैया कराना सरकार का फर्ज है. कपिला यहीं नहीं रुकीं. उन्होंने देश की आठ राज्य सरकारों को कोर्ट के कटघरे में ला खड़ा किया. नतीजा यह हुआ कि उनकी पहली याचिका के महज चार महीने के भीतर देश की अलग-अलग जेलों में बंद लगभग 40,000 विचाराधीन कैदी आजाद हो गए.
यहीं से जन्म हुआ 'जनहित याचिका' यानी PIL (Public Interest Litigation) का. कपिला ने सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे उन गरीबों के लिए खोल दिए, जो कभी वहां पहुंचने की सोच भी नहीं सकते थे.
भागलपुर का वो खौफनाक 'तेजाब कांड'
साल 1980 में कपिला को बिहार के भागलपुर से एक वकील का खत मिला, जिसे पढ़कर किसी का भी कलेजा कांप जाए. आरोप था कि पुलिस ने शक के आधार पर पकड़े गए आरोपियों की आंखों में तेजाब डालकर उन्हें अंधा कर दिया था.
कपिला तुरंत सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं. कोर्ट ने जांच कराई तो सच सामने आया- कम से कम 33 लोगों की आंखों में पुलिस ने सुई और तेजाब डालकर उन्हें हमेशा के लिए अंधा कर दिया था. आंखों पर तेजाब से भीगी रुई बांधकर उन्हें सड़ने के लिए छोड़ दिया था.
कोर्ट ने इसे इंसानियत के खिलाफ अपराध माना. बिहार सरकार को आदेश दिया गया कि वे इन पीड़ितों के खिलाफ केस खत्म करें, उन्हें इलाज के लिए दिल्ली लाएं, और पुनर्वास का पूरा खर्च उठाएं. पीड़ितों को मुआवजा और ताउम्र पेंशन भी मिली. साथ ही, जिम्मेदार पुलिसवालों और डॉक्टरों पर मुकदमा चलाने का आदेश दिया गया.
जिंदगी का एक ही मकसद- न्याय
कपिला हिंगोरानी का जन्म 27 दिसंबर 1927 को नैरोबी (केन्या) में हुआ था. वे अपने समाज की पहली महिला थीं जो 1947 में कानून की पढ़ाई के लिए ब्रिटेन गईं. महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर वे भारत आईं और यहीं की होकर रह गईं. 1961 में जब उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस शुरू की, तब वहां केवल तीन महिला वकील थीं.
अपनी आखिरी सांस (30 दिसंबर 2013) तक कपिला ने अपने पति के साथ मिलकर लगभग 100 जनहित याचिकाएं बिना एक पैसा लिए लड़ीं और लाखों लोगों को राहत पहुंचाई.
महिलाओं के हक की लड़ाई: 1981 में दहेज उत्पीड़न के खिलाफ उनकी याचिका के बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों की जांच के लिए विशेष पुलिस सेल बनाने का आदेश दिया था.
फैमिली कोर्ट के आंदोलन: उन्होंने देश में फैमिली कोर्ट्स की स्थापना के लिए आंदोलन चलाया, जिसके बाद 'फैमिली कोर्ट्स एक्ट, 1984' पास हुआ.
कर्मचारियों को हक दिलाया: साल 2002-03 में बिहार के सरकारी निगमों के कर्मचारियों को सालों से वेतन न मिलने के कारण जब भुखमरी की नौबत आ गई, तो कपिला की याचिका पर कोर्ट ने सरकार को करोड़ों रुपये का बकाया वेतन देने का आदेश दिया.
बेदाग ईमानदारी और सादगी
कपिला सिर्फ अदालत में ही नहीं, निजी जिंदगी में भी उसूलों की पक्की थीं. एक बार दिल्ली के पॉश ग्रेटर कैलाश इलाके में उनके घर की पानी की पाइप ब्लॉक होने के कारण सड़क पर पानी बहने लगा. नगर निगम के कर्मचारियों ने उन पर जुर्माना (चालान) ठोक दिया और कहा कि रिश्वत दे दो तो मामला रफा-दफा कर देंगे.
कपिला ने रिश्वत देने से साफ मना कर दिया. वे उस चालान के खिलाफ कोर्ट चली गईं. यह लड़ाई पांच साल चली, आखिर में जीत कपिला हिंगोरानी की ही हुई.
साल 2017 में कपिला देश की पहली महिला वकील बनीं, जिनकी तस्वीर सुप्रीम कोर्ट की लाइब्रेरी में लगाई गई. आज भले ही जनहित याचिकाओं (PIL) का रूप थोड़ा बदल गया हो या उस पर सवाल उठते हों, लेकिन कपिला हिंगोरानी ने बेजुबानों को जो आवाज दी, उसकी गूंज हमेशा भारतीय न्याय प्रणाली में सुनाई देती रहेगी.