कांग्रेस की मांग और जनता के दबाव में हुई थी सावरकर की रिहाई, अदालत में बोले परिजन

विनायक दामोदर सावरकर के प्रपौत्र ने कहा, 'यदि कांग्रेस ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी से पहले भी ऐसा ही प्रस्ताव पारित किया होता तो उनकी फांसी टल सकती थी.'

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  • वीर सावरकर की जेल से रिहाई जनदबाव और कांग्रेस के काकीनाडा अधिवेशन के प्रस्ताव के चलते हुई थी
  • सावरकर के प्रपौत्र सात्यकि सावरकर ने पुणे की अदालत में 1923 के कांग्रेस प्रस्ताव को रिहाई का मुख्य कारण बताया
  • सात्यकि ने कहा कि सावरकर की रिहाई ब्रिटिश सरकार की दया याचिकाओं के कारण नहीं, बल्कि बढ़ते जनदबाव से हुई थी
पुणे:

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने वाले वीर सावरकर की जेल से रिहाई को लेकर अलग-अलग दावे किए जाते रहे हैं. एक वर्ग उनकी जेल से रिहाई को लेकर कहता रहा है कि उन्होंने अंग्रेजों से माफी मांगी थी. राहुल गांधी ने भी एक बार वीर सावरकर पर टिप्पणी की थी, जिस पर ऐतराज जताते हुए मानहानि केस किया गया था. इसी मामले की सुनवाई के दौरान वीर सावरकर के प्रपौत्र सात्यकि सावरकर ने कहा कि उन्हें जेल से रिहा जनदबाव और कांग्रेस के प्रस्ताव के चलते मिली थी. उन्होंने कहा कि पुणे की एक अदालत में कहा कि 1923 में कांग्रेस के काकीनाडा अधिवेशन में पारित वह प्रस्ताव भी इसका एक प्रमुख कारण था, जिसमें सावरकर की रिहाई की मांग की गई थी.

उन्होंने कहा, 'यदि कांग्रेस ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी से पहले भी ऐसा ही प्रस्ताव पारित किया होता तो उनकी फांसी टल सकती थी.' अदालत में सावरकर के प्रपौत्र ने कहा कि हिंदुत्व विचारक वीडी सावरकर को ब्रिटिश सरकार ने उनकी दया याचिकाओं के कारण नहीं, बल्कि बढ़ते जनदबाव के चलते रिहा किया था.' सावरकर के भाई के प्रपौत्र सात्यकि सावरकर ने बुधवार को पुणे की एक अदालत में कहा कि 1923 में कांग्रेस के काकीनाडा अधिवेशन में पारित वह प्रस्ताव भी इसका एक प्रमुख कारण था, जिसमें सावरकर की रिहाई की मांग की गई थी.

विनायक दामोदर सावरकर पर की गई टिप्पणियों को लेकर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ आपराधिक मानहानि का मुकदमा चल रहा है. इस मामले में राहुल गांधी की ओर से अधिवक्ता मिलिंद पवार ने सात्यकि सावरकर से जिरह की. एमपी/एमएलए विशेष अदालत के न्यायाधीश अमोल शिंदे के समक्ष जिरह के दौरान ब्रिटिश सरकार को कथित तौर पर सावरकर द्वारा दी गई दया याचिकाओं के कुछ अंश शिकायतकर्ता के सामने रखे गए. 

सावरकर के परिजन बोले- हमें नहीं पता पत्र किसने लिखा था

सात्यकि ने कहा, 'मुझे नहीं पता कि उपरोक्त याचिका की सामग्री सावरकर ने लिखी थी या नहीं. मैं यह नहीं कह सकता कि सावरकर ने अपनी दया याचिका में किसी शर्त पर रिहाई की मांग की थी. मैं यह भी नहीं कह सकता कि सावरकर ने ब्रिटिश सरकार से इस शर्त पर रिहाई मांगी थी कि वह किसी राजनीतिक या क्रांतिकारी आंदोलन में हिस्सा नहीं लेंगे.' हालांकि उन्होंने स्वेच्छा से यह जोड़ा कि सावरकर की रिहाई दया याचिकाओं का परिणाम नहीं थी.

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(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)
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