- देहरादून की सुसवा नदी अब काफी प्रदूषित हो चुकी है, नदी के पानी में आता है झाग
- उत्तराखंड की 12 नदियों का पानी प्रदूषित है, CPCB की जांच में हुआ खुलासा
- कभी देहरादून की सुसवा नदी काफी साफ और स्वच्छ हुआ करती थी
नदियों का पानी पृथ्वी पर जीवन का आधार है. अगर नदियां ना हो तो पृथ्वी पर जीवन नहीं होगा. लेकिन अगर आपसे ये पूछे कि दिल्ली की यमुना और देहरादून की सुसवा नदी में क्या समानता है? तो आप कहेंगे दिल्ली की यमुना प्रदूषित है जबकि देहरादून की नदी में ऐसा नहीं होगा. पर जरा ठहरिए. भले यह इंसान आज दावा करता हो कि वह चांद पर पहुंच गया है, मंगल तक उसकी पहुंच हो गई है और उसने अभूतपूर्व विकास किया है लेकिन इस अभूतपूर्व विकास की कीमत नदियों का प्रदूषित होना है. देहरादून की सुसवा नदी का हाल भी दिल्ली की यमुना जैसी हो गई. गंदगी, झाग और काला पानी.
उत्तराखंड में नदियों का बुरा हाल
वहीं उत्तराखंड में सेंटर पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने नदियों के पानी की क्वॉलिटी की जांच की. सेंटर पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने उत्तराखंड की 17 नदियों की पानी की क्वॉलिटी को 44 जगह पर मॉनिटर किया. जिसमें 12 नदियों पर 23 जगह पर BOD के मानक के हिसाब से पानी की क्वॉलिटी काफी खराब पाई गई. उत्तराखंड की 12 नदियों में सुसवा, बाणगंगा, भेलला, ढेला, कल्याणी, टोंस, किच्छा, कोसी, पिलखर, रामगंगा, यमुना, नंदोउर नदियों का पानी प्रदूषित है.
सुसवा नदी का हाल
दिल्ली की यमुना बन गई देहरादून की सुसवा नदी!
एनडीटीवी ने उत्तराखंड की 12 नदियों में से एक नदी जो की देहरादून में बहती है सुसवा नदी की ग्राउंड रिपोर्ट की यह नदी देहरादून के शहर के बीचो-बीच शहर का सीवर, कूड़ा कचरा और छोटी-मोटी फैक्ट्री से निकलने वाला प्रदूषण कचरा इस नदी में आता है. सुसवा नदी पूरी तरह से नाले में बदल चुकी है. नदी का पानी बिल्कुल काले रंग का हो चुका है. एनडीटीवी ने ग्राउंड रिपोर्ट में पाया कि जिस तरह यमुना नदी में प्रदूषण की वजह से नदी में झाग उत्पन्न हो रहा है इस तरह से सुसवा नदी में प्रदूषण की वजह से झाग उत्पन्न हो रखा है.
लोगों ने सुनाया सुसवा का दर्द
काफी साफ होती थी सुसवा
नदी में शहर का तमाम तरह का कूड़ा चाहे प्लास्टिक , थर्मोकोल ,फॉर्म, कपड़े प्लास्टिक की बोतल जहां फैला हुआ है. सुसवा नदी के पानी में बेहद दुर्गंध आ रही है. इसके अलावा नदी में मरे हुए जानवरों के अवशेष भी देखे जा सकते हैं. एनडीटीवी की टीम ने स्थानीय लोगों से मुलाकात की जो इस नदी के आसपास रहते हैं स्थानीय लोगों ने कहा कि यह नदी कभी साफ होती थी इसमें साफ पानी रहता था लेकिन आज यह नदी पूरी तरह से प्रदूषित हो चुकी है.
नदी के पानी में आ रहा है झाग
लोगों ने सुनाया नदी के प्रदूषण का किस्सा
धीराम क्षेत्री सुसवा नदी के पास ही रहते है धीराम छेत्री बताते हैं कि वह यहां पर बचपन से रह रहे हैं. इस नदी का पानी बेहद साफ रहता था. इसमें वह बचपन में नदी में नहाने जाते थे. लेकिन आज यह नदी पूरी तरह से प्रदूषित हो चुकी है. क्योंकि शहर का कूड़ा और सीवर का पानी इस नदी में डाला जा रहा है. धीराम छेत्री कहते हैं कि गर्मियों में पानी बहुत कम हो जाता है और बदबू ज्यादा आती है और यहां से मच्छर बहुत ज्यादा हो जाते हैं. भूपेंद्र लिंबू भी सुसवा नदी के नजदीक रहते हैं भूपेंद्र लिंबू ने कहा कि उनका जन्म भी यही हुआ है. भूपेंद्र लिंबू का कहना है कि इसमें मछलियां होती थी जिनको हम पकड़ कर घर ले जाते थे. भूपेंद्र लिंबू ने बताया कि अब ये नदी नहीं बल्कि गंदा नाला बन गई है. गर्मियों में यहां खड़ा होना मुश्किल हो जाता है. भूपेंद्र लिंबू ने बताया कि अब लगता नहीं है की नदी साफ हो पाएगी क्योंकि जब भी चुनाव आते हैं तो वादे किए जाते हैं की नदी को साफ करेंगे लेकिन चुनाव चले जाते हैं और नदी जैसे प्रदूषित ही वैसे ही आप नदी प्रदूषित है.
लोगों ने सुनाया सुसवा नदी का किस्सा
यूं पड़ा था सुसवा नाम
अनिल सिंह रावत ने बताया कि यह नदी पहले साफ थी यहां पर सुसवा नाम का एक साग होता था (सुसवा साग जैसे राई,सरसों, होती है वैसा ही होता है) उसी के नाम से इस नदी का नाम सुसवा पड़ा. अनिल सिंह रावत बताते हैं कि इस नदी में शहर का सीवर और कूड़ा आ रहा। बल्कि इस नदी के आसपास मकान का सीवर और कूड़ा नदी में डाल जा रहा है.
अगर सुसवा नदी की बात करें तो ये नदी गंगा की सहायक नदी सॉन्ग नदी के साथ मिलकर गंगा में मिलती है. लेकिन यह नदी बेहद ही प्रदूषित हो चुकी है. इसके साथ ही सुसवा नदी राजाजी टाइगर नेशनल पार्क के बीच में से निकलती है. तो ऐसे में इसका प्रदूषित पानी वन्यजीवों और वन संपदा के लिए खतरनाक और जानलेवा साबित हो सकता है. नदी की बात करें तो इस नदी का पानी आगे जाकर देहरादून के डोईवाला ,चांद मारी, प्रेम नगर और अन्य काशन से निकलता है और वहां पर गेहूं सरसों सब्जियां गन्ने की फसल होती है. यह पूरा क्षेत्र कस्तूरी बासमती चावल का भी क्षेत्र है और धीरे-धीरे इस प्रदूषित नदी का पानी जमीन को बंजारा कर रहा है क्योंकि इस पानी में ऐसे तत्व है जो जमीन की उर्वरक क्षमता बेहद कम कर रहे हैं.
-सुसवा,बाणगंगा,भेलला,ढेला,कल्याणी में जांच में पाया गया कि प्रदूषित नदियों के हिस्से में बीओडी की मात्रा 30.1 mg/l पाया गया है जो की प्रॉयरिटी लेवल 1 रखा है सेंटर पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने.
-टोंस,किच्छा,कोसी,पिलखर,जांच में पाया कि प्रदूषित नदियों के हिस्से में बीओडी की मात्रा 10.1- 30.1 mg/l है
-सेंटर पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने इस प्रॉयरिटी लेवल तीन रखा है
-रामगंगा,यमुना, की जांच में पाया गया कि प्रदूषित नदियों के हिस्से में बीओडी की मात्रा 6.1- 30.1 mg/l है सेंटर पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने इसे प्रायोरिटी लेवल 4 में रखा है
-नंदोउर नदी में जांच में पाया गया कि प्रदूषित नदियों के हिस्से में बीओडी की मात्रा 3.1- 30.1 mg/l है सेंटर पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने इसे प्रॉयरिटी लेवल 5 में रखा है
2100 नदियों की पानी गुणवत्ता का अध्ययन
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने साल 2022 और 2023 में देश भर की करीबन 21 सौ से ज्यादा नदियों की पानी की गुणवत्ता और पानी के सोर्स का अध्ययन किया. सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) देश में पानी के सोर्स की पानी की क्वॉलिटी का पता लगाने के लिए स्टेट पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड/पॉल्यूशन कंट्रोल कमेटियों के साथ मिलकर नेशनल वॉटर क्वालिटी मॉनिटरिंग प्रोग्राम (NWMP) चलाता है. देश मे वर्तमान समय मे नेशनल वॉटर क्वॉलिटी मॉनिटरिंग प्रोग्राम के तहत 4736 जगहों पर मॉनिटरिंग की जाती है. जिसमें नदियों पर 2155 जगहें शामिल हैं. यह स्टडी देश में नदियों की पानी की क्वॉलिटी के समय-समय पर किए जाने वाले असेसमेंट की सीरीज़ है. सेंटर पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के द्वारा पानी की क्वॉलिटी का क्राइटेरिया पैरामीटर, बायो-केमिकल ऑक्सीजन डिमांड यानी (BOD) के लेवल की बढ़ोतरी के आधार पर किया जाता है. जिसमें प्रदूषित नदी के हिस्सों और जगहों की पहचान की जाती है, पानी की क्वॉलिटी को देखना और उसे ठीक करने पर बल दिया जाता है साथ ही समय पर एक्शन प्लान बनने पर काम किया जाता है.
प्रदूषित नदी के हिस्सों की पहचान
सेंटर पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने साल 2009 से देश में प्रदूषित नदी के हिस्सों की पहचान करने का काम शुरू किया. यह काम 29 राज्यों/UTs में साल 2002-2008 के दौरान मॉनिटर किए गए नदी के पानी की क्वॉलिटी के आधार पर किया गया. इसके बाद, 2015 में 27 राज्यों/UTs में साल 2009-2012 के दौरान मॉनिटर किए गए पानी की क्वॉलिटी के डेटा के असेसमेंट के आधार पर, और 2018 में 31 राज्यों/UTs में साल 2016 और 2017 के पानी की क्वॉलिटी के डेटा के आधार पर रिपोर्टें सामने आईं. साल 2009, 2015 और 2018 में 121 नदियों पर कुल 150 जगहें, 275 नदियों पर 302 जगह और 323 नदियों पर 351 जगहों की पहचान की गई. साल 2015 में, मॉनिटर की गई 70% नदियां (390 में से 275) प्रदूषित पाई गईं, जबकि साल 2022 में, मॉनिटर की गई नदियों में से सिर्फ़ 46% (603 में से 279) प्रदूषित पाई गईं.
कई नदियों का लिया गया डेटा
साल 2022 और 2023 के नदी के पानी की क्वॉलिटी का डेटा लिया गया जिसमें साल 2022 और 2023 के दौरान मॉनिटर की गई नदियों पर 2116 जगहों में से, 1312 जगहें (62%) बाहर नहाने के लिए प्राइमरी वाटर क्वॉलिटी क्राइटेरिया के तहत नोटिफाई किए गए. 3.0 mg/L से कम के BOD क्राइटेरिया पाया गया. दअरसल नदियों के प्रदूषित होने का मुख्य कारण बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD) का 3 mg/L से ज्यादा होना है, लेकिन 1312 जगहों में बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड यानी बीओडी का लेवल 3 मिलीग्राम लीटर से कम पाया गया. 2022 और 2023 की स्टडी में प्रदूषण नदियों की जगह की तुलना 2018 में प्रदूषित नदियों की जगह से पता चला कि कल प्रदूषित नदियों की जगह की संख्या 351 जो 2018 में थी उसे घटकर साल 2025 में 296 हो गई है.
सेंटर पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने अपने इस स्टडी में पांच प्रॉयरिटी क्लासेस यानी पानी की गुणवत्ता और पानी में बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड यानी बीओडी का कितना लेवल है उसके पैरामीटर रखे
प्रॉयरिटी क्लास 1:प्रदूषित नदियों के हिस्से में बीओडी की मात्रा 30.1 mg/l
प्रॉयरिटी क्लास 2 :प्रदूषित नदियों के हिस्से में बीओडी की मात्रा 20.1 - 30.1 mg/l
प्रॉयरिटी क्लास 3 :प्रदूषित नदियों के हिस्से में बीओडी की मात्रा 10.1- 30.1 mg/l
प्रॉयरिटी क्लास 4: प्रदूषित नदियों के हिस्से में बीओडी की मात्रा 6.1- 30.1 mg/l
प्रॉयरिटी क्लास 5: प्रदूषित नदियों के हिस्से में बीओडी की मात्रा 3.1- 30.1 mg/l














